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दूसरों की बात छोड़िए, अपनी आत्मा से तो न्याय कीजिए

13 April 2011 9 Comments

यह टिप्पणी प्रतिष्ठित पोर्टल समाचार4मीडिया के लिए लिखी गई थी। वहीं से साभार चौराहा पर :

 

– चण्डीदत्त शुक्ल

जिस दौर में पत्रकारिता की मूर्छावस्था और मृत्यु की समीपता तक की बातें कही जा रही हैं, उस समय में नैतिकता के सवाल मायने ही नहीं रखते। सच तो यह है कि ये विधा, जो कभी मिशन थी, फिर प्रोफेशन बनी, अब विश्वसनीयता और जिजीविषा के संकट से घिरी है। हालांकि भयानक नैराश्य के माहौल में भी, इस तथ्य और सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि टीआरपी के विष-बाण से ग्रस्त टेलीविजन पत्रकारिता और पेड न्यूज़ के संक्रमण से ग्रस्त हुई प्रिंट जर्नलिज्म के कर्मचारी लगातार अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहे हैं। यही नहीं, अपनी सीमित कोशिशों में वे पत्रकारिता और खुद को बचाने की जद्दोज़हद कर रहे हैं।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि संपादकों के मैनेजर बनते चले जाने की स्थितियां किस हद तक पत्रकारिता को सजीव और सजग बनाए रख सकेंगी। बहुत कम ही हैं, जिनकी भाषा प्रखर हो, इरादा स्पष्ट और जो सचमुच पत्रकार बनने के लिए इस फील्ड में आ रहे हों। वैसे, इस सबको `फ्रस्ट्रेशन’ मानकर आप खारिज़ भी कर सकते हैं, लेकिन फ़िल्म स्टार, आईएएस, नेता या फिर क्लर्क भी ना बन पाने की स्थिति में, चलो पत्रकार ही बन लिया जाए…या कुछ एंकर्स और प्रभावशाली टीवी पत्रकारों की तर्ज पर चुंधियाकर इस फील्ड में आ जाना भी पत्रकारिता को संकट में डाल रहा है।
ठीक इसी तर्ज पर ऐसा करने वाले भी आजीवन अस्तित्व की जद्दोज़हद और इरादा-लक्ष्य ना स्पष्ट होने के भ्रम से जूझते रहते हैं। यूं, आपको यह विषयांतर लगेगा, लेकिन इस पूरी बात के पीछे कारण है। वज़ह यह कि पत्रकारिता के पीछे अगर मन में स्पष्ट तौर पर मिशन जैसी कोई भावना है, तो वह निर्लज्ज और क्रूर समय में संभव नहीं है, वैसे ही पत्रकारिता की आदर्श परिभाषा के मुताबिक, इसे शुद्ध तौर पर प्रोफेशन नहीं बनाया जा सकता। कारण यह भी है कि यदि आप इस पेशे में बिना किसी पूर्व लक्ष्य के आ गए हैं, तो बाकी धंधों की तरह यहां भी कमाई और नाम की दौड़ में लग जाने का ख़तरा भरपूर है।
मुझे लगता है, भले ही पत्रकारिता के आदर्श अब कायम ना रह गए हों और इसे प्रोफेशन की तरह लेते हुए कमाने-खाने की पद्धतियां शुरू हो गई हों, लेकिन यहीं पर स्व-चेतना और यथास्थिति के फ़र्क समझने और स्वयं पर नियंत्रण की ज़रूरत है। सुदामा पांडेय धूमिल की एक कविता को उद्धृत कर रहा हूं… ज़िंदा रहने के पीछे अगर सही तर्क नहीं है तो रामनामी बेचकर या …दलाली करके रोजी कमाने में कोई फ़र्क नहीं है। कविता से दो शब्द हटा दिए गए हैं, क्योंकि वह संसदीय भाषा का बहाना लेकर अश्लील बताए जा सकते हैं। ख़ैर, मुद्दा यही कि पत्रकारिता में अगर हम आए हैं, तो हमारे बहुतेरे उद्देश्यों और लक्ष्यों के साथ इस बात का इलहाम, चेतनता, स्पष्टता और इरादा यही होना चाहिए कि ख़बरची बनने के पीछे बिल्डिंग खड़ी करना हमारा काम नहीं है।
निश्चित तौर पर सारी दुनिया के सामने आदर्शों की दुहाई देने वाले पत्रकारों को अपनी संपत्ति का खुलासा करना चाहिए। वैसे भी, खबरगोई रियल एस्टेट, बेकरी और मैट्रिमोनियल साइट से अलग कुछ खास किस्म का काम तो है ही। इसकी इज्जत बचानी है, तो हमें भी ईमानदार होना होगा। महज आदर्श होने का अभिनय करते रहने और खुद में झूठ पालते हुए पत्रकार ना किसी का विश्वास अर्जित कर सकेंगे, ना ही अपनी आत्मा से न्याय कर पाएंगे।
(लेखक चौराहा.इन पोर्टल के संस्थापक संपादक और स्वाभिमान टाइम्स हिंदी दैनिक के वरिष्ठ समाचार संपादक हैं)

9 Comments »

  • मयंक सक्सेनाौ said:

    कभी अपने फोन से अपना ही नम्बर डायल किय़ा है…व्यस्त जाता है…अपने अंदर की आवाज़ सुनने की सभी लाइनें व्यस्त हैं…पत्रकारिता मरने वाली तो कतई नहीं …पर ज़िंदा रहने के लिए जिस तरह के समझौते कर रही है….वो शरीर को लेनिन के शव की तरह लम्बे वक्त तक बचाए रहेंगे पर आत्मा को साम्यवाद की तरह मार देंगे…क्या कहते हैं…अच्छी टिप्पणी समकालीन पत्रकारिता पर….

  • tejwani girdhar, ajmer said:

    पत्रकारिता के मौजूदा दौर पर सटीक टिप्पणी की है आपने

  • अमलेन्दु उपाध्याय said:

    कुछ कहूंगा तो बिरादरी नाराज़ हो जायेगी.

    ————
    अमलेंदु जी, आभार।
    इस टिप्पणी का आधा हिस्सा व्यक्तिगत चिंतन के लिए सुरक्षित कर लिया है, शेष सार्वजनिक है। कारण, हम दोनों जानते हैं। दुष्यंत का एक शेर सविनय निवेदित…मत कहो आकाश में कोहरा घना है, ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।
    – चण्डीदत्त शुक्ल

  • abbas said:

    shayad aaj hum mei se kisi ke pat sach ka samana karne ki taqat nahi hai aap ne sahi likha hai i agree with u

  • अमलेन्दु उपाध्याय said:

    प्रिय भाई चंडीदत्त जी,
    अगर सच कहने का साहस नहीं है तो कम से कम सच सुनने का ही साहस दिखाएँ. आपने मेरी जो टिप्पणी ब्लोक की है क्या वह अश्लील थी या आपत्तिजनक थी? कृपया स्पष्ट तो करते. वैसे व्यक्तिगत चिंतन को सार्वजनिक ही कर देते तो क्या था? आपके इस लम्बे चौड़े चिंतन पर बस एक ही बात कहूंगा-जो अपनी लड़ाई नहीं लड़ सकते वो समाज की लड़ाई कैसे लड़ेंगे? पत्रकारिता का मूल मन्त्र क्या है?
    साभार
    आपका
    अमलेन्दु उपाध्याय
    सह सम्पादक-स्वाभिमान टाइम्स

  • चण्डीदत्त शुक्ल said:

    प्रिय बड़े भाई अमलेंदु जी।
    मुझमें सच कहने का या फिर सुनने का साहस है या नहीं, इसका न्याय भविष्य करेगा। मुझे लगता है कि मेरा इस बारे में आकलन संभवतः निष्पक्ष नहीं होगा। वह टिप्पणी आपत्तिजनक नहीं थी, ना ही अश्लील, लेकिन उसके एक हिस्से में किसी की व्यक्तिगत आलोचना की `बू’थी, जो सच्ची होने के बावज़ूद बिनावज़ह विवाद खड़ा करती। इसमें ना तो सच्चाई की बात है, ना मज़बूरी की, ना ही मैं उस व्यक्ति के नाम को चौराहा पर उद्धृत करना ज़रूरी समझ पाया। मेरा व्यक्तिगत चिंतन आपके और मेरे बीच का है, उसे सार्वजनिक करने की आवश्यकता मैं नहीं समझता। मैं लड़ सकता हूं या नहीं, इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा, हां…आपका ज़रूर आह्वान करता हूं कि कृपया नैतिकता के आधार पर सच का साथ देते हुए पुनर्विचार करें कि चण्डीदत्त एक हिम्मतवाले व्यक्ति का नाम है या फिर कायर का। अगर आप हृदय से कायर मान सकें या मेरी कायरता का एक भी उदाहरण मेरे सार्वजनिक जीवन से तलाश सकें, तो उसका ज़रूर उदघोष करें। चौराहा वैसे भी ऐसे विवादों का मंच नहीं है, इसलिए मैंने टिप्पणी का वह हिस्सा, जो किसी व्यक्ति विशेष से संबंधित था, उसे हटा दिया है। ब्लॉक नहीं किया। आप देख लें कि आपकी टिप्पणी का वह हिस्सा, जो इस आलेख से ताल्लुक रखता था, वह पब्लिश है।
    आपके प्रति बहुत-सारे आदर और स्नेह के साथ, इस निवेदन को नत्थी करते हुए कि अपना ख़याल रखना…बीमा पॉलिसी का विज्ञापन नहीं कर रहा…आपका ही अनुज…चण्डीदत्त शुक्ल

  • पंकज झा. said:

    मुझे तो पत्रकारिता को पेशा भी मान लेने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन पेशा भी कुछ ईमादारी तो खोजता ही है. ज़ाहिर है हम जनता को खबर देते हैं और समाज मुझे उसके बदले रोटी देता है वो भी सम्मान के साथ. अगर नाहक हम ये सोच लें कि हम मिशनरी भावना से काम कर रहे हैं तो उससे अहंकार ही पैदा होगा. जैसे चिकित्सक का काम भले ही बहुत पवित्र हो लेकिन हम कभी नहीं मान सकते कि वो समाज पर कोई उपकार रहा है. ज़ाहिर है वह हमारी सेवा करता है हम उसके बदले उसे रोटी देते हैं. इसी तरह हमें यह बड़े मन से स्वीकार करना चाहिए कि हम भी पेशेवर हैं और पेशेवर होने में कोई बुराई नहीं भी नहीं है. समाज सेवा का कोई मुगालता हमें नहीं पालना चाहिए. लेकिन हां….ये ज़रूर सोचना होगा हमें कि पेशे के भी कुछ उसूल होते हैं. पाश्चात्य चिंतन भी ‘ईमानदारी’ को सबसे अच्छी पालिसी मानता है और भारतीय चिंतन इमानदारी को संस्कृति. तो आप भले ही पालिसी मान कर ही सही लेकिन इमानदारी को अपनाते हुए इस पेशे में आयें, बिना किसी मुगालते के कि आप समाज पर कोई उपकार कर रहे हैं. निश्चय ही आप न्यूनतम इमानदारी का ईस्तेमाल कर भी अधिकतम यश एवं धन भी प्राप्त कर सकते हैं. तो आज पत्रकारिता में न ही ज़रूरत किसी बेईमान की है और न ही किसी समाजसेवी की. सत्य इन दोनों के बीच का मामला है.

  • vandana said:

    एक सामान्य पाठक की द्रष्टि में …..
    आपने पत्रकारिता के सम्बन्ध में जो विचार रखे और मुद्दे उठाये वे सच हैं .वस्तुतः आज संपादकों का मेनेजर होते चले जाना संभवतः अप्रत्यक्षतः अख़बारों की आपसी प्रतियोगिता वादी मानसिकता की पैदाइश है ! जहा आज ‘’अखबार विशेष के आर्थिक पक्ष अर्थात सर्क्युलेशन को अखबार कि गुणवत्ता का आधार मान लिया गया है ,!संपादक जहा अखबार के विषय वस्तु,फीचर,न्यूज़ आदि की उत्कृष्टता को अखबार की अहम गुणवत्ता में शामिल करता है वहीं मेनेजर का काम अखबार के आर्थिक पक्ष कि सुद्रधता पर अधिक रहता है!आज हर बड़े शहर में पत्रकारिता विद्यालयों कि बाढ़ सी ई हुई है ,जहा, पत्रकारिता के इतिहास से लेकर ख़बरें ,भाषाई शुद्धता ,व्याकरण आदि तो पढ़ा सकते हैं पर पत्रकारिता के लिए महत्वपूर्ण नैतिकता प्रतिबद्धता और कटिबद्धता ,जो इस प्रोफेशन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष हैं , इमानदारी और संवेदन शीलता इस पेशे कि मूलभूत प्राथमिकता होनी चाहिए ,वो नदारत हैं !इसीलिए आज गणेश शंकर विद्यार्थी,प्रणय राय,प्रभाष जोशी,प्रीतीश नंदी,राजेन्द्र माथुर अदि,जैसे उत्कृष्ट पत्रकार कम देखने को मिलते हैं !पत्रकारिता,नई पीढ़ी के बीच एक फैशन के बतौर देखा जाता है !जहा तक संपत्ति के खुलासे का प्रश्न है ,तो कोयले के खान में खड़े होकर पत्रकारों से ही साफ़ सुथरा निकल आने की उम्मीद क्यूँ ?

  • Mahabir Seth said:

    बड़े भाई चंडीदत्त शुक्ला जी को नमस्कार…
    ऐसा नहीं है की सब एक जैसे हैं. एक साल पहले जिस अखबार में काम करते थे, तब यही लगता था. की अखबार लाला की दुकान है. लेकिन अब जिस अख़बार में काम कर रहा हूँ,
    यहाँ ऐसा नहीं लगता है, यहाँ अखबार कारोबार नहीं है, बल्कि सूचना का सशक्त साधन है. ख़बरों से कोई समझौता नहीं किया जाता है…….पत्रकारिता जिन्दा रहेगी, पत्रकार ज़िंदा रहेंगे. ……