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Articles tagged with: विरोध

गांव-घर-समाज »

[19 Apr 2011 | Comments Off on एक मई को जंतर-मंतर पर ज़रूर आना… | ]
एक मई को जंतर-मंतर पर ज़रूर आना…

उन्होंने ताजमहल बनाया और बदले में हाथ कटवा दिए, बिल्डिंगें बनाईं और फुटपाथ पर सोए, वो मज़दूर हैं, इसलिए हर खुशी से दूर हैं। अब वो नाराज़ हैं और इसका इज़हार भी कर रहे हैं

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के…भारत की शहरी और ग्रामीण मज़दूर आबादी असहनीय और अकथनीय परेशानी और बदहाली का जीवन बिता रही है। इसमें असंगठित क्षेत्र के ग्रामीण और शहरी मज़दूरों तथा संगठित क्षेत्र के असंगठित मज़दूरों की दशा सबसे बुरी है। उदारीकरण-निजीकरण के बीस वर्षों में जो भी तरक़्क़ी हुई है, उसका …

है कुछ खास...पहला पन्ना »

[6 Apr 2011 | 2 Comments | ]
अन्ना होने के मायने हैं कुछ और

अन्ना होने के मायने महज वही नहीं है, जो दिख रहा है। 77 साल की उम्र में करप्शन के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने वाले अन्ना हजारे को नए युग का गांधी बताया जा रहा है। भले ही लोकपाल को लेकर उनकी चिंता से सहमति-असहमति के हज़ार पक्ष हों, पर इस बात से कौन इनकार करेगा कि इस बुजुर्ग को तमाम नौजवानों को शर्मसार कर दिया है, उनकी सुविधाभोगी और संतुष्टि की हद पार कर जाने वाली मानसिकता के लिए। युवा फोटो पत्रकार लाल सिंह ने दिल्ली के जंतर मंतर पर …

साहित्य-सिनेमा-जीवन »

[27 Mar 2011 | 2 Comments | ]
झुग्गी में सरकार आए हैं…

चौराहा शुरू करने से लेकर अब तक, शायद जीवन-उत्साह के अंत तक ये इरादा कायम रहेगा कि इस मंच पर राजनीति का दखल ना हो। इक्का-दुक्का अपवादों के साथ ये संकल्प मौजूद है।

आज इसमें हम हस्तक्षेप कर रहे हैं जनबात के सदरे आलम की इस टिप्पणी के साथ। मुझे लगता है-इसमें राजनीति नहीं, आक्रोश है। गुस्सा है व्यवस्था की ख़राबी को लेकर। 23 मार्च, 2011 को दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती को तोड़ दिया गया। ऐसा करना जायज था या नहीं, झुग्गीवाले शहर की खूबसूरती पर कितना बड़ा धब्बा हैं…या …