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Articles tagged with: दुष्यंत

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[23 Oct 2012 | Comments Off on अलविदा – सुनील दा : कस्तूरी की महक के कुछ पल! | ]
अलविदा – सुनील दा : कस्तूरी की महक के कुछ पल!

दुष्यंत
बंगाली के अत्यंत सुकोमल कवि और सबसे ज्यादा पठित कथाकारों में से एक सुनील दा का आज जाना क्या मायने रखता है, इसका ठीक-ठीक मूल्यांकन होने में समय लगेगा। सुनील गंगोपाध्याय से बस एक मुलाकात रही मेरी। वे दिल्ली के सर्दी के दुर्लभ धूपीले दिन थे। तब वे साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष भी नहीं हुए थे। कल्पनालोक में विचरण करते हुए बंगाली मेधा के बावले से प्रेमी युवक के रूप में उनसे मिलना एक ख्वाब सा था। कुछ क्षण ही रहे होंगे जब उनका सामीप्य मेरे जीवनानुभवों में शामिल …

गांव-घर-समाज »

[25 Apr 2011 | 3 Comments | ]
एक दोपहर मिली, धूप की शॉल ओढ़े

डायरी, अब विधा से अलग, म्यूजियम की चीज होने जा रही है। यह कथन जितना अतिरंजित है, उतना ही आशंका और पीड़ा से भी उपजा है। ऐसे हालात में अगर दुष्यंत की डायरी का एक पन्ना पढ़ने को मिल जाए, तो सुखकर प्रतीति होती है, आइए आप भी पढ़िए, ये पन्ना…
 
यह खान मार्केट है, दक्षिणी दिल्ली का एक नामचीन इलाका, कई सर्वे के मुताबिक सबसे महंगा बाजार भी, इंडिया गेट से थोड़ा ही दूर शाहजहां रोड़ से आगे जाने पर पृथ्वीराज रोड़ से इसके लिए रास्ता जाता है तो पहले …

गांव-घर-समाज »

[20 Apr 2011 | Comments Off on हिमायत हरगिज गुनाह नहीं है / हर्फे जुनूँ सबकी जुबां ठहरी है | ]
हिमायत हरगिज गुनाह नहीं है / हर्फे जुनूँ सबकी जुबां ठहरी है

बिनायक सेन को देशद्रोही मानने से इनकार करते हुए भारत की अदालते आला का यह कहना बहुत मायने रखता है कि किसी के घर में नक्सली साहित्य मिल जाने से वह नक्सली ठीक वैसे ही नहीं हो जाता जैसे गांधी की आत्मकथा रख लेने मात्र से कोई गांधीवादी।

# दुष्यंत
बिनायक सेन के बहाने कितना कुछ कहा जा सकता है ठीक वैसे ही जैसे अन्ना हजारे के बहाने।  जब कभी इक्कीसवी सदी के दूसरे दशक का इतिहास लिखा जाएगा तो कहा जाएगा कि यह अन्ना और बिनायक का समय था …

साहित्य-सिनेमा-जीवन, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[14 Apr 2011 | One Comment | ]
मैं भी हूं इस गुनाह में शामिल

दुष्यंत कभी औपचारिक रूप से साहित्य के छात्र नहीं रहे और इतिहास में पीएचडी के बाद किन्ही जन्मजात बीमारियों के वशीभूत त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका शब्दक्रम के संस्थापक संपादक रहे, जिसका क्रम कुछ अंकों के बाद टूट गया, हालांकि राजस्थान से हुई अब तक की ऐसी तमाम कोशिशों में उसे अलग और खास मुकाम हासिल हुआ था, फिर जो रास्ता उन्होनें इख्तियार किया या जिंदगी जहां लाई वह लोगों की निगाह में मुख्य धारा की पत्रकारिता में साहित्यिक पत्रकारिता को संभव बनाने की कोशिशों के साथ लिखते रहने की जददोजहद भी …

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[12 Apr 2011 | One Comment | ]
एक शाम कवि की निगाह में खिल गए रंग

वे दीवानगी की हद तक लिखने-पढ़ने के आशिक हैं। यूं, पेशे से संपादक हैं, पर कभी-कभार दिल कहता है, कहीं दूर चल, तो छुट्टियां लेके कुछ-कुछ जगहों पर वक्त गुज़ारने और लिखने-पढ़ने …अब इसे काम कैसे कहूं…चले जाते हैं। पिछले दिनों वे अहमदाबाद में थे। दोस्तों की पेंटिंग एक्जिबिशन थी, सो दोस्त का होना लाजिमी ही था। ये कोई और नहीं, अपने दुष्यंत ही हैं। बेहतरीन कवि, लेखक, संपादक। जयपुर में रहते हैं, गंगानगर के रहने वाले हैं और दिल कमबख्त काबू में रहता नहीं, सो दूर-दूर टहलता रहता है। …