Home » Archive

Articles tagged with: कहानी

साहित्य-सिनेमा-जीवन, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[31 Oct 2012 | Comments Off on खसम मरे तो रोणा पिटना यार मरे तो कित जाणा | ]
खसम मरे तो रोणा पिटना यार मरे तो कित जाणा

राम सरूप अणखी स्मृति कहानी-गोष्ठी
डलहौजी। राम सरूप अणखी स्मृति कहानी-गोष्ठी का आयोजन इस वर्ष डलहौजी के होटल मेहर में हुआ। इस साल गोष्ठी में हिन्दी, असमिया, पंजाबी, डोगरी कीकहानियों का पाठ स्वयं कहानीकारों द्वारा किया गया। संगोष्ठी के उदघाटन सत्र में संयोजक अमरदीप गिल ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया और तीनदिवसीय संगोष्ठी की रूपरेखा रखी। संगोष्ठी के आयोजक और कहानी पंजाब के सम्पादक डॉ क्रान्ति पाल ने इन संगोष्ठियों के आयोजन की सुदीर्घ परम्परा कोस्पष्ट करते हुए बताया कि समकालीन कथा रचनाशीलता को व्यापक तौर पर देखने समझने …

है कुछ खास...पहला पन्ना »

[23 Oct 2012 | Comments Off on अलविदा – सुनील दा : कस्तूरी की महक के कुछ पल! | ]
अलविदा – सुनील दा : कस्तूरी की महक के कुछ पल!

दुष्यंत
बंगाली के अत्यंत सुकोमल कवि और सबसे ज्यादा पठित कथाकारों में से एक सुनील दा का आज जाना क्या मायने रखता है, इसका ठीक-ठीक मूल्यांकन होने में समय लगेगा। सुनील गंगोपाध्याय से बस एक मुलाकात रही मेरी। वे दिल्ली के सर्दी के दुर्लभ धूपीले दिन थे। तब वे साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष भी नहीं हुए थे। कल्पनालोक में विचरण करते हुए बंगाली मेधा के बावले से प्रेमी युवक के रूप में उनसे मिलना एक ख्वाब सा था। कुछ क्षण ही रहे होंगे जब उनका सामीप्य मेरे जीवनानुभवों में शामिल …

है कुछ खास...पहला पन्ना »

[26 Apr 2011 | 11 Comments | ]
आठ बजने वाले हैं? Live From Channel one

(विवेक वाजपेयी `मुसाफिर’ टीवी पत्रकार हैं। उनके ब्लॉग का नाम भी है–मीडिया मुसाफिर। टेलिविजन के न्यूज  रूम को केंद्र बनाकर उन्होंने ये कहानी लिखी है और साथ में वैधानिक चेतावनी भी दर्ज कराई है–`कहानी की घटनाएं और पात्र काल्पनिक हैं इनका वास्तविकता से कोई लेना- देना नहीं है। अगर किसी पात्र या घटना से मिलान होता है, तो महज संयोग होगा। इसके लिए लेखक जिम्मेदार नहीं होगा।’ टेलिविजन की दुनिया में जाने वाले पत्रकारों के लिए तो ये कहानी वृहद अर्थों में `उपयोगी’ है ही, सामान्य दर्शकों को भी काफी …

दिल के झरोखे से..., साहित्य-सिनेमा-जीवन »

[25 Apr 2011 | 18 Comments | ]
फिर आना अखिलेश और हंसना जोर-जोर से!

`कभी-कभी मैं भी कहानियां लिखता हूं’, यूं ये कभी-कभी का वक्फा दो-तीन साल का भी हो सकता है और पंद्रह साल का भी। गुजिश्ता उम्र में अब तक महज आधा दर्जन कहानियां लिखी होंगी, सो उसमें भी कोई कमाल किया हो, ऐसा नहीं लगता। ये कहानी  एक साल पहले लिखी थी। उस दिन सोचा था, अब हर हफ्ते लिखूंगा, सोच लिया, सो कहानी के नाम पर फिर एक लाइन भी नहीं लिखी गई। ये कहानी महज एक जगह ही छपने के लिए भेजी, कल यूं ही किसी वज़ह से उस पत्रिका …

साहित्य-सिनेमा-जीवन »

[9 Apr 2011 | 3 Comments | ]
सबसे बेचैन दौर से गुज़र रही है कहानी

हिंदी कहानी के पात्रों की यात्रा पर प्रवेश कुमार का ये आलेख औपचारिक आलोचना दृष्टि से अलग बहुत-से विचारणीय बिंदु पेश करता है। प्रवेश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए कर रहे हैं और…। इस और…में जीवन के बहुत से सकारात्मक पक्ष छिपे हैं, जिन्हें शब्दों में बयां करना मुश्किल है। चौराहे की थड़ी पर प्रवेश का स्वागत

 
# प्रवेश कुमार
माला पिरोते वक़्त जब सुई की पतली नोक अंगुलियों में बार बार चुभ जाती है और बेचारी घायल अंगुलियाँ काँपती हुई अवसाद ग्रस्त हो कर ठहर जाती हैं | अंगुठे की ताकत …