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गिनती में आए हिंदू-मुसलमान / बरगद जानता न था फ़र्क करना

14 April 2011 2 Comments

बरगद मयंक सक्सेना की कविता है…या यूं कहें, उनका दर्द। उन्होंने क्यों लिखी बरगद-कथा-व्यथा? बता रहे हैं खुद :

ये वो दर्द है, जिसे अयोध्या पर न्यायालय का फ़ैसला आने के पहले…उसी अयोध्या में खड़े होकर महसूस किया गया था….जिसके नाम का मतलब है–वो जगह जहां कभी युद्ध न हो….और फिर भी उसी के नाम पर कितना फ़साद हुआ….पिछले 18 साल से एक जीता-जागता शहर…एक ज़िंदा शहर…एक ज़िंदगी का शहर…एक इंसानों का शहर…हिंदू-मुसलमानों के शहर में बदल दिया गया….अयोध्या, जिसे शायद शांति का प्रतीक होना चाहिए था…विवादों की वजह से पहचाना जाता है…अयोध्या पिछले 18 साल से वहीं है…जहां राजनीति के जुआरी और धर्म के ठेकेदार उसे छोड़ आए थे…वो पेड़ ठूंठ है…तब से अब तक इंतज़ार में है कि कब 2 दशक से चला आ रहा पतझड़ का मौसम जाए…और उसकी सूखी डालियों में कोई एक नई कोंपल फूट पड़े….कविता का शीर्षक है बरगद…बरगद जो अयोध्या है….दरअसल ये कविता, कोई कविता नहीं, बल्कि एक कहानी है…क्योंकि हर कहानी में एक कविता है…और हर कविता में कई कहानियां…अयोध्या की उन सभी गुमनाम कहानियों को समर्पित है ये कविता…जो शिकार हो गई, तिलक और टोपी की राजनीति की…और हमारी खामोशी की…


कहीं, किसी शहर में, एक सड़क पर

एक पंछी ने

कुछ बीज छिटकाए

मौसम ने

कुछ बीज पनपाए

उगा एक

बरगद

उस मंदिर के आंगन में

बढ़ता गया
हो गया आदमकद
फिर बन गया बुत
औरतों ने
उस पर धागे कसे
परिक्रमा की, उपवास रखे
उसकी डालियों पर, जटाओं पर झूले
बच्चे हंसे ,
हुआ वो गदगद
और चढ़ा, और बढ़ा
बढ़ती ऊंचाई, फैलती शाखाएं
झूमती जटाएं
निकल मंदिर के आंगन से
पहुंची पड़ोस के बरामदे में
छा गई
मस्जिद के वजू के हौज पर
छांव करने लगीं नमाज़ियों के सर
बरगद पर बसने लगे
परिंदे
बुनने लगे घोंसले
किसी को भगवान मिला
किसी को खेल
किसी को छांव
और
पंछियों को घर
एक दिन मगर
शहर में आग सी बरसी
मरे इंसान
पर
गिनती में आए हिंदू-मुसलमान
बरगद
जानता न था फ़र्क करना
पर
एक दिन
उससे पूछे बिन
इंसानों ने किया गजब
बना दिया
उसका भी मज़हब
तिलक बोला, “बरगद हिंदू है”
टोपी ने कहा, “मुसलमान”
बरगद कुछ न बोला
रह गया बस हैरान
फिर तिलक त्रिशूल बन गया
टोपी तलवार
मचा हाहाकार
कुछ भी पहले सा न रहा
उस साल बारिश न हुई
बस खून बहा
अब बरगद के चारों ओर
ख़ाकी का पहरा है
जहां चहकते थे परिंदे
अब
सन्नाटा गहरा है
मंदिर में कब से
बरगद सींचा नहीं गया है
मस्जिद पर छाई डालियों को
काट दिया है
न वहां पूजा है, न नमाज़
न खेलते बच्चे हैं
न गाती औरतें
और
न सुस्ताते नमाज़ी
पंछी
जो अजान से जागते थे
आरती के वक़्त
घोंसलों में भागते थे
मंदिर में दाने चुग कर
वजू के पानी पर
झुककर
करते थे ज़िंदगी बसर
पंछी वो
अब दर बदर हैं…
मंदिर में अभी भी बज रहे हैं शंख
नमाज़ में झुक रहे सर हैं
लेकिन इंसानों के झगड़े में
बरगद ठूंठ…..
और पंछी
बेघर हैं…

2 Comments »

  • Tripurari Kumar Sharma said:

    रामवृक्ष बेनीपुरी की कहानी ‘वटवृक्ष’ याद-सी आ…आ के रह गई…

  • पंकज झा. said:

    सुन्दर एवं संवेदनशील.