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साहित्य-सिनेमा-जीवन, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[29 Mar 2012 | Comments Off on अलिखित कविताएं / डॉ. दुष्यंत | ]
अलिखित कविताएं / डॉ. दुष्यंत

मेरी कुछ कविताएं कभी नहीं लिखी गईं
उनका लिखा जाना अब नामुमकिन लगता है
जिन्हें छोड दिया था, मैंने किसी और दिन के लिए
या यह कहकर कि पकना है इन्हें
ऐसे ही थोडे कविता हो जाती है
पकती रही हैं वे सब कई सालों से
कई सालों उनके साथ रहा हूं, सोया हूं, खाया हूं, पीया हूं, उन्हीं के साथ जीया हूं
वे कविताएं होती तो जीना शायद आसान हो जाता
या कि उनका जन्म लेना भी ना होता जेहन में
तो और भी ठीक होता मेरा जीवन
वे पकती रही जैसे पकती है खेत में फसलें
और मौसमों के …

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[15 Jun 2011 | 3 Comments | ]
पंद्रह साल पुरानी कविता / चांद और सागर

कहते हैं, कागज़ की उम्र ज़रा-कम ही होती है। यक़ीनन… लेकिन एहसासों की? सो, ऐसे ही है ज़िंदगी। तब, शायद बीए का स्टूडेंट था, सो पहले-पहले इश्क के फेर में पड़के एक लंबी-सी कविता लिख मारी। लंबे वाले, पीले, रफ़ और फेयर के बीच वाले किसी रजिस्टर के तीन-चार पन्नों में लिखी ये कवितानुमा बकवास. मामला बस इतना ही कि कन्या का नाम चंद्रमातुल्य था, अब सीधे तो चिट्ठी लिख नहीं सकते थे, सो कविता लिखी। कविता में चांद के सारे गुण-अवगुण-उलाहने सब शामिल थे। हमें यह भी बताना था …

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[21 Apr 2011 | 2 Comments | ]
भूख – उस सदी, इस सदी में

पृथ्वी परिहार राजस्थान के हैं। दिल्ली में पत्रकारिता करते हैं। पेशे से ख़बरनवीस हैं और दिल से कवि। बोलबचन वाले लोगों से चिढ़ते हैं। वो कहते हैं–लगता है कि क्रांति बस हुई जाती है.. हम जैसे लोगों के लिए ही शायद भगत सिंह ने कहा कि ये लोग न तो क्रांति कर सकते हैं ना किसी क्रांति में हिस्सेदारी. भूखे, खाए अघाए- मिडिल क्लास से क्रांति की उम्मीद बेजा है. एक दोस्त ने लिखा कि अब पेशेवर क्रांतिकारियों की जरुरत नहीं, अपन मानते है कि जब से क्रांतिकारी पेशवर हुए …

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[20 Apr 2011 | 12 Comments | ]
मेरा अस्तित्व: वीर्य सा

स्त्री होना क्या है? सहज प्रेम, आनंद, समर्पण, स्वत्वबोध और अनुपम रागात्मक बोध या फिर कुंठा, अंतःसंघर्ष, कष्ट, झिझक…हम क्या बताएंगे, स्त्री ही जानती है कि वह क्या है…और यही स्त्री, जब कवि होती है, तो मन की बहुत-सी परतें परिभाषित होने लगती हैं, मूल स्वरूप में। ऐसी ही कवयित्री हैं अनीता शर्मा। पेशे से पत्रकार अनीता फिलवक्त इंडिया टुडे में बतौर सीनियर सब एडिटर कार्यरत हैं। जीवन में वह कितनी सकारात्मक सोच की मालकिन हैं, यह बात उनके ब्लॉग के नाम और कैचलाइन से भी प्रमाणित होती है। ब्लॉग …

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[19 Apr 2011 | One Comment | ]
अन्तस्थल के किसी कोने में / जैसे कुछ चुभता रहता है…

भोलानाथ शुक्ल ने वीडियो एडिटिंग की पढ़ाई की है। फ़िलहाल, एमए की परीक्षाएं देने में जुटे हैं। कविताएं लिखते हैं और लेख भी। उनकी एक और काव्य कृति चौराहा पर। भोलानाथ का ब्लॉग भी देख सकते हैं आप…

 
अनचाहे अनजाने में
कब कैसे कुछ हो जाता है
जगी  आँखों  का एक सपना  सा
सब कुछ मिलके खो जाता है
मीठे सपनों की दुनिया में
मन मयूर रम जाता है
जीवन के हर दुःख सुख से
दिल मस्ताना हट जाता है
अन्तस्थल के किसी कोने में
जैसे कुछ चुभता रहता  है
आप भी समझते होंगे शायद
दर्द जीव का क्या होता है