Home » Archive

Articles tagged with: राजस्थान

यादें, संगीत-कला, साहित्य-सिनेमा-जीवन, स्मृति-शेष »

[29 Nov 2014 | Comments Off on मरुभूमि का राग – मांड | ]

– कोषा गुरुंग
झरनों के संगीत और नई फसल की खुशी, अपने आप उगे हुए फूलों की मादक सुगंध, पक्षियों का कलरव, पहाड़ों की चोटियों पर बर्फ की सफेद चादर, बच्चों की किलकारियां, सरल हृदय युवतियों का प्यार, जातीय पर्व-त्योहार, यही तो है – लोक संगीत, जो हमें मानवीय संवेदनाओं से जोड़ता है और हमें अपने आप से रू-ब-रू कराता है।
अचानक पहाड़ के पीछे से दल के दल बादल निकल आते हैं और धूप की गर्मी खत्म हो जाती है। गांवों के लोग घरों से और खेतों से बाहर चले आते …

दिल के झरोखे से..., संगीत-कला »

[8 Apr 2011 | 2 Comments | ]
पढ़ना-देखना एक कवि की पेंटिंग्स के शब्द

गुलाबी शहर के खूबसूरत और खूबसीरत कलाकार हैं अमित कल्ला। कवि भी हैं। बगैर दहेज के विवाह करने वाले साहसी अमित कल्ला की पेंटिंग्स और कविताओं में जीवन का जटिल पर ज़रूरी दर्शन छुपा है। शब्दों और रंगों का गठजोड़ संभवतः अंतर्मन की छटपटाहट, कौतूहल, आशा-निराशा, नाराज़गी और उत्साह का खुलासा कर सके। उनकी काव्य-रंग कृतियों को पेश करने का सौभाग्य चौराहा को मिला है, इसके लिए अमित का आभार भी : मॉडरेटर
 
किसका सगा

अपनी ही
बिछाई चौसर पर
बहुपाश में कसता
देख सकता हूँ
सन्नाटा
आखिर
किसका सगा है
अन्धकार
लगातार

लगातार
अपने साथ ले जाता
कैसा लचकीला
ज़ार – ज़ार बहुधा दिखाई देता
ताइरे – अर्श सा
सच
मोह लेता है
परिवास
जरणा जोगी बन
कागज़ के टुकड़े संग
गहरे समंदर की
यात्राओं पर निकल जाता
देखता
टकटकी लगा
उसी ध्रुव तारे को
बनाया जिसे
अपना ईश्वर
लगातार
ध्यान मग्न
कल
चले जाएंगे
धूनियों को छोड़
अस्थाई डेरे त्याग
प्रस्थान
गंतव्यों की ओर
शिप्रा
यथा ही बहेगी जब तक
महाकाल रहेंगे
ध्यान मग्न
कैसी दुविधा
कैसी दुविधा
बुदबुदाता
छूना चाहता है
बेआवाज़ ही रख देता
हर रंग, हर कहानी
कैसा
अकेला ही पाता
ऋत पर विजय
वैसे भी
किसे देखतीं
अन्दरुनी निगाहें
तह पर तह जमती जाती
सच
आग है निर्वसन
हाथ जोड़े , हिचकोले खाता
संगेमरमर पर
फिसलता है
यहाँ-वहाँ के खेलों के बीच
कभी छू लेता
आकाशीय चेतस वर्षा
अक्षीय बंध संग
कैसी दुविधा
पलक – पलक अगहरूप
आखिर कौन
लौटता  हैं वापस
उन धुरियों के बीच ,
दिखाई पड़ता जहाँ
अंतर्मन का कोलाहल
निहितार्थ ही
अधूरा नहीं
छोड़ देता
जुलाहा ,
मृत्युजेता पवन के
आस्वादन का
ताना-बाना ,
हर इक शब्द
उस
जागते अवधूत का
अविज्ञात
अध्याय हो जाता है
समानांतर ही
ठहरा समय
विराट वृक्ष की ओट ले
मलय राग गाता,
अर्धचंद्र ,
बसंत में डूबी देहर को
पंक्ति – पंक्ति मायारस
चखा
अनासक्त हो
जुगजुगाते तारे संग आँखे खोले
पलक – पलक
अगहरूप सा
बेखौफ़ ,
सीधे कदम रखने की
ज़हमत उठाता है
हिये का बैरी
अजन्मे
स्वप्न को छूकर
निरंतर लहर दर लहर
माटी के सिकोंरों में
बूढे सितारों संग
अकेला ही
तैरता हिये का बैरी
वह…
चमचमाता पुखराज !
कैसा
दीर्घकाल तक

आसुरी
आवरणों के बाहर दीर्घकाल तक
कुछ नया न जाने कैसे
विश्वसृष्टि का संवाद
अनझिप ज्योति की
निजता लिए
कल्पित रंगों के रसायन में
घुलमिल जाता
माप – माप कर
सहजवृत्त अमूर्तन की
अंतरदृष्टि
सविषयी तत्वों के
स्फुरण संग शाकम्बरी का
चेतन स्पर्श हो जाता है …

खेल-तमाशा, दिल के झरोखे से... »

[28 Mar 2011 | 2 Comments | ]
पंचायत से संयुक्त राष्ट्र संघ तक पहुंच गई सरपंच

ताज़ा खबर
राजस्थान के सोडा गांव की युवा सरपंच छवि राजावत जब दुनिया की सबसे बड़ी सभा संयुक्त राष्ट्र संघ में बोलने के लिए खड़ी हुईं, तो पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। 30 वर्षीय छवि ने संयुक्त राष्ट्र 11वीं सूचना-गरीबी विश्व कॉन्फ्रेंस में 24 और 25 मार्च को हिस्सा लिया और दुनियाभर के देशों के वरिष्ठ राजनेताओं व राजदूतों के बीच गरीबी से लड़ने और विकास के तरीके पर विचार व्यक्त किए। रपट थोड़ी पुरानी है, पर बहुत इंट्रेस्टिंग है। इसे ताज़ा ख़बर से जोड़कर पढ़ें। रपट लिखी है सुमन …