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Articles tagged with: जयपुर

चर्चाघर, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[20 Nov 2012 | Comments Off on जेएलएफ से पहले किताबों का पर्व ! | ]
जेएलएफ से पहले किताबों का पर्व !

– 75 राइटर और एजुकेशनिस्ट करेंगे बातचीत
– 80 साहित्यकार राजस्थान के भी शामिल होंगे
– 32 सेशन में होगा अलग-अलग सब्जेक्ट्स पर डिक्सशन
– 06 नेशनल सेमिनार आयोजित होंगे
– 1000 स्टूडेंट्स का एक्टिव पार्टिसिपेशन
– पसंदीदा लेखकों से लोग करेंगे सीधी मुलाकात

गार्गी मिश्रा और चौराहा डेस्क, साभार – दैनिक भास्कर.
जयपुर। जयपुर …

गांव-घर-समाज, यादें »

[18 Apr 2011 | 2 Comments | ]
फटे हुए गुदड़ों में लिपटा वो ठिठुर रहा था और मैं स्तब्ध थी…

अर्पिता शर्मा राजस्थान की युवा पत्रकार हैं। जयपुर में पत्रिका समूह के अख़बार डेली न्यूज़ में कार्यरत अर्पिता का लेखन बताता है कि उनमें बहुत-सी संभावनाएं और उम्मीदें हैं। कुछ अरसा पहले, खुद के साथ घटी एक घटना अर्पिता बयां कर रही हैं और इसके साथ मन की सारी परतें खोलकर रख देती हैं। यह ईमानदाराना और आत्मीय रवैया उनके लेखन के प्रति आश्वस्ति भी पैदा करता है। अर्पिता का ये लेख चौराहा के लिए काफी पहले ही आ गया था, लेकिन मेरे पास तकनीकी कौशल की कमी और आलस्य …

साहित्य-सिनेमा-जीवन »

[10 Apr 2011 | One Comment | ]
अभिषेक गोस्वामी की तीन कविताएं

अभिषेक गोस्वामी, यानी रंगकर्मी, लेखक, कवि, कलाकार। उफ़, एक जिस्म में इतने हुनर। जयपुर में रहते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की टाई कंपनी से जुड़े रहे। फिलवक्त, अभिषेक एक मल्टी नेशनल कंपनी के महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट से जुड़े हैं, लेकिन वो एमएनसी वर्कर नहीं हैं…थिएटर वर्कर ही हैं, यानी वहां भी नाट्यकला की पढ़ाई-लिखाई के काम में जुटे हैं। चौराहा पर अभिषेक की कुछ कविताएं :
 
अब क्या कहूँ?
कैसे बताऊँ?
पर कहना ही होगा.
जिस बड़े बाज़ार की
सबसे ऊपरी मंजिल पर 
खेल रहे हैं
हमारे बच्चे
मेरी कविता की
तोप का मुंह
उसी दिशा में है
जिसके …

दिल के झरोखे से..., संगीत-कला »

[8 Apr 2011 | 2 Comments | ]
पढ़ना-देखना एक कवि की पेंटिंग्स के शब्द

गुलाबी शहर के खूबसूरत और खूबसीरत कलाकार हैं अमित कल्ला। कवि भी हैं। बगैर दहेज के विवाह करने वाले साहसी अमित कल्ला की पेंटिंग्स और कविताओं में जीवन का जटिल पर ज़रूरी दर्शन छुपा है। शब्दों और रंगों का गठजोड़ संभवतः अंतर्मन की छटपटाहट, कौतूहल, आशा-निराशा, नाराज़गी और उत्साह का खुलासा कर सके। उनकी काव्य-रंग कृतियों को पेश करने का सौभाग्य चौराहा को मिला है, इसके लिए अमित का आभार भी : मॉडरेटर
 
किसका सगा

अपनी ही
बिछाई चौसर पर
बहुपाश में कसता
देख सकता हूँ
सन्नाटा
आखिर
किसका सगा है
अन्धकार
लगातार

लगातार
अपने साथ ले जाता
कैसा लचकीला
ज़ार – ज़ार बहुधा दिखाई देता
ताइरे – अर्श सा
सच
मोह लेता है
परिवास
जरणा जोगी बन
कागज़ के टुकड़े संग
गहरे समंदर की
यात्राओं पर निकल जाता
देखता
टकटकी लगा
उसी ध्रुव तारे को
बनाया जिसे
अपना ईश्वर
लगातार
ध्यान मग्न
कल
चले जाएंगे
धूनियों को छोड़
अस्थाई डेरे त्याग
प्रस्थान
गंतव्यों की ओर
शिप्रा
यथा ही बहेगी जब तक
महाकाल रहेंगे
ध्यान मग्न
कैसी दुविधा
कैसी दुविधा
बुदबुदाता
छूना चाहता है
बेआवाज़ ही रख देता
हर रंग, हर कहानी
कैसा
अकेला ही पाता
ऋत पर विजय
वैसे भी
किसे देखतीं
अन्दरुनी निगाहें
तह पर तह जमती जाती
सच
आग है निर्वसन
हाथ जोड़े , हिचकोले खाता
संगेमरमर पर
फिसलता है
यहाँ-वहाँ के खेलों के बीच
कभी छू लेता
आकाशीय चेतस वर्षा
अक्षीय बंध संग
कैसी दुविधा
पलक – पलक अगहरूप
आखिर कौन
लौटता  हैं वापस
उन धुरियों के बीच ,
दिखाई पड़ता जहाँ
अंतर्मन का कोलाहल
निहितार्थ ही
अधूरा नहीं
छोड़ देता
जुलाहा ,
मृत्युजेता पवन के
आस्वादन का
ताना-बाना ,
हर इक शब्द
उस
जागते अवधूत का
अविज्ञात
अध्याय हो जाता है
समानांतर ही
ठहरा समय
विराट वृक्ष की ओट ले
मलय राग गाता,
अर्धचंद्र ,
बसंत में डूबी देहर को
पंक्ति – पंक्ति मायारस
चखा
अनासक्त हो
जुगजुगाते तारे संग आँखे खोले
पलक – पलक
अगहरूप सा
बेखौफ़ ,
सीधे कदम रखने की
ज़हमत उठाता है
हिये का बैरी
अजन्मे
स्वप्न को छूकर
निरंतर लहर दर लहर
माटी के सिकोंरों में
बूढे सितारों संग
अकेला ही
तैरता हिये का बैरी
वह…
चमचमाता पुखराज !
कैसा
दीर्घकाल तक

आसुरी
आवरणों के बाहर दीर्घकाल तक
कुछ नया न जाने कैसे
विश्वसृष्टि का संवाद
अनझिप ज्योति की
निजता लिए
कल्पित रंगों के रसायन में
घुलमिल जाता
माप – माप कर
सहजवृत्त अमूर्तन की
अंतरदृष्टि
सविषयी तत्वों के
स्फुरण संग शाकम्बरी का
चेतन स्पर्श हो जाता है …