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एक शाम कवि की निगाह में खिल गए रंग

12 April 2011 One Comment

दुष्यंत...कवि, शायर, लेखक और हुनरमंद इंसान

वे दीवानगी की हद तक लिखने-पढ़ने के आशिक हैं। यूं, पेशे से संपादक हैं, पर कभी-कभार दिल कहता है, कहीं दूर चल, तो छुट्टियां लेके कुछ-कुछ जगहों पर वक्त गुज़ारने और लिखने-पढ़ने …अब इसे काम कैसे कहूं…चले जाते हैं। पिछले दिनों वे अहमदाबाद में थे। दोस्तों की पेंटिंग एक्जिबिशन थी, सो दोस्त का होना लाजिमी ही था। ये कोई और नहीं, अपने दुष्यंत ही हैं। बेहतरीन कवि, लेखक, संपादक। जयपुर में रहते हैं, गंगानगर के रहने वाले हैं और दिल कमबख्त काबू में रहता नहीं, सो दूर-दूर टहलता रहता है। पांच अप्रैल की एक्जिबिशन के रंग अब तक आंखों में ताज़ा हैं, बहुत आत्मीयता से उन्होंने चौराहा के लिए उस शाम की यादें साझा की हैं, आइए, उन्हें पढ़ें और देखें तीन पीढ़ियों के चित्र : मॉडरेटर

 

# दुष्यंत

ये पांच अप्रैल की शाम थी.. गुजरात की आर्थिक राजधानी अहमदाबाद में …सूरज अभी ढला नहीं था, उसका ताप कायम था, गुजरात यूनिवर्सिटी के सामने जिस कैंपस में दाखिल हुआ, उसे ‘अम्दाबाद दी गुफा’ कहते हैं, इसका अर्थ है – अहमदाबाद की गुफा. इसे बनाने का श्रेय बी.वी. दोशी  और एमएफ हुसैन को है, इसजिए इसे ‘हुसैन-दोशी गुफा’ भी कहते हैं। इसके एक हिस्से में घुसते ही दाहिने हाथ की ओर एक ओपन कॉफी हाउस है बहुत प्यारा, शाम होते ही जैसे पूरे शहर के युवा यहां आ गए हैं, अपने ख्वाबों और मोहब्बतों की पोटली लेकर… ऐसा कि आप अगर मेरी तरह जरा भी बडे़ हैं उम्र में, तो रश्क करें कि युवा होते दौर में यहां क्यों नही थे या कि  अब इनमें शामिल क्यों नहीं हैं !

मुख्य रास्ते से आगे बढें तो पचास कदम की दूरी पर बाईं ओर गैलरी है गैलरी खास है कि लंबी सी है,  वाकई गैलरी सी,  काले मार्बल की फर्श है..छत बिल्कुल त्रिभुज की शक्ल में है,  पेंटिंग्स करीने से आई लेवल पर ही हैं, कुलमिलाकर चार कलाकारों का काम यहां है- पिंकी नानावाटी, कल्पना वडनगरा, यामिनी पंडया और अनार अमीन.. उम्र के लिहाज से तीन पीढ़ियां कह सकते हैं, पिंकी वरिष्ठ हैं, यामिनी और कल्पना युवतर… और अनार युवा होती पीढी की प्रतिनिधि…

प्रदर्शनी की पहली खास बात तो यह कि शुरूआत करने का रस्मी काम किसी मेहमाने खुसूसी के जरिए नहीं हुआ.. ये काम इरादतन ढंग से पूरे मन से चारों कलाकारों की मांओं के हाथ से कराया गया, परंपराएं यूं बनती और टूटती हैं …तो अच्छा लगता है ना !

तीन पीढ़ियों के चार कलाकारों का काम भी अलग-अलग मिजाज और रवायत का जाहिर होता है…

अनार अमीन अपने काम के साथ कितनी गर्व भाव में स्थित हैं

अनार अमीन के काम की ताजगी मानीखेज है, असरदार है। उसकी पेंटिंग सेपरेशन नई पीढ़ी की नजर से प्रेम में बिछोह को देखना है..जब लडकी अपनी साइकिल पे दूसरी दिशा में गतिमान है और लडके की साइकिल की दिशा दूसरी तरफ है हालाकि उसे अनुपस्थित दिखाना कई अर्थो को खुला छोड देना है.. नई पीढी की सोच का ऐसा बयान असाधारण है.. उसमें ख्वाब हैं,उम्मीद है हौसला है, कहीं कोई डर नहीं,  कोई खौफो खतर नहीं …।

 

कल्पना वडनगरा अपने चित्रों के साथ सौम्य भाव से

कल्पना वडनगरा के काम में कोई अचरज नहीं कि जीवन और संबधों के आपसी जाले, गांठें  प्रकट हुए हैं, वहीं प्रेम का प्रतीक गुलाब रक्त टपकाता है तो खिडकी दरवाजों का बंद होना लगातार कुंद और संकुचित होती मनस्थितियों का बेबाक बयान ही तो है कि इनका खुलना ताजा हवा के लिए जरूरी है तो जिंदगी को मुमकिन बनाने के लिए भी… लगातार जंजीरों, खिडकियों के चटखे कांचों, ताले बंद दरवाजों में उनकी कैफियत के पुख्ता निशान मिलते हैं,, विषय और अभिव्यक्ति की विविधता उनके यहां बहुत ही काबिले तारीफ है,, उनके हाथ की रवानी और उसका उत्तरोत्तर बेहतर होना साफ जाहिर होता है ,,

यामिनी पंडया बहुत खुश हैं

यामिनी पंड्या कहीं खुद में खोई कहीं खुद को खोजती सी कहीं खुद के पार जाते हुए अनंत में अज्ञात का संधान करती हुई लगती हैं और अगले ही पल किस्म-किस्म के खेलों में जिजीविषा को रूपायित करती हैं.. जाहिर है कि उन्होनें मनोविज्ञान की पढाई यूं ही नहीं की उनके रंगों की बुनावट और तीव्रता में उनके मन के रंग खिलते हैं हूबहू .

 

पिंकी नानावाटी के काम में क्योंकि वे दुनिया घूमी है  और उम्र का तजर्बा भी उन्हें ज्यादा हासिल है तो मुझे जरा भी हैरानी नहीं हुई कि उनका ब्रश लगातार जीवन की जटिलताओं परेशानियों मन के जालों और उहापोहों को उकेरता चलता है…एक नई दुनिया…एक अज्ञात…एक अतींद्रिय सत्ता के लिए तड़प और उसी में सुख की लालसा के प्रबल संकेत हमें उनकी लग्रभग हर पेंटिंग में मिलते हैं कुदरत के साथ एकमेक होकर उनका अलग फॉर्म में खिलना और लगातार खिलते जाना उनकी रंगसाजी को बहुत गहरा बनाता है.

मल्लिका साराभाई, उनकी मां और अपनी भतीजी के साथ पिंकी नानावाटी अपनी पेंटिंग्स के इर्द- गिर्द

पहले दिन दो घंटे खुली है गैलरी, इतने ही में  हजार लोगों का आना मेरे लिए हैरान कर देने वाला है जिसमें शहर के नामी चित्रकार अमित अंबालाल पटेल हैं, तो वहीं मशहूर क्लासिकल डांसर मल्लिका साराभाई का अपनी मां के साथ आना भी मायने रखता है.

आठ बज रहे हैं अंधेरा उतरने लगा है कॉफी हाउस भी बंद होने को है …

गैलरी के बाहर रखी कुर्सियों पर अहमदाबाद के अलग अलग तबकों के लोग प्रायः गुजराती में बतिया रहे हैं, रह रहकर मुझ राजस्थानी को कुछ कुछ समझ आता है बमुश्किल दस फीसदी.. चारों के काम को लकर भी बातें होती है और उसके परे की जिंदगी की भी… कला आखिर जिंदगी से ही निकलती है उसकी कोई निरपेक्ष सत्ता तो है नहीं.. अंदर खिले रंग बाहर तक फैल गए हैं उजाला बनकर …रंगो का यूं खिलना, खिलखिलाना और इतने लोगों में खुशी में रूपांतरित हो जाना, इससे बढकर कला से हम क्यूं और क्या चाहते हैं भला!

 

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  • वंदना अवस्थी दुबे said:

    क्या बात है दुष्यंत जी. शानदार रिपोर्ट, कला-प्रदर्शनी की. सभी युवा और वरिष्ठ कलाकारों के बारे में पढना अच्छा लगा. साराभाई परिवार हमेशा से ही कला और कलाकारों को प्रोत्साहन देता रहा है, सराहनीय बात है ये. पूरी रिपोर्ट पढते हुए लगा जैसे कहानी पढ रही हूं. कथा-शैली की सुन्दर रिपोर्ट. आभार.