Home » Archive

Articles tagged with: चण्डीदत्त शुक्ल

स्मृति-शेष, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[16 Apr 2015 | Comments Off on `बीते वो दिन याद आए रे!’ | ]
`बीते वो दिन याद आए रे!’

दैनिक भास्कर के रसरंग में प्रकाशित। कॉपीराइट प्रोटेक्टेड।
याद गली से : शमशाद बेगम
बरसों-बरस शोहरत की बुलंदी देखी, कई साल गुमनाम रहीं, लेकिन कुछ तो बात है कि अपने जमाने की मशहूर सिंगर शमशाद बेगम के गले की खनक कभी पुरानी नहीं पड़ी। 1919 में अप्रैल की 14 तारीख को अमृतसर में पैदा हुईं और साल 2013 में 23 अप्रैल को 94 साल की शमशाद बेगम ने पवई (मुंबई) स्थित घर से अलविदा कह दिया। इसी आवाज़ के साथ-साथ यादों की गली में चलते हैं दो-चार कदम :
————————————————————-
– चण्डीदत्त शुक्ल
एक दिन …

है कुछ खास...पहला पन्ना »

[10 Apr 2013 | One Comment | ]
हर साल बस इंतज़ार

– चण्डीदत्त शुक्ल
धुंधली होती गई धीरे-धीरे गुलाबी जनवरी.
कोहरे की चुन्नी में बंधी रही,
जाती हुई फरवरी के चांद की हंसी.
मार्च की अलगनी पर टंगी रह गई,
तुम्हारी किलकन की चिंदी-चिंदी रुमाल।
अप्रैल, मई और जून पकते हैं मेरे दिमाग में,
सड़े आम की तरह,
बस अतीत की दुर्गंध के माफिक,
पूरी जुलाई बरसती है आंख
और कब बीत जाते हैं,
अगस्त, सितम्बर, अक्टूबर
कांपते हुए,
जान भी नहीं पाता।
तुम्हारे बिना मिला सर्द अकेलापन मौसमों पर भारी है.
नवम्बर के दूसरे हफ्ते की एक बोझिल शाम में याद करता हूं,
चार साल पहले के दिसम्बर की वो रात,
जब तुमने हौले-से
चीख जैसा घोल दिया …

संगीत-कला, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[5 Mar 2013 | Comments Off on RE-POST # कभी तनहाइयों में `मुबारक’ याद आएंगी | ]
RE-POST # कभी तनहाइयों में `मुबारक’ याद आएंगी

मुबारक बेग़म की तबियत बहुत नासाज़ है। एक ज़माने में हज़ारों दिलों को दर्द और सुरों से भर देने वाली मुबारक़ का अब कोई हालचाल भी लेने वाला नहीं। साल भर से भी ज्यादा वक्त हुआ, जब दैनिक भास्कर के ज़रिए मैंने इस खूबसूरत गायिका की तंगहाली की तरफ लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश की थी. आज वही आलेख रि-पोस्ट कर रहा हूं। कोई तो मदद करे मुबारक़ की!

– चण्डीदत्त शुक्ल
chandiduttshukla@gmail.com
महबूब के लबों ने चूमीं अंगुलियां। पलकें मीचीं, आंखों से छलके आंसू और थरथराने लगे …

यादें, स्मृति-शेष, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[4 Mar 2013 | Comments Off on यह संस्मरण नहीं, वे अब भी हैं साथ ही कहीं | ]
यह संस्मरण नहीं, वे अब भी हैं साथ ही कहीं

– चण्डीदत्त शुक्ल
मेरे शहर का नाम गोंडा है। धुंध, धूल, हंसी, उदासी, ठंड नारेबाज़ी और सरोकार – हर मौसम, हर एहसास, अपनी पूरी बुलंदी पर। सुना है – एक-दो मॉल खुल गए हैं – देखा नहीं। सोचता हूं – दिल्ली-बंबई की तरह वहां कार्ड से पेमेंट होता होगा, बैरे को टिप दी जाती होगी या फिर पुराने वक्त के हिसाब से बारगेनिंग, यानी `थोड़ा और कम करो’ की कवायद जारी होगी? खैर, बयान यहां गोंडा का करना नहीं था, ये सब बताने की गरज बस इतनी थी कि मेरा शहर …

चर्चाघर, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[22 Jan 2013 | Comments Off on कहानी अच्छी हो तो फ़िल्म ज़रूर चलेगी : अंकुश भट्ट | ]
कहानी अच्छी हो तो फ़िल्म ज़रूर चलेगी :  अंकुश भट्ट

दैनिक भास्कर के फ़िल्म सप्लिमेंट `नवरंग’ में प्रकाशित
दस्तक

`भिंडी बाज़ार’ जैसी प्रायोगिक और चर्चित फ़िल्म निर्देशित करने के बाद अंकुश भट्ट नई मूवी `मुंबई मिरर’ के साथ दर्शकों के सामने हाज़िर हो रहे हैं। अंकुश की यह फ़िल्म मुंबई शहर के अंधेरे पहलू, एक एड़ा (`सनकी’) पुलिस इंस्पेक्टर, बार डांसर और टेलीविजन पत्रकार के किरदारों के बीच घूमती है। `मुंबई मिरर’ का प्रमोशन करने फिल्म की स्टारकास्ट के साथ जयपुर आए अंकुश से हमने बातचीत की :

कहां तो `भिंडी बाज़ार’ जैसी एक्सिपेरिमेंटल फ़िल्म और कहां अब `मुंबई मिरर’ – जिसमें सारे …