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Articles tagged with: मयंक सक्सेना

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[28 Apr 2011 | Comments Off on यथा राष्ट्र, तथा पुष्प | ]
यथा राष्ट्र, तथा पुष्प

मयंक सक्सेना चौराहा के सुपरिचित लेखक हैं। कविता, ख़बरें, अलमस्त ज़िंदगी, रतजगे और हर ख़राब चीज से तल्खी मयंक की शख्सियत की पहचान है। वे अच्छे व्यंग्यकार भी हैं, जो हास्य की चटनी के बिना सेटायर करना जानते हैं। मयंक का ही एक व्यंग्य : मॉडरेटर
 
अगर आप यह समझते हैं कि कमल भारत का राष्ट्रीय पुष्प इसलिए है कि यह हमारी सभ्यता और संस्कृति में गहरा पैठा है और हमारे लिए गर्व का विषय है तो आप गलत सड़क पर जा रहे हैं। राष्ट्रीय फूल चुनते समय गर्व और गरिमा …

विचार, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[25 Apr 2011 | One Comment | ]
जय चैनल बाबा : साईं पहले फ़र्जी, अब चमत्कारी?

चेहरों की किताब पर मयंक सक्सेना ने एक बहस छेड़ दी है। सवाल ये कि साईं को अब तक फर्जी कहने वाले चैनल कैसे उन्हें मौत के बाद चमत्कारी कहने लगे…बात-बहस जारी है, इस बीच अलग-अलग वक्त पर मयंक की कही बातें हम चौराहा के लिए उठा लाए हैं…इनमें कुछ-कुछ वाक्य / शब्द जोड़ दिए गए हैं, कुछ-कुछ edit कर दिया गया है, लेकिन इरादा कुछ ख़राब नहीं है, ये कोशिश की गई है कथन को एकसार करने के लिए : मॉडरेटर
 
वाकई समाचार चैनलों का चरित्र हैरान कर देने वाला …

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[14 Apr 2011 | 2 Comments | ]
गिनती में आए हिंदू-मुसलमान / बरगद जानता न था फ़र्क करना

बरगद मयंक सक्सेना की कविता है…या यूं कहें, उनका दर्द। उन्होंने क्यों लिखी बरगद-कथा-व्यथा? बता रहे हैं खुद :
ये वो दर्द है, जिसे अयोध्या पर न्यायालय का फ़ैसला आने के पहले…उसी अयोध्या में खड़े होकर महसूस किया गया था….जिसके नाम का मतलब है–वो जगह जहां कभी युद्ध न हो….और फिर भी उसी के नाम पर कितना फ़साद हुआ….पिछले 18 साल से एक जीता-जागता शहर…एक ज़िंदा शहर…एक ज़िंदगी का शहर…एक इंसानों का शहर…हिंदू-मुसलमानों के शहर में बदल दिया गया….अयोध्या, जिसे शायद शांति का प्रतीक होना चाहिए था…विवादों की वजह से …

दिल के झरोखे से..., है कुछ खास...पहला पन्ना »

[13 Apr 2011 | 7 Comments | ]
शहीदों के खून से सनी मिट्टी लाल है पर हमारा खून…?

मयंक सक्सेना। एक सूफियाना लड़का। लखनऊ घर है, दिल्ली ठिकाना। तलाश…अंतहीन। ज़ी न्यूज, सीएनईबी और यूएनआई टीवी समेत कई नौकरियां कीं। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पासआउट। लखनवी तहज़ीब के साथ सच्चाई का पक्षधर होने की वज़ह से मिजाज़ में तुर्शी भी खूब है और झूठवालों के लिए तल्खी भी। डर नहीं लगता। सलाम नहीं कर सकता, इसलिए नौकरियां भी अक्सर छोड़ देता है। पिछले दिनों अन्ना के अनशन से जुड़ाव रहा, तो जंतर मंतर पर कई रातें भी गुजारीं, जागते-उनींदी आंखों से सोते हुए। फ़िलहाल, एक फ़िल्म लिख …