Home » Archive

Articles tagged with: कला

संगीत-कला, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[12 Apr 2011 | One Comment | ]
एक शाम कवि की निगाह में खिल गए रंग

वे दीवानगी की हद तक लिखने-पढ़ने के आशिक हैं। यूं, पेशे से संपादक हैं, पर कभी-कभार दिल कहता है, कहीं दूर चल, तो छुट्टियां लेके कुछ-कुछ जगहों पर वक्त गुज़ारने और लिखने-पढ़ने …अब इसे काम कैसे कहूं…चले जाते हैं। पिछले दिनों वे अहमदाबाद में थे। दोस्तों की पेंटिंग एक्जिबिशन थी, सो दोस्त का होना लाजिमी ही था। ये कोई और नहीं, अपने दुष्यंत ही हैं। बेहतरीन कवि, लेखक, संपादक। जयपुर में रहते हैं, गंगानगर के रहने वाले हैं और दिल कमबख्त काबू में रहता नहीं, सो दूर-दूर टहलता रहता है। …

दिल के झरोखे से..., संगीत-कला »

[8 Apr 2011 | 2 Comments | ]
पढ़ना-देखना एक कवि की पेंटिंग्स के शब्द

गुलाबी शहर के खूबसूरत और खूबसीरत कलाकार हैं अमित कल्ला। कवि भी हैं। बगैर दहेज के विवाह करने वाले साहसी अमित कल्ला की पेंटिंग्स और कविताओं में जीवन का जटिल पर ज़रूरी दर्शन छुपा है। शब्दों और रंगों का गठजोड़ संभवतः अंतर्मन की छटपटाहट, कौतूहल, आशा-निराशा, नाराज़गी और उत्साह का खुलासा कर सके। उनकी काव्य-रंग कृतियों को पेश करने का सौभाग्य चौराहा को मिला है, इसके लिए अमित का आभार भी : मॉडरेटर
 
किसका सगा

अपनी ही
बिछाई चौसर पर
बहुपाश में कसता
देख सकता हूँ
सन्नाटा
आखिर
किसका सगा है
अन्धकार
लगातार

लगातार
अपने साथ ले जाता
कैसा लचकीला
ज़ार – ज़ार बहुधा दिखाई देता
ताइरे – अर्श सा
सच
मोह लेता है
परिवास
जरणा जोगी बन
कागज़ के टुकड़े संग
गहरे समंदर की
यात्राओं पर निकल जाता
देखता
टकटकी लगा
उसी ध्रुव तारे को
बनाया जिसे
अपना ईश्वर
लगातार
ध्यान मग्न
कल
चले जाएंगे
धूनियों को छोड़
अस्थाई डेरे त्याग
प्रस्थान
गंतव्यों की ओर
शिप्रा
यथा ही बहेगी जब तक
महाकाल रहेंगे
ध्यान मग्न
कैसी दुविधा
कैसी दुविधा
बुदबुदाता
छूना चाहता है
बेआवाज़ ही रख देता
हर रंग, हर कहानी
कैसा
अकेला ही पाता
ऋत पर विजय
वैसे भी
किसे देखतीं
अन्दरुनी निगाहें
तह पर तह जमती जाती
सच
आग है निर्वसन
हाथ जोड़े , हिचकोले खाता
संगेमरमर पर
फिसलता है
यहाँ-वहाँ के खेलों के बीच
कभी छू लेता
आकाशीय चेतस वर्षा
अक्षीय बंध संग
कैसी दुविधा
पलक – पलक अगहरूप
आखिर कौन
लौटता  हैं वापस
उन धुरियों के बीच ,
दिखाई पड़ता जहाँ
अंतर्मन का कोलाहल
निहितार्थ ही
अधूरा नहीं
छोड़ देता
जुलाहा ,
मृत्युजेता पवन के
आस्वादन का
ताना-बाना ,
हर इक शब्द
उस
जागते अवधूत का
अविज्ञात
अध्याय हो जाता है
समानांतर ही
ठहरा समय
विराट वृक्ष की ओट ले
मलय राग गाता,
अर्धचंद्र ,
बसंत में डूबी देहर को
पंक्ति – पंक्ति मायारस
चखा
अनासक्त हो
जुगजुगाते तारे संग आँखे खोले
पलक – पलक
अगहरूप सा
बेखौफ़ ,
सीधे कदम रखने की
ज़हमत उठाता है
हिये का बैरी
अजन्मे
स्वप्न को छूकर
निरंतर लहर दर लहर
माटी के सिकोंरों में
बूढे सितारों संग
अकेला ही
तैरता हिये का बैरी
वह…
चमचमाता पुखराज !
कैसा
दीर्घकाल तक

आसुरी
आवरणों के बाहर दीर्घकाल तक
कुछ नया न जाने कैसे
विश्वसृष्टि का संवाद
अनझिप ज्योति की
निजता लिए
कल्पित रंगों के रसायन में
घुलमिल जाता
माप – माप कर
सहजवृत्त अमूर्तन की
अंतरदृष्टि
सविषयी तत्वों के
स्फुरण संग शाकम्बरी का
चेतन स्पर्श हो जाता है …