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Articles tagged with: पंकज झा

गांव-घर-समाज »

[24 Apr 2011 | 9 Comments | ]
लेकिन ‘लोकतंत्र’ के आगे उनकी कोई हैसियत नहीं है

पंकज झा दीपकमल पत्रिका के संपादक हैं। भारतीय जनता पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा जाहिर है और इससे वह इनकार भी नहीं करते। बिनायक सेन  को लेकर पंकज के विचारों से मैं सहमत नहीं हूं, लेकिन चौराहा सबका मंच है और यहां असहमतियों का अधिकार सार्वजनिक है, ऐसे में पंकज के आलेख को प्रकाशन से रोका नहीं जा सकता…पंकज जी का ये अपना मंच है, इसलिए मेरी विचारवैभिन्नता के बावज़ूद उनका लेख पूरे आदर के साथ पेश है :
 
# पंकज झा
देशद्रोह के ‘अपराध’ में उम्रकैद की सज़ा पाए बिनायक सेन को ज़मानत …

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[15 Apr 2011 | 2 Comments | ]
31साल पुरानी भाजपा है `सबसे कम बुरी’ पार्टी

# पंकज झा

(लेखक चर्चित युवा पत्रकार हैं और दीपकमल पत्रिका का संपादन कर रहे हैं। एक युवा की नज़र में भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा का विश्लेषण रोचक है, वह भी तब, जब ये नौजवान विचारक भारतीय जनता पार्टी के लिए ही सक्रिय है। यही कारण है कि हम इसे चौराहा पर पेश कर रहे हैं। आखिरकार, भाजपा में रहते हुए, भाजपा को सलाह देने का हुनर तो गौर करने लायक है। )

 
जुलाई का महीना दिल्ली के लिए काफी गर्म होता है. पर यह धूप तब और कष्टकर हो …

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[10 Apr 2011 | 6 Comments | ]

गैर राजनीतिक चौराहा पर एक और राजनीतिक चर्चा, महज इसलिए, क्योंकि मौजू है…और चौराहा पर सियासी बहस को कैसे रोका जा सकता है। लेखक हैं पंकज झा, बेहद प्रखर पत्रकार और सटीक राय रखने वाले लेखक। पंकज दीपकमल पत्रिका के संपादक हैं।
 
# पंकज झा
अभी दांतेवाडा घटनाक्रम के बाद खासकर पिछले साल 6 अप्रैल को ताडमेटला में शहीद हुए जवानों की बरसी से ऐन पहले नए घटनाक्रम के अगुआ स्वामी अग्निवेश के बारे में नेट पर तथ्य तलाशते हुए ढेर सारे सन्दर्भों से अपना साबका पड़ा. अपने मेल बोक्स में सुरक्षित …

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[9 Apr 2011 | 3 Comments | ]
अनशन के बाद अन्ना का आंदोलन, साथ में हैं कई `संत!’

पंकज झा। बेहद कुशाग्र और तीखा, लेकिन सच्चा व स्पष्ट लिखने के लिए चर्चित युवा पत्रकार। दीपकमल पत्रिका के संपादक पंकज जी का यह लेख अन्ना का अनशन समाप्त होने के बाद भी प्रासंगिक है, क्योंकि इसमें आंदोलन की ज़रूरतों और दिशा पर बहस को आमंत्रित किया गया है : मॉडरेटर
 
आपातकाल के समय बीस महीने जेल में रहे एक संपादक की टिप्पणी काबिलेगौर है. बहुत क्षुब्ध होकर वो कहते हैं ‘जेपी के सम्पूर्ण क्रान्ति के समय की तुलना में आज के हालात के हालात कहीं बुरे हैं लेकिन जनता में …