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[15 Apr 2011 | Comments Off on कुछ लम्हों के लिए रौशन जहां की ख्वाहिश… | ]

– – दीप्ति शर्मा
 
रौशन  जहां  की ही ख्वाहिश की है

मैंने अपने दिल की झूठे  बाज़ार  में

सच्चाई के  साथ आजमाइश की है |

 

मालूम है बस फरेब है यहां तो

फिर क्यों मैंने सपन भर आँखों में

अपने उसूलों की नुमाइश की है |

 

जब मेरी जिन्दगी मेरी नहीं तो क्यों?

ख्वाब ले जीने की गुंजाइश की है |

 

कुछ जज्बात हैं मेरे इस दिल के

उनको समझ खुदा से मैंने बस

कुछ खुशियों की फरमाइश की है |

 

मैनें तो बस कुछ लम्हों के लिए

रौशन जहाँ की ख्वाहिश की है |

दिल के झरोखे से... »

[29 Mar 2011 | 5 Comments | ]
शब्दों में कैसे बयां करूं?

– दीप्ति शर्मा
मैं अपनी भावनाओ को

शब्दों में कैसे बयां करूँ ?

शायद कहीं ऐसा ना हो ,

की कोई मुझे सुने ही ना ,

और कोई समझे ही ना

वो बात जो सब समझे

ये मैं कैसे पता करूँ ?

मैं अपनी भावनाओ को

शब्दों में कैसे बयां करूँ ?

 

दीप्तमान हैं कुछ शब्द
लफ्जो पर हर सहर
प्रतिबिम्ब बन उन
लफ्जो को जो समझ सकें
उनका तहे दिल से मैं
कैसे शुक्रिया अदा करूँ ?
पर जो समझे ही नहीं
उनका कैसे पता करूँ ?
मैं अपनी भावनाओ को
शब्दों में कैसे बयां करूँ ?
 

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[24 Mar 2011 | 11 Comments | ]
अब बड़ी होना चाहती हूं…

मैं हूँ छोटी सी
पर अब बड़ी
होना चाहती हूँ |
उस मत्स्यालय
से बाहर निकल
…अपनी दुनिया में
जाना चाहती हूँ|
दिखावे के प्रेम
को त्याग कर
अपनी मर्जी से
जीना चाहती हूँ |
अब मैं जी भर
तैरना चाहती हूँ
अपनी दुनिया में
जाना चाहती हूँ |
हैं मेरे अपने जहाँ
हैं मेरी खुशिया वहां
मैं उनके साथ
जीना चाहती हूँ |
कैद से आजाद हो
मैं उन अपनों से
मिलना चाहती हूँ
मैं अपनी दुनिया में
जाना चाहती हूँ|
दीप्ति शर्मा युवा ब्लॉगर और कवयित्री हैं। उनकी रचनाएं मानव जीवन के अहसासों और इच्छाओं से भरपूर हैं।