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Articles tagged with: भोलानाथ शुक्ल

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[19 Apr 2011 | One Comment | ]
अन्तस्थल के किसी कोने में / जैसे कुछ चुभता रहता है…

भोलानाथ शुक्ल ने वीडियो एडिटिंग की पढ़ाई की है। फ़िलहाल, एमए की परीक्षाएं देने में जुटे हैं। कविताएं लिखते हैं और लेख भी। उनकी एक और काव्य कृति चौराहा पर। भोलानाथ का ब्लॉग भी देख सकते हैं आप…

 
अनचाहे अनजाने में
कब कैसे कुछ हो जाता है
जगी  आँखों  का एक सपना  सा
सब कुछ मिलके खो जाता है
मीठे सपनों की दुनिया में
मन मयूर रम जाता है
जीवन के हर दुःख सुख से
दिल मस्ताना हट जाता है
अन्तस्थल के किसी कोने में
जैसे कुछ चुभता रहता  है
आप भी समझते होंगे शायद
दर्द जीव का क्या होता है
 

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[4 Apr 2011 | 2 Comments | ]
चौराहा पर पांच कवि

कविता की दुनिया में सन्नाटा हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। सच यह है कि प्रेमी और कवि, हर मोहल्ले की पूरी जनसंख्या के हिसाब से तकरीबन आधे तो होते ही हैं। ठीक वैसे ही, जैसे हंसी-मज़ाक में लोग कहते हैं–जवानी में कम्युनिस्ट,  अधेड़ावस्था में संघी/भाजपाई/ और बुढ़ापे में कांग्रेसी हो जाते हैं (यह महज मज़ाक है, दिल पे नहीं लेने का) । ख़ैर, कवियों / शायरों की बाढ़ में उम्र के अनुपात में कमी आती है, तो कई बार इज़ाफा भी होता है। मसलन–जवानी में गज़ल / कविताएं लिखने वाले …

दिल के झरोखे से... »

[28 Mar 2011 | 3 Comments | ]
ठिकाना

भोलानाथ शुक्ल ने वीडियो एडिटिंग की पढ़ाई की है। फ़िलहाल, एमए की परीक्षाएं देने में जुटे हैं। कविताएं लिखते हैं और लेख भी। उनकी पहली रचना चौराहा पर। भोलानाथ का ब्लॉग है…  http://bholanathshukla.blogspot.com/
 

दिल जला हो गया बेगाना
खुदी मेरी खुद-ब-खुद गई
भूला राग गाना बजाना
‘ भोले ‘ का भुलावा गया
दिल का छलावा गया,
बुद्धि करती रही बहाना
भूला गाँव – पता – ठिकाना ,
काबिलों के बीच पैठ कैसे हो
मुखालिफ हो जब सारा जमाना ,
बेअक्ल को अक्ल आ नहीं सकती
कबूतरी पंचम राग में कभी गा नहीं सकती ,
काबिलों से कैसे चलेगा बहाना
एक ही बार की …