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अभिषेक गोस्वामी की तीन कविताएं

10 April 2011 One Comment

अभिषेक गोस्वामी

अभिषेक गोस्वामी, यानी रंगकर्मी, लेखक, कवि, कलाकार। उफ़, एक जिस्म में इतने हुनर। जयपुर में रहते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की टाई कंपनी से जुड़े रहे। फिलवक्त, अभिषेक एक मल्टी नेशनल कंपनी के महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट से जुड़े हैं, लेकिन वो एमएनसी वर्कर नहीं हैं…थिएटर वर्कर ही हैं, यानी वहां भी नाट्यकला की पढ़ाई-लिखाई के काम में जुटे हैं। चौराहा पर अभिषेक की कुछ कविताएं :

 

अब क्या कहूँ?

कैसे बताऊँ?

पर कहना ही होगा.

जिस बड़े बाज़ार की

सबसे ऊपरी मंजिल पर 

खेल रहे हैं

हमारे बच्चे

मेरी कविता की

तोप का मुंह

उसी दिशा में है

जिसके भीतर भरा है

तल्ख़ लफ़्ज़ों

का अस्सलाह

फिर न पूछना दोबारा

भाई मेरे

‘कि मैं आजकल

खामोश क्यूँ हूँ?’

 

 

पुरस्कृत छायाचित्र

बसते में से

कैमरा निकलने में ही

वक़्त निकला जा रहा है

 

हम काशी से अल्लाहाबाद

आ रहे हैं

पुलिया पर हैं

सूरज डूब रहा है

जिसकी परछाई

सूखी हुई गंगा के

कहीं कहीं अब भी जमा रह गए

पानी में दिखाई पड़ रही है

 

गाड़ी पुल से गुज़रती जा रही है

सूरज डूबता जा रहा है

कैमरा ऑन होने में वक़्त ले रहा है

लो हमने पुलिया पार भी कर ली

रात हो गयी

हाथ अपर्चेर ही ढूंढते रह गए

देख भी न पाए ठीक से

एक सुंदर दृश्य कुछ यूँ गुज़र गया

अवार्ड के चक्कर में

 

बर्फ का वो पहाड़

कक्षा आठवीं ‘बी’

की किताब

सामाजिक विज्ञानं भाग -एक

(नागरिक शास्त्र) में

पढ़ा था कभी

 

काफी सुंदर लगा था

आश्वस्ति हुयी थी

अपने प्रति

और इस भावुक दिल

ने आत्मा से

स्वीकार भी लिए थे

तमाम कर्त्तव्य

 

आज मुल्क का संविधान

फिर से पढ़ा

आज फिर वह एक

सुंदर कविता लगी

पहले से भी अधिक सुंदर

जैसे तपते रेगिस्तान से

सुदूर ऊंचे पर्वत पर दिखाई

दे रही हो कोई बर्फीली चोटी

 

मौसम विभाग

का पूर्वानुमान है कि

अबके बरस मानसून कुछ

जल्दी आएगा

तब मैं बिताऊंगा

अपनी गर्मी की छुट्टियाँ

बर्फ के उस पहाड़ पर

One Comment »

  • alok said:

    “puraskrit chhayachitr” behad shandar hai.