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तुझे धिक्कार है दिल्ली

13 April 2011 One Comment

– आवेश तिवारी

दिल्ली अब दिल वालों की नहीं रही ,कंक्रीट के इस शहर ने यहाँ के लोगों के दिलों को भी पत्थर का कर दिया है ,सबके सब भागते हुए अनंत की ओर |अगर ऐसा न होता तो क्या अनुराधा मरती ?नोएडा के सेक्टर २९ में दो बहनों का सात महीने तक खुद को एक कमरे में बंद रखना और पास पड़ोस में किसी को खबर तक न होना  बताता है ,कि आज की दिल्ली न सिर्फ अमानवीय और  क्रूर है बल्कि दिल्ली वालों के सामाजिक सरोकार  भी पूरी तरह से ख़त्म हो चुके हैं ,खुद के लिए जीने वालों का ये शहर देश का सबसे संवेदनहीन शहर बन गया है |आज दिल्ली जन अदालत में है ,और इसे होना भी चाहिए |आम आदमी की बेबसी और  उदासी के खिलाफ साजिश रचती आ रही इस  दिल्ली की बेशर्मी के खिलाफ ये बहुत पहले हो जाना चाहिए था |

दिल्ली अभी खुद को नहीं पहचान पायी है वो किसकी है .जो लाखों लोग बिहार उत्तर प्रदेश से यहाँ रोजी रोटी की तलाश में आये हैं उनकी है ,?धन के अथाह साम्रज्य  पर राज करने वाले बनियों की है ? नेताओं की है या फिर यहाँ की छोटी बड़ी घटनाओं पर सुर्खियाँ बनाने  वाली मीडिया की है ?जो भी हो एक बात तो साफ़ है ज्यादातर दिल्ली उनकी है जिनके जेब में इतने पैसे हैं जिनसे वो  जब चाहें तब अपनी खुशियाँ बटोरने और दूसरों की उदासी से मुंह मोड़ने का काम कर सकते हैं |शायद ये माना न जाए,मगर ये सच है कि  यहाँ रहने वाला एक बड़ा तबका इस पूरे शहर को शोषण और यातनाओं के बड़े औजार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है |दिल्ली में रहने वाला हर एक शख्स जिसे अपने बोझिल पलों में सी शहर के विर्रुद्ध अपने घर गाँव की याद सताती है कहीं न कही हमेशा के लिए टूट रहा है |

मैंने दिल्ली को जबसे जाना तबसे संवेदनहीन ही जाना ,१९९६ में जब मै पहली बार दिल्ली आया  तो मुझे किसी काम से मोतीनगर जाना पड़ा ,पहली बार ब्लू लाइन का सफ़र था,अनजान रास्ते ,मैंने बगल वाली सीट पर बैठी महिला से पूछा,आपको कहाँ जाना है?जो जवाब था वो शायद मेरे लिए अजीब था “क्या करेगा ? …. कुछ नहीं मुझे मोतीनगर जाना है अगर रास्ते में स्टेशन आये तो बता दीजियेगा ,खैर वो महिला बिना जवाब दिए अगले स्टेशन पर उतर गयी |शायद कुछ ही दिन बीते थे जब तेज धूप में सर पर गमछा रखा मै नयी दिल्ली स्टेशन पर तैनात एक टीटी से अपने टिकट के बकाया पैसों को मांगने के लिए गाली खा रहा था ,गाली  देने की वजह साफ़ थी वो मेरे गमछे से मेरी पहचान कर रहा था  |

मैं बदकिस्मती से दिल्ली में ४ साल रहा हूँ ,मुझे याद है अब भी १९९६ में जनवरी की एक शाम का  वो वाक्या, जब जनकपुरी में एक तेज रफ़्तार कार ने एक नीबू लदे ठेले को यूँ धक्का मारा कि उसका सारा नीबू सड़क पर जा गिरा ,कार चली गयी ,लगभग १५-१६ साल का वो लड़का जिसका ठेला था ,पावों में लगातार रिस रहे रक्त के दर्द से कम अपनी कमाई  के कार के पहियों तले कुचले जाने से ज्यादा रो रहा था ,और सड़क पर दौड़ दौड़ कर आने जाने वाली गाड़ियों को रोकने की निरर्थक कोशिश करते हुए अन्तः हारकर सड़क के किनारे सर पकड़ कर बैठ गया ,शहर और शहर वाले दिल्ली जैसा चाहती है उसी तरह से जी रहे थे,|

मुझे जानकारी मिली कि नोएडा के सेक्टर २९ में अपने ही घर में बंद अनुराधा जिसकी आज मौत हो गयी ,चार्टर्ड एकाउंटेन्ट  थी,और उसकी बहन एक गारमेंट फेक्टरी में पोस्टेड थी ,क्या उन लोगों का कोई रिश्तेदार न होगा ?कोई पास पडोसी जानने वाला न होगा ,?शायद नहीं ,हो दिल्ली में रहकर ये संभव है |हर एक को शक की निगाह से देखने वाले इस शहर में सरोकारों की हत्याओं का दौर शुरू हो गया है  ,पहले परिवार टूटते  हैं जैसे अनुराधा  और सोनाली का टूटा, पिता की मौत के बाद सगा भाई छोड़ कर चला गया , फिर समाज विखंडित होता है| जब कभी चिदम्बरम या तेजिंदर खन्ना दिल्ली में रहने वाले बाहरियों को रहने की तमीज सिखाते हैं ,तो उस वक्त वो नहीं बोलते पूरी दिल्ली बोलती हैं ,दिल्ली अब भी बोल रही हैं जाग रही है ,दौड़ रही है , इन सबके बीच यहाँ आदमी या तो अवसाद में है या उल्लास में।

लेखक नेटवर्क-6 के मॉडरेटर हैं

One Comment »

  • fatehchand t n. said:

    mr. aap kaa kahena thik hai maghar kish ko dosh denge aap aapni hi jibh aur apne hi daant…fatechand. thnks