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[25 Sep 2012 | Comments Off on जरूरी चीजों का चुनाव टी आर पी से नहीं किया जा सकता – ओम थानवी | ]

दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यानमाला
दिल्ली. मीडिया पर अब पूंजी का दबदबा साफ़ दिखाई दे रहा है. जब मीडिया व्यापार की वस्तु होगा तो वहां भाषा पर व्यापार का असर कैसे रोका जा सकता है. सुपरिचित लेखक और जनसत्ता के सम्पादक ओम थानवी ने हिन्दू कालेज में आयोजित एक व्याख्यान में कहा कि हमें यह ध्यान देना होगा कि जूते के कारोबार और अखबार में फर्क है क्योंकि सिर्फ सूचना देना ही मीडिया का काम नहीं बल्कि पाठकों की समझ बढ़ाना भी मीडिया की जिम्मेदारी है.
हिन्दी साहित्य सभा द्वारा वार्षिक …

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[12 Apr 2012 | One Comment | ]
शांकुतलम् के बंद होने का मतलब…

– देवाशीष प्रसून
शाकुंतलम थियेटर बंद हो गया है। यह दिल्ली के प्रगति मैदान जैसी शांत जगह पर पिछले तीन दशकों से लगातार चल रहा था। शाकुंतलम थियेटर, याने सिनेमाघरों के बीच शांत स्वभाव के मध्यवर्गीय, सभ्य, पढ़े-लिखे लोगों की पहली पसंद। भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत चलने वाले इंडिया ट्रेड प्रोमोशन ऑर्गनाइजेशन का प्रबंधन इसको और चलाते रहने की जरूरत नहीं समझता और इस कारण से इसको बंद करके कॉनफ्रेंस हॉल बनवाना चाहता है। जो लोग दिल्ली में नहीं रहते और शाकुंतलम थियेटर से वाकिफ नहीं …

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[24 Apr 2011 | One Comment | ]
चीड़ों पर बिखरी हुई निर्मल चांदनी…

डायरी के पन्नों पर निर्मल वर्मा
चीड़ों पर चांदनी पढ़ते हुए
– अखिलेश शुक्ल
1.
आज पुनः निर्मल वर्मा याद आ रहे हैं। ‘चीड़ों पर चांदनी’ के तीसरी बार अध्ययन की वजह से। जितनी बार उन्हें पढ़ता हूँ, उतनी ही बार वे स्वच्छ निर्मल रूप में सामने आ खड़े होेते हैं। पहली बार ‘चीड़ों पर चांदनी’ को संस्मरण समझकर पढ़ता रहा था। यह वह समय था, जब किसी पुस्तक/संग्रह को विधाओं की सीमा में बाँधने का चलन था। उस समय उनके अंदाज़-ए-तहरीर ने मुझे बेहद प्रभावित किया था। ‘चीड़ों पर चांदनी’ की तफ़सीलों …

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[24 Apr 2011 | 9 Comments | ]
लेकिन ‘लोकतंत्र’ के आगे उनकी कोई हैसियत नहीं है

पंकज झा दीपकमल पत्रिका के संपादक हैं। भारतीय जनता पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा जाहिर है और इससे वह इनकार भी नहीं करते। बिनायक सेन  को लेकर पंकज के विचारों से मैं सहमत नहीं हूं, लेकिन चौराहा सबका मंच है और यहां असहमतियों का अधिकार सार्वजनिक है, ऐसे में पंकज के आलेख को प्रकाशन से रोका नहीं जा सकता…पंकज जी का ये अपना मंच है, इसलिए मेरी विचारवैभिन्नता के बावज़ूद उनका लेख पूरे आदर के साथ पेश है :
 
# पंकज झा
देशद्रोह के ‘अपराध’ में उम्रकैद की सज़ा पाए बिनायक सेन को ज़मानत …

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[20 Apr 2011 | 4 Comments | ]
कहते हो देवी और बलात्कार भी करते हो?

रचना त्रिपाठी युवा पत्रकार हैं। देहरादून की रहने वाली हैं। रचना पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही हैं। आंखों में सपना बुन रही हैं—मीडिया का भविष्य बनने वालों में मेरा भी नाम हो। हमने रचना से चौराहा पर लिखने के लिए कहा। उन्होंने शुरुआती हिचक के बाद एक लेख लिखा भी। स्थूल तौर पर यह लेख स्त्री विमर्श के कैशोर्य पाठ जैसा है, जिसमें आंकड़ों और तर्कों से अलग कुछ प्रश्न हैं। यूं, रचना का ये लेख जितना सच्चा है, कहीं ना कहीं उतनी ही निराशा से भी भरा है। रचना …