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Articles tagged with: दिल्ली

गांव-घर-समाज »

[25 Apr 2011 | 3 Comments | ]
एक दोपहर मिली, धूप की शॉल ओढ़े

डायरी, अब विधा से अलग, म्यूजियम की चीज होने जा रही है। यह कथन जितना अतिरंजित है, उतना ही आशंका और पीड़ा से भी उपजा है। ऐसे हालात में अगर दुष्यंत की डायरी का एक पन्ना पढ़ने को मिल जाए, तो सुखकर प्रतीति होती है, आइए आप भी पढ़िए, ये पन्ना…
 
यह खान मार्केट है, दक्षिणी दिल्ली का एक नामचीन इलाका, कई सर्वे के मुताबिक सबसे महंगा बाजार भी, इंडिया गेट से थोड़ा ही दूर शाहजहां रोड़ से आगे जाने पर पृथ्वीराज रोड़ से इसके लिए रास्ता जाता है तो पहले …

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[13 Apr 2011 | One Comment | ]

– आवेश तिवारी
दिल्ली अब दिल वालों की नहीं रही ,कंक्रीट के इस शहर ने यहाँ के लोगों के दिलों को भी पत्थर का कर दिया है ,सबके सब भागते हुए अनंत की ओर |अगर ऐसा न होता तो क्या अनुराधा मरती ?नोएडा के सेक्टर २९ में दो बहनों का सात महीने तक खुद को एक कमरे में बंद रखना और पास पड़ोस में किसी को खबर तक न होना  बताता है ,कि आज की दिल्ली न सिर्फ अमानवीय और  क्रूर है बल्कि दिल्ली वालों के सामाजिक सरोकार  भी पूरी तरह …