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Articles tagged with: पत्रकारिता

साहित्य-सिनेमा-जीवन, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[14 Apr 2011 | One Comment | ]
मैं भी हूं इस गुनाह में शामिल

दुष्यंत कभी औपचारिक रूप से साहित्य के छात्र नहीं रहे और इतिहास में पीएचडी के बाद किन्ही जन्मजात बीमारियों के वशीभूत त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका शब्दक्रम के संस्थापक संपादक रहे, जिसका क्रम कुछ अंकों के बाद टूट गया, हालांकि राजस्थान से हुई अब तक की ऐसी तमाम कोशिशों में उसे अलग और खास मुकाम हासिल हुआ था, फिर जो रास्ता उन्होनें इख्तियार किया या जिंदगी जहां लाई वह लोगों की निगाह में मुख्य धारा की पत्रकारिता में साहित्यिक पत्रकारिता को संभव बनाने की कोशिशों के साथ लिखते रहने की जददोजहद भी …

दिल के झरोखे से... »

[13 Apr 2011 | 9 Comments | ]
दूसरों की बात छोड़िए, अपनी आत्मा से तो न्याय कीजिए

यह टिप्पणी प्रतिष्ठित पोर्टल समाचार4मीडिया के लिए लिखी गई थी। वहीं से साभार चौराहा पर :
 
– चण्डीदत्त शुक्ल

जिस दौर में पत्रकारिता की मूर्छावस्था और मृत्यु की समीपता तक की बातें कही जा रही हैं, उस समय में नैतिकता के सवाल मायने ही नहीं रखते। सच तो यह है कि ये विधा, जो कभी मिशन थी, फिर प्रोफेशन बनी, अब विश्वसनीयता और जिजीविषा के संकट से घिरी है। हालांकि भयानक नैराश्य के माहौल में भी, इस तथ्य और सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि टीआरपी के विष-बाण से ग्रस्त …