Home » दिल के झरोखे से..., है कुछ खास...पहला पन्ना

शहीदों के खून से सनी मिट्टी लाल है पर हमारा खून…?

13 April 2011 7 Comments

मयंक सक्सेना। एक सूफियाना लड़का। लखनऊ घर है, दिल्ली ठिकाना। तलाश…अंतहीन। ज़ी न्यूज, सीएनईबी और यूएनआई टीवी समेत कई नौकरियां कीं। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पासआउट। लखनवी तहज़ीब के साथ सच्चाई का पक्षधर होने की वज़ह से मिजाज़ में तुर्शी भी खूब है और झूठवालों के लिए तल्खी भी। डर नहीं लगता। सलाम नहीं कर सकता, इसलिए नौकरियां भी अक्सर छोड़ देता है। पिछले दिनों अन्ना के अनशन से जुड़ाव रहा, तो जंतर मंतर पर कई रातें भी गुजारीं, जागते-उनींदी आंखों से सोते हुए। फ़िलहाल, एक फ़िल्म लिख रहे हैं, गीत, संवाद, स्क्रीनप्ले सबकुछ। इससे ज्यादा खुलासा मुमकिन नहीं…खैर, आज यहां चौराहे पर मयंक अपनी-ही स्टाइल में फिर हाज़िर हैं। कोस रहे हैं, जलियांवाला बाग की बरसी भुला देने वालों को :

 

# मयंक सक्सेना

आज है 13 अप्रैल और हम सब एक बार फिर कुछ भूल गए हैं ….चार दिन पहले हमने सड़कों पर उतरकर क्रांति की एक आशा को ज़मीन पर ला खड़ा किया है…पर क्रांति के नायक अपने उभार से पहले ही पतनोन्मुख होने लगे हैं…ऐसे में अन्ना की आंधी के बीच एक पुरानी पुकार है, जो करीब 90 साल से देश के ज़ेहन में करुण स्वर में चीख रही है….पुकार जो कहलाती है जलियांवालां बाग नरसंहार…

आज के ही दिन 1919 में जलियांवाला बाग़ में कातिल डायर के हाथों सैकडो निर्दोषों की जान गई थी….वो लोग जो इस नरसंहार में शहीद हुए थे…जंतर मंतर की ही तरह जलियांवाला बाग में इकट्टा हुए थे…
कुछ याद पड़ा?
खैर, कोई बड़ी बात नहीं हैं, क्यूंकि अब यह आम बात हैं
दरअसल, फ़िल्म अभिनेताओ के जन्मदिन याद रखते-रखते अब हम ये सब छोटी-मोटी बातें भूलने लगे हैं…दरअसल, आईपीएल भी तो चल रहा है…
पर
माफ़ी चाहूंगा कि मैंने जुर्रत की याद दिलाने की
पर अब याद आ ही गई हैं तो भगत सिंह की डायरी से कुछ ,

यह कविता भगत सिंह ने जतिन दा की मृत्यु पर पढी थी, जिसके लेखक यू एन फिग्नर थे ,

जो तेजस्वी था वह धराशायी हो गया
वे दफ़न किए गए किसी सूने में
कोई नहीं रोया उनके लिए
अजनबी हाथ उन्हें ले गए कब्र तक
कोई क्रॉस नही कोई शिलालेख नहीं बताता
उनका गौरवशाली नाम
उनके ऊपर उग आई है घास ,
जिसकी झुकी पत्ती सहेजे है रहस्य
किनारे से बेतहाशा टकराती लहरों के सिवा
कोई इसका साक्षी नहीं
मगर वे शक्तिशाली लहरें दूरवर्ती गृह तक
विदा संदेश नहीं ले जा सकतीं…

कुल मिला कर हम आगे भी शायद इनका बलिदान याद नहीं रखने वाले हैं जब तक कि याद न दिलाया जाए ! खैर कुछ लोग हमेशा इस याद दिलाने के काम में लगे रहेंगे…..

धन्यवाद

* महान नेताओं को
*जागरूक मीडिया को
*सेवक समाज सेवियो को
*साम्यवादी कलाकारों को
*देशभक्तों को परदे पर उतारते फ़िल्म कलाकारों को
*बुद्धिजीवियों को
*विद्वानों को
*हम सबको
जो आज का दिन भूल गए
ठीक ही है…
जब
सामने मरता आदमी नहीं दिखता
तो
वो तो बहुत पहले मर चुके !!

जलियांवाला बाग़ में आज के दिन रोलेट एक्ट का विरोध करने एक आम सभा में करीब 20 हज़ार लोग इकट्ठा हुए थे…दिन था फसलों के त्योहार बैसाखी का…बाग़ से निकलने के इकलौते रास्ते को बंद करवा कर पंजाब के लेफ्टिनेंट माइकल ओ डायार ने 1650 राउंड फायर कराए…निर्दोष औरत, बच्चे , बूढे, और पुरूष क़त्ल…1500 घायल!

भूल गए
हो गई गलती …..
आख़िर कहाँ तक याद रखें ….!

भगत सिंह जब किशोर ही थे…एक कांच की शीशी में भर लाए थे…जलियांवाला बाग की मिट्टी अपने साथ…मिट्टी जो लाल थी…शहीदों के खून से…वो मिट्टी अब भी लाल है…पर शायद हम सबका खून अब उतना लाल नहीं रहा…

जंतर-मंतर के मंच से लगातार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का नाम लोग ले रहे थे…पर मोदी की प्रशंसा करने वाले नायकों ने क्यों आज भी एक बयान जारी नहीं किया…जिसमें वो याद कर लेते जलियांवाला बाग के शहीदों को…खैर जाने दें…क्यों छेड़ें ऐसे मुद्दे को…उनके गांव में जश्न मन रहा है…क्या हुआ जो विदर्भ के सैकड़ों गांव भूखे हैं…

देश के तथाकथित जनवादी…जो सो रहे हैं…इतिहास से भी ज़्यादा पुरानी नींद में…उनको जगाने के बाद क्या हमेशा सिर्फ़ दो ही शब्द सुनते रहेंगे हम…ऐतेहासिक भूल और जनवादी लोकतंत्र…क्या लोक में शामिल होंगे वो कभी…और तंत्र को बदल पाएंगे भी…भगत सिंह तो तुम्हारे आदर्श थे…क्या समय तुम्हें न बदलने के लिए अभिशप्त कर चुका है…या फिर वो तुम्हें दफ़नाने को तैयार है…

मार्च 1940 में उधम सिंह ने डायर की लंदन में हत्या की ….. मकसद था जलियावाला का बदला लेना फांसी दिए जाने पर उधम सिंह ने कहा,
” मुझे अपनी मौत का कोई अफ़सोस नहीं है। मैंने जो कुछ भी किया उसके पीछे एक मकसद था जो पूरा हुआ ! “

पर हम भूल गए
क्या कोई मकसद है हमारे पास ?????
सोचना शुरू करिए…

 

ब्रेख्त की एक कविता…आने वाली पीढ़ियों से.,…

 

सचमुच, मैं एक अँधेरे वक़्त में जीता हूँ !

सीधा शब्द निर्बोध हैं। बिना शिकन पडा माथा
लापरवाही का निशान। हँसने वाले को
ख़ौफ़नाक ख़बर
अभी तक बस मिली नहीं है।

कैसा है ये वक़्त, कि
पेड़ों की बातें करना लगभग ज़ुर्म है
क्योंकि उसमें कितनी ही दरिंदगियों पर ख़ामोशी शामिल है !
बेफ़िक्र सड़क के उस पार जानेवाला
अपने दोस्तों की पहुँच से बाहर तो नहीं चला गया
जो मुसीबतज़दा हैं?

7 Comments »

  • Shashwat said:

    filmstars ka birthday, IPL.. waakaai mein hum log itna kho chukey hain ki zaruri baaton ko nazar andaaz karne lagey hain.. aalam aisey hain ki bohot se log discussions toh karne mein bohot interested rehtey hain par jab kuch karne ki baat aati hai tab peechey hat jaatey hain.. jaagrukta ki bohot zarurat hai aaj

  • prashant said:

    बहोत अच्छा लिखा है भइया आपने…
    शर्म आ रही है…जंतर मंतर मैं भी गया था…पर जलियांवाला बाग भूल गया…

  • Omendra Sachan said:

    yaad dilaane ke liye shukriya… 23 march yaad raha… lekin 13 april bhool gaye… khushi bass iski hai ki kuch logo ne isse yaad rakh n doosro ko yaad dilaya…

  • Rajesh Lodha said:

    yaad dilaane ke liye shukriya…

  • पंकज झा. said:

    काफी पीना एवं धारदार…सोचने पर विवश करता लेख…अपने अंदर की इस आग को जिलाए रखना मेरे दोस्त…शाबास…..साधुवाद.

  • vijay said:

    main aapko salaam karta hoon ki aapne yaad to rakha .

    abhut hi acchi post.

    vijay

  • vijay said:

    mera comment kaha gaya