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Articles tagged with: अहसास

है कुछ खास...पहला पन्ना »

[16 Apr 2011 | 4 Comments | ]
बिना ढोलक छेड़ देता राग / साला सूखे गले की कव्वाली था

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफ़सर से आप उम्मीद करेंगे कि वो बेखौफ़ सच बोलेगा? नेताओं की पोल खोलेगा? उन्हें व्यंग्य-वाण का शिकार बनाएगा? हां, ये मुमकिन है, अगर उस अफसर का नाम हो रितुराज मिश्रा। रितुराज ने चेहरों की किताब पर कुछ टिप्पणियां लिखीं, जिनमें विभिन्न आंदोलनों के संदर्भ शामिल हैं। महज सियासी हलचल ही नहीं, मानवीय संवेदनाओं की तड़प और लालसा भी उनके संक्षिप्त किंतु सारगर्भित लेखन का बेहतरीन हिस्सा हैं। हमारे कॉमन मित्र दिग्विजय चतुर्वेदी ने इनका संकलन और रितुराज का परिचय मुहैया कराया है, जो हू-ब-हू यहां …

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[13 Apr 2011 | 3 Comments | ]
मम्मा…प्यारी मां…मम्मा

मां क्या है, कोई पूछे, उस जवान आदमी से, जिससे बचपन रूठकर बचपन में ही हाथ छुड़ाके भाग गया था। लोरी कैसी होती है, ट्रैफिक के शोर के बीच भकुआए खड़े गांववाले से पूछना, जो डीटीसी और ट्रक के बीच भागकर सड़क पार करना चाहता है। कंकरीट के जंगलों से खुरदुरी हुई दिल्ली में पहाड़ से आई हवा जब बेचैन होती है, तो चंदा मामा को तलाशती है…मां को पुकारती है। गांव से दूर, शहर की खोजबीन में तल्लीन इसी बचपन का नाम है पंकज नारायण। पंकज दिल से कवि …