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Articles tagged with: चण्डीदत्त शुक्ल

साहित्य-सिनेमा-जीवन, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[12 Dec 2012 | Comments Off on हे आमिर! उल्लू नहीं है पब्लिक | ]
हे आमिर! उल्लू नहीं है पब्लिक

जनसत्ता के समांतर स्तंभ में चौराहा से साभार प्रकाशित
– चण्डीदत्त शुक्ल
आमिर खान साहेब नहीं आए। बुड़बक पब्लिक उन्हें `तलाश’ करती रही। सिर्फ पब्लिक नहीं, बांग्ला मिजाज़ में कहें तो भद्रजन भी। पुलिसवाले और लौंडे-लपाड़ियों के अलावा, शॉर्ट सर्विस कमीशन टाइप पत्रकार, रिक्शा-साइकिल-मोटरसाइकिल स्टैंड वाले भी। चौंकिएगा नहीं, शॉर्ट सर्विस बोले तो कभी-कभार ये धंधा कर लेने वाले। एक यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग पढ़ने वाले तमाम सत्रह-अठारह साल के छोरे-छोरियां पूरा का पूरा विश्वविद्यालय बंक करके उस भुतहा बस्ती में बिचर रहे थे। पहले उछलते-कूदते, फिर एक ग्लास पानी के लिए छुछुआते …

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[7 Dec 2012 | Comments Off on इस सदी की निहायत अश्लील कविता | ]
इस सदी की निहायत अश्लील कविता

– चण्डीदत्त शुक्ल @ 08824696345
*

जरूरी नहीं है कि,
आप पढ़ें
इस सदी की, यह निहायत अश्लील कविता
और एकदम संस्कारित होते हुए भी,
देने को विवश हो जाएं हजारों-हजार गालियां।
आप, जो कभी भी रंगे हाथ धरे नहीं गए,
वेश्यालयों से दबे पांव, मुंह छिपाए हुए निकलते समय,
तब क्यों जरूरी है कि आप पढ़ें अश्लील रचना?
यूं भी,
जिस तरह आपके संस्कार जरूरी नहीं हैं मेरे लिए,
वैसे ही,
आपका इसका पाठक होना
और फिर
लेखक को दुत्कारना भी नियत नहीं किया गया है,
साहित्य के किसी संविधान में।
यह दीगर बात है कि,
हमेशा यौनोत्तेजना के समय नहीं लिखी जातीं
अश्लील कविताएं!
न ही पोर्न साइट्स …

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[15 Jun 2011 | 3 Comments | ]
पंद्रह साल पुरानी कविता / चांद और सागर

कहते हैं, कागज़ की उम्र ज़रा-कम ही होती है। यक़ीनन… लेकिन एहसासों की? सो, ऐसे ही है ज़िंदगी। तब, शायद बीए का स्टूडेंट था, सो पहले-पहले इश्क के फेर में पड़के एक लंबी-सी कविता लिख मारी। लंबे वाले, पीले, रफ़ और फेयर के बीच वाले किसी रजिस्टर के तीन-चार पन्नों में लिखी ये कवितानुमा बकवास. मामला बस इतना ही कि कन्या का नाम चंद्रमातुल्य था, अब सीधे तो चिट्ठी लिख नहीं सकते थे, सो कविता लिखी। कविता में चांद के सारे गुण-अवगुण-उलाहने सब शामिल थे। हमें यह भी बताना था …

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[1 May 2011 | 11 Comments | ]
संत हुए मिलेनियर, बैरागी कौन?

जयुपुर के हिंदी अखबार डेली न्यूज़ की रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित कवर स्टोरी
धर्म या कारोबार, असली गुरु तलाशना बड़ी चुनौती
– चण्डीदत्त शुक्ल

वे कहने को संत हैं। गेरुआ पहनते हैं, पर संसार से विरक्त नहीं हैं। एसी कमरों में सोते हैं। हेलिकॉप्टर से उड़ते हैं। लक्जरी गाड़ियों में सफ़र करते हैं। माली हालत के हिसाब से खासे अमीर हैं। अरबपति, खरबपति हैं। दर्जन भर बैंकों में इनके सेविंग्स, रेकरिंग एकाउंट हैं। ये भाषण देते हैं, उसे प्रवचन का नाम देते हैं और इस `स्टैंडअप हीलिंग’ के उनके वीडियो और टेप बिकते हैं। …

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[25 Apr 2011 | 18 Comments | ]
फिर आना अखिलेश और हंसना जोर-जोर से!

`कभी-कभी मैं भी कहानियां लिखता हूं’, यूं ये कभी-कभी का वक्फा दो-तीन साल का भी हो सकता है और पंद्रह साल का भी। गुजिश्ता उम्र में अब तक महज आधा दर्जन कहानियां लिखी होंगी, सो उसमें भी कोई कमाल किया हो, ऐसा नहीं लगता। ये कहानी  एक साल पहले लिखी थी। उस दिन सोचा था, अब हर हफ्ते लिखूंगा, सोच लिया, सो कहानी के नाम पर फिर एक लाइन भी नहीं लिखी गई। ये कहानी महज एक जगह ही छपने के लिए भेजी, कल यूं ही किसी वज़ह से उस पत्रिका …