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Articles tagged with: कविता

है कुछ खास...पहला पन्ना »

[10 Apr 2013 | One Comment | ]
हर साल बस इंतज़ार

– चण्डीदत्त शुक्ल
धुंधली होती गई धीरे-धीरे गुलाबी जनवरी.
कोहरे की चुन्नी में बंधी रही,
जाती हुई फरवरी के चांद की हंसी.
मार्च की अलगनी पर टंगी रह गई,
तुम्हारी किलकन की चिंदी-चिंदी रुमाल।
अप्रैल, मई और जून पकते हैं मेरे दिमाग में,
सड़े आम की तरह,
बस अतीत की दुर्गंध के माफिक,
पूरी जुलाई बरसती है आंख
और कब बीत जाते हैं,
अगस्त, सितम्बर, अक्टूबर
कांपते हुए,
जान भी नहीं पाता।
तुम्हारे बिना मिला सर्द अकेलापन मौसमों पर भारी है.
नवम्बर के दूसरे हफ्ते की एक बोझिल शाम में याद करता हूं,
चार साल पहले के दिसम्बर की वो रात,
जब तुमने हौले-से
चीख जैसा घोल दिया …

दिल के झरोखे से..., है कुछ खास...पहला पन्ना »

[7 Dec 2012 | Comments Off on इस सदी की निहायत अश्लील कविता | ]
इस सदी की निहायत अश्लील कविता

– चण्डीदत्त शुक्ल @ 08824696345
*

जरूरी नहीं है कि,
आप पढ़ें
इस सदी की, यह निहायत अश्लील कविता
और एकदम संस्कारित होते हुए भी,
देने को विवश हो जाएं हजारों-हजार गालियां।
आप, जो कभी भी रंगे हाथ धरे नहीं गए,
वेश्यालयों से दबे पांव, मुंह छिपाए हुए निकलते समय,
तब क्यों जरूरी है कि आप पढ़ें अश्लील रचना?
यूं भी,
जिस तरह आपके संस्कार जरूरी नहीं हैं मेरे लिए,
वैसे ही,
आपका इसका पाठक होना
और फिर
लेखक को दुत्कारना भी नियत नहीं किया गया है,
साहित्य के किसी संविधान में।
यह दीगर बात है कि,
हमेशा यौनोत्तेजना के समय नहीं लिखी जातीं
अश्लील कविताएं!
न ही पोर्न साइट्स …

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[23 Oct 2012 | Comments Off on अलविदा – सुनील दा : कस्तूरी की महक के कुछ पल! | ]
अलविदा – सुनील दा : कस्तूरी की महक के कुछ पल!

दुष्यंत
बंगाली के अत्यंत सुकोमल कवि और सबसे ज्यादा पठित कथाकारों में से एक सुनील दा का आज जाना क्या मायने रखता है, इसका ठीक-ठीक मूल्यांकन होने में समय लगेगा। सुनील गंगोपाध्याय से बस एक मुलाकात रही मेरी। वे दिल्ली के सर्दी के दुर्लभ धूपीले दिन थे। तब वे साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष भी नहीं हुए थे। कल्पनालोक में विचरण करते हुए बंगाली मेधा के बावले से प्रेमी युवक के रूप में उनसे मिलना एक ख्वाब सा था। कुछ क्षण ही रहे होंगे जब उनका सामीप्य मेरे जीवनानुभवों में शामिल …

साहित्य-सिनेमा-जीवन, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[19 Apr 2012 | One Comment | ]
मेरे न होने पे, मेरी तसवीर न लगाना…

– गार्गी मिश्रा
नाम तो नहीं लिखता कोई खुद का
और टांगता दीवारों पर…
क्या भूला है कभी खुद का नाम?
इश्क की बात कुछ और है…
नाम लिखना किसी के नाम के साथ रिवाजों सा है…
पर सुनो, इन रिवाजों से दूर ही रहना तुम
झूठी-मूठी लगने लगोगी … और फिर तुम्हारा वो “सच्ची मुच्ची” नहीं मानूंगा मैं…
तुम्हें न घूंघट करवाया है, ना तीज का व्रत
अपने ही घर पे क्यूं किरायेदार बनोगी?
सच-सच बताओ ज़रा
नावेल वाली रैक पे जमी धुल कब साफ़ की थी पिछली बार?
जब उतारती हो चढ़ के पीढ़े पे अचार का मर्तबान, तुम्हारे नाखूनों …

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[16 Apr 2012 | Comments Off on म्यां, नाराज़ क्यूं हो? | ]
म्यां, नाराज़ क्यूं हो?

– चण्डीदत्त शुक्ल
नाराज़ हो,
मेरे से.
म्यां,
कोई नई बात कही होती.
ये क्या,
भूत भगाने को,
इबादत की खातिर
लोहबान जलाना.

कभी
गुड नाइट छोड़के
मच्छर-मक्खी भगाने कू लोहबान जलाओ न.
अमां.
दिल के जले से मूं फुल्लाने वाले तुम कोन-से नए आदमी हो
किसी टकीला वाले अंबानी से गुस्सा के देखो.
आशिक को तो गली का कुत्ता भी भूंकता है
पूरा पंचम राग में
तार सप्तक छेड़ते हुए
ऊं-ऊं-उआं करके रोता है,
किसी रात साला किसी दरोगा पे रोके दिखाए
नाराज़ मती होओ
हम इश्क के मारे हैं,
तुम्हारी नाराज़गी बेकार जाएगी।
किब्ला.
इश्क ही कल्लो
नाराज़गी फरज़ी लगैगी
फिर तो,
एक ही कंबल में मूं लपेटे हमारे साथ पड़े रहोगे.
ये रोग किसी …