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[20 Apr 2011 | Comments Off on हिमायत हरगिज गुनाह नहीं है / हर्फे जुनूँ सबकी जुबां ठहरी है | ]
हिमायत हरगिज गुनाह नहीं है / हर्फे जुनूँ सबकी जुबां ठहरी है

बिनायक सेन को देशद्रोही मानने से इनकार करते हुए भारत की अदालते आला का यह कहना बहुत मायने रखता है कि किसी के घर में नक्सली साहित्य मिल जाने से वह नक्सली ठीक वैसे ही नहीं हो जाता जैसे गांधी की आत्मकथा रख लेने मात्र से कोई गांधीवादी।

# दुष्यंत
बिनायक सेन के बहाने कितना कुछ कहा जा सकता है ठीक वैसे ही जैसे अन्ना हजारे के बहाने।  जब कभी इक्कीसवी सदी के दूसरे दशक का इतिहास लिखा जाएगा तो कहा जाएगा कि यह अन्ना और बिनायक का समय था …

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[19 Apr 2011 | Comments Off on पारंपरिक पानी की एक कहानी | ]

स्वतंत्र मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं। जल और जीवन के नज़रिए पर उनका यह लेख पठनीय और विचारणीय, एकसाथ है।
 
बच्चा- बच्चा हिंदुस्तानी / मांग रहा है / पानी- पानी / अपना पानी मांग रहा है हिंदुस्तानी…यह रघुवीर सहाय की कविता का अंश है। इसे उन्होंने ग्रामीणों के बीच सुनाया था। रघुवीर सहाय ने शायद आज से 23 साल पहले  देवघर ( झारखंड) में एक बैठक में पानी के लिए आने वाले समय में मारा-मारी मचेगी, इसकी कल्पना कर ली होगी। शायद वहां के स्थानीय लोगों को भी इस बात का अंदेशा हो …

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[19 Apr 2011 | 2 Comments | ]
अंगना में कुंइयां…

 
# कुलदीप तोमर
आधुनिकता की दौड़ में लुप्त हुए परंपरागत जलस्रोतों का महत्व अब फिर समझ में आने लगा है। एनसीआर में जहां मृत तालाबों और कुंओं को पुनर्जीवित करने के प्रयास शुरू हो गए हैं, वहीं शहरों में शुद्ध पानी के लिए  मारामारी बढ़ रही है। देखा जाए तो पाइप से जलापूर्ति की व्यवस्था ने कुंओं और तालाबों जैसे परंपरागत जलस्रोतों को इतिहास में तब्दील कर दिया था।
शहर में कुंओं पर इमारतें खड़ी हो गईं और गांवों में इनपर मिट्टी डालकर खेती की जाने लगी। पिछले पांच साल में भूगर्भ …

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[19 Apr 2011 | One Comment | ]
तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो, हम जान बचाके आए हैं

जहां हर तरफ खौफ है…दो दिन पहले के अखबारों के मुताबिक दिल्ली में एक ही दिन में कुल मिलाकर हत्या और बलात्कार की आधा दर्जन खबरें थीं। यह जानकर कि आज यह शहर आधा दर्जन हत्या औरबलात्कार का गवाह बना, जब मैं घर से बाहर निकला तो इन्हीं सब बातों से दो चार हुआ। हरतरफ खौफ। हर तरफ डर। हर व्यक्ति सहमा हुआ। हर किसी की आंखों में एक भयानक जंगल,जहां वह अकेला भटक रहा है।

मैं बस में चढ़ा ही था कि एक व्यक्ति चिल्लाया- बस रोको।दरवाजे बंद करो। कोई …

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[19 Apr 2011 | Comments Off on एक मई को जंतर-मंतर पर ज़रूर आना… | ]
एक मई को जंतर-मंतर पर ज़रूर आना…

उन्होंने ताजमहल बनाया और बदले में हाथ कटवा दिए, बिल्डिंगें बनाईं और फुटपाथ पर सोए, वो मज़दूर हैं, इसलिए हर खुशी से दूर हैं। अब वो नाराज़ हैं और इसका इज़हार भी कर रहे हैं

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के…भारत की शहरी और ग्रामीण मज़दूर आबादी असहनीय और अकथनीय परेशानी और बदहाली का जीवन बिता रही है। इसमें असंगठित क्षेत्र के ग्रामीण और शहरी मज़दूरों तथा संगठित क्षेत्र के असंगठित मज़दूरों की दशा सबसे बुरी है। उदारीकरण-निजीकरण के बीस वर्षों में जो भी तरक़्क़ी हुई है, उसका …