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मम्मा…प्यारी मां…मम्मा

13 April 2011 3 Comments

मां क्या है, कोई पूछे, उस जवान आदमी से, जिससे बचपन रूठकर बचपन में ही हाथ छुड़ाके भाग गया था। लोरी कैसी होती है, ट्रैफिक के शोर के बीच भकुआए खड़े गांववाले से पूछना, जो डीटीसी और ट्रक के बीच भागकर सड़क पार करना चाहता है। कंकरीट के जंगलों से खुरदुरी हुई दिल्ली में पहाड़ से आई हवा जब बेचैन होती है, तो चंदा मामा को तलाशती है…मां को पुकारती है। गांव से दूर, शहर की खोजबीन में तल्लीन इसी बचपन का नाम है पंकज नारायण। पंकज दिल से कवि हैं, काम से लेखक, फ़िल्मकार और, और भी पता नहीं क्या-क्या। लिखते हैं, तो अल्फाज और अहसास की जुगलबंदी होती है। मां को महसूस करते हुए दिल से निकली उनकी कुछ बातें, चौराहा पर : मॉडरेटर, चौराहा

 

कहां हैं तेरी हथेलियां

तेरे बारे में खूब बातें करता हूं तुम्हारे मुंह बोले भाई से (वही अपने चंदा मामा)। मां तुम पास नहीं होती हो तो तुम्हारे इन्हीं रिश्तेदारों के साथ नानी की कहानी वाले बंगले में रहता हूं। वहां रात खुले छत पर बिस्तर जैसी होती है और खामोश आसमान में मेरी अकेली उंगली तुम्हारी आंखें बनाती हैं। वो आंखें जिनसे रोज टपकता हूं तुम्हारी हथेली पर। मां! तुम्हारी हथेलियों से दूर होकर धरती जैसा गोल चेहरा सुनसान सड़क जैसा लंबा हो जाता है।

मां की आंखों से निकलती पिछली सदी

रहस्य को खोलती जुबां हमेशा ज़मीन से निकलती है, नई फसल की तरह। नई फसल सपनों की नमी से निकलती है, एक औरत की तरह। एक औरत निकलती है एक औरत से ही, पिछली सदी की तरह। पिछली सदी निकलती है मां की आंखों से मेरी तरह।

चेहरे का गोल कटोरा

रोज़ पैदा होने की आदत एक बच्चे को पंकज नारायण बना देती है।यह कल मां को नहीं बता सका फोन पर। पूछा-और कितने साल लगेंगे तुम्हें गांव लौटने में। याद दिलाया कि आधी से ज्यादा मन्नतें अभी नहीं उतारी। कहा कि किसी शहर के हॉस्पिटल में नहीं आया मैं बल्कि गांव की एक गंवार दाई का करिश्मा हूं।उन्हें दोनों हथेली में भरा हुआ चेहरे का गोल कटोरा चाहिए। शहर की हथेली का एक नवजात हूं, जिसे पोछ-पाछ कर वापस चाहती हैं मां, दुलारने के लिए…

ओस की बूंदों पर ठहरा रात का घूंघट

जब भी यादें देर रात तक पीछा करती हैं, वहां चला जाता हूं जहां सूरज और चांद ‘ट्विंकल- ट्विंकल लिट्ल स्टार’ खेलते हैं। ओस की बूंदों पर रात अपना घूंघट भूल कर चली जाती है और सितारे किसी नशेरी की तरह पी कर उलट जाते हैं। तब साफ आसमान में अपनी उंगलियों से बनाता हूं तुम्हारा चेहरा। अपने ख्वाबों से तुम्हारी आंखें, हवाओं से तुम्हारे बाल, अपनी गलतियों से तुम्हारे होठ…इसी तरह के बहुत सारे मैटेरियल से तुम्हें रचता हूं मां…

कई चिरागों की रोशनी पी गई स्ट्रीट लाइट

पता नहीं मां को किसने बता दिया कि गांव के कई चिरागों की रोशनी पी कर शहर की एक स्ट्रीट लाइट जलती है। अपनी हथेलियों में गोल चेहरे को भर कर एकटक देखती मुस्कुरा उठती थी मां। उदास पलों में इस गोल कटोरे से उड़ेल लेती थी अपनी आंखों में भर पेट रोशनी। मां को शहर के सजने से कोई दिक्कत नहीं है, उसे बस इतना डर है कि बेटा किसी स्ट्रीट लाइट की दो- चार घूंटों में न बदल जाए। मां को तो बचाना होता है अपना गोल कटोरा।

कविताओं में आओ मां

अपने होने के आगे फुल स्टॉप, कॉमा या प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने से पहले तुम्हारी याद आती है मां। सोचता हूं कि मेरा होना तुम्हारी आंखों के किस सपने की हकीकत है। नौ महीने में सोचा गया कौन सा वाक्य हूं मैं। मां कभी मेरी कविता में आओ। शायद वहीं भूल आयी हो अपना आंचल, जिससे अकसर लिपटा रहता हूं। साल में एक बार मदर्स डे आता है लेकिन मेरी आंखों में तो हर वक्त मदर्स नाइट होती है और मेरी सांसों के संगीत में जीती- जागती लोरी…

दूर देश में बैठी मजबूर याद

कौन बनाता है अब कागज की नाव, मिट्टी के घरौंदे वगैरह। मालिक के बेटे ने मार गिराया है दर्जनों गुडों को हाइ स्कोर के साथ वीडियो गेम में और कलुआ ने कालीन पर चाय गिराकर खा लिया है एक शानदार थप्पड़। मालिक के बेटे और कलुआ की मासूम कोशिशों से राहत में है तितलियां। एक तरफ बचपन और पचपन की दूरी घट गई और दूसरी तरफ दूर देश में बैठी एक मजबूर मां ने आंखे पोछते हुए अपने लाडले को याद किया।

पानी पर चांद रख कर एक रात बनाऊं

जंगल में छोड़ देने वाली एक सड़क जैसी तुम्हारी मुस्कुराहट के बाद शायद मैंने सोचा कि रात भर पहाड़ के पीछे छुप कर सुबह निकलने की कितनी तैयारी करता होगा सूरज। जब विज्ञान चांद पर पहुंच चुका है फिर क्या करने आता है वही चांद मेरा मामा बन कर मेरे सपनों से रिश्ता कायम करने। मुस्कुराओ कि पानी पर चांद रख कर एक रात बनाऊं। देखा देखा, जमीन में बोया मैंने एक पहाड़ और आसमान में उगी तुम्हारी मुस्कुराहट।

…फिर बादल की जेब में घुस गया चांद

खिलौने की आंखों से मेरे भीतर बचपन खोल कर अभी- अभी चांद बादल की जेब में घुस गया है। कितनी सुंदर होती थी बचपन की फटी जेबें, जिससे गिर जाती थी दो-चार निर्दोष मुस्कुराहट और मिल जाती थी किसी उदास चेहरे को लाखों रुपये की तरह। चांद, बादल, सूरज ये सारे खिलौने हुआ करते थे हमारी मासूम ज़िदों में बहलाने के लिए। कभी-कभी बड़ा मन होता है रात की गोद में कूद कर कुछ खिलौने ढूंढ लूं और फाड़ दूं अपनी जेब फिर से, जहां से गिरे कुछ…

मां की ओर से

लौट आओ कि जरूरत है डबडबाई आंखों के नीचे चार उंगलियों की। घर लौटते झुंड में से अकेली छूट गई चिड़िया से पूछना कि सर रखने के लिए किसी अपने कंधे की तलाश का क्या मतलब होता है। पता कर लेना अपने साथ चल रही मीठी थपकियों से कि बीती रातों में तुम्हें कितना याद किया गया है। लौट आओ क्योंकि लौटना भी एक मौका है किसी नए सफर के लिए…

3 Comments »

  • मयंक सक्सेना said:

    पंकज,
    हालांकि ये ठीक बात नहीं है कि आप हर रोज़ कुछ ऐसा रच दें कि मुझे खुद को कवि कहते हुए भी दस बार सोचना पड़े…दूसरों के खुद को लेखक कहने पर मुझे अपराधबोध हो…और ज़ुबान खोलते हुए हर वक़्त महसूस हो कि कहीं आप सुन तो नहीं रहे…पंकज ये वाकई ग़लत है कि आप ऐसा लिख दें कि मेरे रचे काले जीव जम कर मूर्ति बन जाएं…और आपको पढ़ कर मन में पड़े पत्थर मोम सा पिघल कर बह उठें…
    पंकज…आश्चर्यजनक…पता नहीं कैसे रचते हो ऐसे चार पंक्तियों के महाकाव्य….आंसू आ गए पढ़ कर…गर्व हुआ कि ये मैं आपके मुंह से भी सुनने का साक्षी रहा हूं….लिखते रहिए…अभी आपसे हमें बहुत सीखना है…
    सबसे प्रिय…लौट आओ कि जरूरत है डबडबाई आंखों के नीचे चार उंगलियों की। घर लौटते झुंड में से अकेली छूट गई चिड़िया से पूछना कि सर रखने के लिए किसी अपने कंधे की तलाश का क्या मतलब होता है। पता कर लेना अपने साथ चल रही मीठी थपकियों से कि बीती रातों में तुम्हें कितना याद किया गया है। लौट आओ क्योंकि लौटना भी एक मौका है किसी नए सफर के लिए…ये हिस्सा अद्भुत है….
    और हां चंडी दादा का आपका परिचय भी बेहतरीन लेखनी का नमूना है….
    आप दोनो को धन्यवाद…जयकारों की भीड़ में कुछ वाकई संजीदा पढ़वाने के लिए…

  • Swapnil said:

    पंकज भाई एक अलग स्थान रखते पंकज भाई एक अलग स्थान रखते हैं युवा रचनाकार जगत में. इसमे कोई संदेह नही.हैं युवा रचनाकार जगत में. इसमे कोई संदेह नही.

  • Lata Ojha said:

    Shabdon mein ek nayi aakriti ko gadna aapke liye jaise khel hai..taazgi,vichaaron ki gahrai aur shabdon ki saarthakta ka mel hai..aapki har abhivyakti saraahneey hai 🙂