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Articles tagged with: व्यंग्य

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[28 Apr 2011 | Comments Off on यथा राष्ट्र, तथा पुष्प | ]
यथा राष्ट्र, तथा पुष्प

मयंक सक्सेना चौराहा के सुपरिचित लेखक हैं। कविता, ख़बरें, अलमस्त ज़िंदगी, रतजगे और हर ख़राब चीज से तल्खी मयंक की शख्सियत की पहचान है। वे अच्छे व्यंग्यकार भी हैं, जो हास्य की चटनी के बिना सेटायर करना जानते हैं। मयंक का ही एक व्यंग्य : मॉडरेटर
 
अगर आप यह समझते हैं कि कमल भारत का राष्ट्रीय पुष्प इसलिए है कि यह हमारी सभ्यता और संस्कृति में गहरा पैठा है और हमारे लिए गर्व का विषय है तो आप गलत सड़क पर जा रहे हैं। राष्ट्रीय फूल चुनते समय गर्व और गरिमा …

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[16 Apr 2011 | One Comment | ]
रिश्वत लेकर रख। दस-बीस संसदीय गाली बक। बाबू दफ्तर चल…!

(पाठकों को याद होगा, वे बचपन में कक्षा पहली में पढ़ा करते थे। ‘‘अमर घर चल। चल घर अमर’’। उसी तर्ज पर इस व्यंग्य को पढ़ें।) ये हिदायत हमें दी है अखिलेश शुक्ल ने। 63, तिरूपति नगर, इटारसी मध्यप्रदेश में रहते हैं अखिलेश शुक्ल। सामान्य शब्दों में लिखा गया उनका ये व्यंग्य कितना तीक्ष्ण है, यह आपने देख ही लिया होगा। चौराहा पर श्री शुक्ल का स्वागत)
 
बाबू दफ्तर चल। दफ्तर चल बाबू। देर से उठ, जल्दी मत कर हाथ मुंह धो, चाय का कप उठा। सिगरेट निकाल, लाइटर भी निकाल। सिगरेट जला, …

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[10 Apr 2011 | One Comment | ]
अभिषेक गोस्वामी की तीन कविताएं

अभिषेक गोस्वामी, यानी रंगकर्मी, लेखक, कवि, कलाकार। उफ़, एक जिस्म में इतने हुनर। जयपुर में रहते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की टाई कंपनी से जुड़े रहे। फिलवक्त, अभिषेक एक मल्टी नेशनल कंपनी के महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट से जुड़े हैं, लेकिन वो एमएनसी वर्कर नहीं हैं…थिएटर वर्कर ही हैं, यानी वहां भी नाट्यकला की पढ़ाई-लिखाई के काम में जुटे हैं। चौराहा पर अभिषेक की कुछ कविताएं :
 
अब क्या कहूँ?
कैसे बताऊँ?
पर कहना ही होगा.
जिस बड़े बाज़ार की
सबसे ऊपरी मंजिल पर 
खेल रहे हैं
हमारे बच्चे
मेरी कविता की
तोप का मुंह
उसी दिशा में है
जिसके …

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[31 Mar 2011 | Comments Off on तप मत कर। सब तय कर। धन तय कर। नकद पर नज़र रख। | ]
तप मत कर। सब तय कर। धन तय कर। नकद पर नज़र रख।

व्यंग्य, जैसे शब्दबेधी वाण…जैसे, ब्रह्मास्त्र। त्रासद यह है कि अब व्यंग्य की मारकता हास्य के तरकश में ही गुम हो रही है। ख़ैर, इतने भारी-भरकम शब्द चौराहा पर खटकेंगे, इसलिए बिना भाषण के अतुल कनक का व्यंग्य यहां। खास बात बता दें, इस पूरे पीस में कोई विराम नहीं है, ठहराव के बिना सरपट भागता हुआ। देखिए और कनक को चौराहे पर या फिर atulkanak@yahoo.com पर सीधे प्रतिक्रिया दीजिए : मॉडरेटर
 
# अतुल कनक
कनक सफल बन। अब असफल रह कर ग़म गलत मत कर। दरबदर मत भटक। अटक अटक कर मत चल। इधर- …