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बिना ढोलक छेड़ देता राग / साला सूखे गले की कव्वाली था

16 April 2011 4 Comments

रितुराज

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफ़सर से आप उम्मीद करेंगे कि वो बेखौफ़ सच बोलेगा? नेताओं की पोल खोलेगा? उन्हें व्यंग्य-वाण का शिकार बनाएगा? हां, ये मुमकिन है, अगर उस अफसर का नाम हो रितुराज मिश्रा। रितुराज ने चेहरों की किताब पर कुछ टिप्पणियां लिखीं, जिनमें विभिन्न आंदोलनों के संदर्भ शामिल हैं। महज सियासी हलचल ही नहीं, मानवीय संवेदनाओं की तड़प और लालसा भी उनके संक्षिप्त किंतु सारगर्भित लेखन का बेहतरीन हिस्सा हैं। हमारे कॉमन मित्र दिग्विजय चतुर्वेदी ने इनका संकलन और रितुराज का परिचय मुहैया कराया है, जो हू-ब-हू यहां पेश है : Mr. Rituraj Misra, passed out from IIT Kharagpur in 2007 after completing Btech-MTech in Mechanical Engineering had been the one of the founding directors of ”Exergy”a leading company dealing in solar power plant and presentlty he is in Indian Administrative Services belongs to kanpur…अब पढ़िए, रितुराज की टिप्पणियां–मॉडरेटर

 

1) संदर्भ : अन्ना का अनशन

जो अब तक नोटों पे चस्पा था,
चौराहों के बुतों में कैद था,
राजघाट में कई बरसों से दफ़न था,
कल शाम एक झलक
मुझे ‘जंतर मंतर’ पर दिखा
और फिर वही चेहरा गहरा
और साफ़- साफ़
चलते टी.वी. के पास बैठी
मेरी नौ साल की
भतीजी की आँखों में दिखा…

2) होली

‘रंगी भीड़’ दौड़ पड़ी
और एक ‘ कोरे आदमी ‘ को
लाख मिन्नतों के बाद भी रंग दिया
और फिर वो उसी भीड़ का हिस्सा हो कर
एक ‘कोरे आदमी ‘ की तलाश में बढ़ चला …

3)  जापानी सुनामी

मुझे याद है
बचपन में तुम कितना रोई थीं,
जब बालू का घरौंदा बहा ले गई थी लहर
और आज जब
चैनल में आ रहा था
‘सचमुच के शहर के बहा कर ले गयी है लहर’,
फिर भी तुम्हारा हाथ नहीं रुका,
आटे सने हाथों से ही चैनल बदल दिया…

4) मेहनतकश बचपन

‘वो’ और ‘दुनिया’
एक-दूसरे की ओर देखकर
आज फिर मुस्कुराए,
उसके हाथ में बूट पालिश थी,
दुनिया के जूतों पर शहर भर की धूल…

5)  कश्मीर

हमारा उद्देश्य कश्मीर की आत्मा को जीतना है,
उसके शरीर को हराना नहीं …

6)दिल्ली की सर्दी….

कल रात
जलते अलाव के एक ओर
मैं था
दूसरी ओर
वो दोनों
सफ़ेद फर और काली चित्ती वाले
जो आदमी की संगत  से इतने दूर थे
कि कोई नाम नहीं मिला था उन्हें
इतने पास थे कि
‘आवारा कुत्ते’  कहकर दुत्कार दिए जाते थे
घंटों हम तीनों अलाव तापते रहे
वो आपस में खिलवाड़ करते रहे
मैं गुनगुनेपन  और धुएं के बीच
गुनगुनापन चुनता रहा
और सोचता रहा
जो समाजवाद लेनिन-माओ नहीं ला पाए
वो दिल्ली की सर्दी ले आई …

7) बैसाखी नहीं, मुझे चुनौतियाँ दो

मुझे अकेले चलने दो
मुझे लड़ कर अपने रस्ते बनाने दो
अगर गिरूँ
तो खुद ही सम्हलकर उठ खड़े होने दो
सहारा नहीं, मुझे हौसला दो
बैसाखी नहीं, मुझे चुनौतियाँ दो
सहानभूति वाला कोई हाथ नहीं
दे सकते हो तो मुझे आत्म-सम्मान से गले मिल सकने वाली दोस्ती दो
मैं रास्ते पर पसरी कोई हथेली नहीं
जिसे तुम कुछ सिक्के थमाओ और आगे बढ़ जाओ
न ही  मैं किसी चैरिटी की रसीद हूँ
जिसे दस्तखत कर के भुलाया जा चुका है
मैं बैसाखी पर चलती
परन्तु उस दो पैरों वाली दुनिया को शर्मसार करती अंतहीन संकल्प शक्ति हूँ
मैं बिन बाँह
परन्तु उसी गर्मजोशी के साथ  दुनिया से  हाथ मिलाती निष्कंप इच्छाशक्ति हूँ
मैं बिन शब्दों के अपनी बात कहती
“क्रिकेट मैच में भारत की जीत ”
पर उतनी ही ऊर्जा के साथ
विजय घोष करती अदम्य जीवनी शक्ति हूँ
मैं बिन आँखों के सपने सजोती
और उन्हें पूरा करने के लिए  जमीनी सच्चाईयों की महीन सुइयों में विश्वास का अटूट धागा पिरोती
वो ‘ शक्ति ‘ हूँ
जिसकी माप शारीर के आधे या पूरे होने से नहीं
जिसकी माप दिमाग के आधे या पूरे होने से नहीं
इन दोनों से अलग
एक रहस्यमयी सी ताकत से होती है
जो संघर्ष का आधार है
जो जूझने की प्रेरणा है
जो सबमें मौजूद है
पर मुझे विश्वास है कि मुझेमें और मेरे जैसों में वो कई गुनाओं में ज्यादा है
मैं जानता हूँ
लड़ाई हथियारों से नहीं हिम्मतों से जीती जाती है
युद्ध सेनाओं की संख्या से नहीं जूनून से जीते जाते हैं…

8)आजाद कश्मीरनहीं, “आबाद कश्मीर” की ज़रूरत है

सोचने की ज़रूरत है सच में
सोचने की ज़रूरत है
इसलिए नहीं कि गिलानी चीखता है
इसलिए नहीं कि अरुंधती रोती है
पर इसलिए वो कश्मीरी बच्चा
अब नहीं मुस्कुराता
पर इसलिए कि वो अल्ल्हड़ लड़कियाँ
कई दिनों से नहीं निकली हैं
घर से किसीअनजाने डर से
पर इसलिए टूटे मंदिर का पुजारी
कई सालों से दिखा नहीं
पर इसलिए कि जली मस्जिद के मौलाना की अजान में
अब वो बात नहीं
सच में सोचने की ज़रूरत है कि
उन शैतानी भूल चुके बच्चों, उन सहमी लड़कियों,
उस मौलाना  और पंडित को
“आजाद कश्मीर ” की नहीं
“आबाद कश्मीर” की ज़रूरत है ….

9)  बिहार में चुनाव

अब नए भारत की जनता
“बटन” से भाग्य बदलना जानती है
“हथेली की रेखाओं” और “अंगूठे” को छोड़,
छोटी वाली उंगली से
क्रांति रचना जानतीहै

10) विदर्भ किसान आंदोलन

वो किसान था
वो चुनावी मुहर और निशान था
खाली बेंचों वाले संसद का सवाली था
कभी खुद को जला देता था
कभी जला देता था सरकारी बसें
साला बड़ा बवाली था
बिन गुझिया की होली था
बिना तेल की दीवाली था
बिना सुर बिना ढोलक
छेड़ देता था राग
साला सूखे गले की कव्वाली था

4 Comments »

  • mangal said:

    bahut behtar …

  • deepak said:

    sahi hai bhai

  • पंकज झा. said:

    सुन्दरतम…..संवेदंशीलतम्.

  • Sudhanshu Shekhar said:

    Atal ji…macha diye….congrats for everything!!