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आपकी पॉलिटिक्स क्या है `स्वामीजी’?

10 April 2011 6 Comments

गैर राजनीतिक चौराहा पर एक और राजनीतिक चर्चा, महज इसलिए, क्योंकि मौजू है…और चौराहा पर सियासी बहस को कैसे रोका जा सकता है। लेखक हैं पंकज झा, बेहद प्रखर पत्रकार और सटीक राय रखने वाले लेखक। पंकज दीपकमल पत्रिका के संपादक हैं।

 

# पंकज झा

अभी दांतेवाडा घटनाक्रम के बाद खासकर पिछले साल 6 अप्रैल को ताडमेटला में शहीद हुए जवानों की बरसी से ऐन पहले नए घटनाक्रम के अगुआ स्वामी अग्निवेश के बारे में नेट पर तथ्य तलाशते हुए ढेर सारे सन्दर्भों से अपना साबका पड़ा. अपने मेल बोक्स में सुरक्षित सभी सन्दर्भों का लिंक इकठ्ठा कर लेने के बाद अपने इस मान्यता की पुष्टि हुई है कि हर बड़े आंदोलनों की तरह माओवाद भी कुछ अवसरवादी, महात्वाकांक्षी लोगों द्वारा हड़प लेने के बाद ज्यादा खतरनाक एवं सरोकार विहीन हो गया है. कभी तेज़स्विता रही होगी इस आंदोलन में. निश्चय ही पश्चिम बंगाल के सन्दर्भ में देखें तो यह कुछ सफल भी हुआ रहा होगा. लेकिन काल-क्रम में यह आंदोलन भी अंततः कुछ अवसरवादी असामाजिक तत्वों की ही भेंट चढ गया. आंदोलन के जनक लेकिन बाद में गुमनामी के गर्त में धकेल दिए गए कानू सान्याल द्वारा कुंठित होकर आत्महत्या कर लिए जाने के बाद तो अब कहने के लिए कुछ शेष ही नहीं बचा.

बात चाहे आज़ादी की गांधीवादी विरासत पर नए ‘गांधियों’ द्वारा कब्ज़ा ज़माने की हो, सम्पूर्ण क्रान्ति के जनक की विरासत लालू-रामविलास जैसे नेताओं का बंधक बन जाने की हो, ‘लोहिया के लोग’ होने का दावा कर समाजवाद को मुंह चिढाते अमर-मुलायम जैसे लोगों की बात हो या फ़िर दीनदयाल की विरासत को हड़पने के फिराक में प्रखर हिंदुत्व का चोला बदल एक समय, कारसेवकों को गोली से भुनवा देने वाले मुलायम सिंह तक की गोद में जा बैठे कल्याण सिंह की या फ़िर राष्ट्रवाद को अपना सब कुछ मानने वाली पार्टी का सांसद होकर देशद्रोही साबित हो चुके बिनायक सेन की वकालत करने वाले राम जेठ मलानी की बात हो. हर जगह यह साबित हुआ है कि अवसरवाद हर तरह के वादों पर हावी हुआ है. इस कड़ी में आप संसदीय प्रणाली में अनास्था व्यक्त करने वाले दुर्दांत नक्सलियों द्वारा झामुमो के टिकट पर सांसद और विधायक चुने जाने को भी शामिल कर सकते हैं. लेकिन फिलहाल बातें अग्निवेश की.

जब-जब स्वामी अग्निवेश पर नक्सलियों के समर्थक होने का आरोप लगा है और अपनी खाल बचाना जब-जब उन्हें मुश्किल लगा है तो उन्होंने नक्सलियों की भी थोडी सी आलोचना कर दी. ऐसा दिखाया कि वे निष्पक्ष हैं. लेकिन हाल के घटनाक्रम से और इससे पहले भी बार-बार उनकी पोल खुलती रही है. अभी अग्निवेश पर बस्तर के आदिवासियों द्वारा किये गए हमले के विरोध में वहां नक्सलियों ने बस्तर बंद का आयोजन किया है. अब इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि लोकतंत्र में आस्था रखने वाले आदिवासीजन जहां उनपर टमाटर फेक कर उनकी पगड़ी उछालते हैं वही नक्सली उनके समर्थन में बंद का आयोजन करते हैं. ज़ाहिर है आपकी निष्ठा किधर है. इसके अलावा कुछ दिन पहले ही एक सीडी के द्वारा यह खुलासा हुआ कि वो अपहरण के सौदेबाजी के समय खुलकर माओवाद जिंदाबाद और लाल सलाम के नारे लगा रहे थे. तो क्या इससे भी ज्यादा सबूत की ज़रूरत है? सवाल है जब हम लोकतंत्र पर उपस्थित इतने बड़े संकट से दो-दो हाथ कर रहे हों तब किसी सफेदपोश या भगवापोश को हम खुल कर नक्सली गतिविधि को प्रश्रय देने को नज़रंदाज़ कर सकते हैं?

सवाल तो यह है कि अग्निवेश की वैधानिक हैसियत इस मामले में क्या है? आखिर उनकी स्वीकार्यता क्या है? अपने पास पूरी जिम्मेदारी से सुरक्षित अग्निवेश से संबंधित कुछ सन्दर्भों पर गौर करें. आर्य समाज की पगड़ी सर पर धारण कर लोगों को ये हिंदुत्व का झांसा भले देते रहे लेकिन उस आर्य समाज से बहुमत के द्वारा उन्हें वर्षों पहले गबन के आरोप निकाल दिया गया है. आज जब महान अन्ना हजारे जी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भी पैठ के जुगाड में हैं तब उनके खुद पर लगे इस गबन के आरोप को क्या कहा जाय? न केवल ये आरोप बल्कि सीधे तौर पर आर्य समाज ने अपनी विज्ञप्ति द्वारा यह आरोप लगाया था कि अग्निवेश मतांतरण कर इसाई हो गए हैं. तो इसाई हो जाना भले ही अपने-आपमें कोई गुनाह नहीं हो लेकिन भगवा बाना धारण कर वैदिक संस्कृति का खैरख्वाह बनना और मतांतरण कर इसाई बन जाने का आरोप अपने समाज द्वारा ही लगना. इससे आगे की बात भी करूं तो धार्मिक होने का ढोंग और धर्म को अफीम समझने वालों का साथ, भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन चलाना और खुद ही गबन के आरोप में अपने ही समाज द्वारा निष्काषित किया जाना, यह तमाम विरोधाभाष निश्चित ही अग्निवेश की विश्वसनीयता पर गहरे सवाल खडा करता है. और कम से कम देशद्रोह के विरुद्ध विधान की लड़ाई में उनके ‘पक्ष’ हो जाने पर आपत्ति जताता तो नज़र आता ही है.

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जब भी कभी हिंदू हित की बात हुई है या देश की संस्कृति पर कुठाराघात हुआ है तब-तब अग्निवेश दुसरे पक्ष में मुस्तैदी से खडे नज़र आये हैं. हर बार आर्य समाज द्वारा अग्निवेश के बयानों का खंडन भी किया गया है और बार-बार उसे यह कहना पड़ा है कि इस व्यक्ति का आर्य समाज से कोई लेना-देना नहीं है. जब जम्मू में श्राइन बोर्ड की ज़मीन का विवाद हुआ था तब इन्होने उस आंदोलन का विरोध किया था लेकिन आर्य प्रतिनिधि सभा ने तब भी विज्ञप्ति जारी कर कहा कि इन्हें समाज से निष्काषित कर दिया गया है और भले ही आर्य समाज मूर्ति पूजा को नहीं मानता हो लेकिन वह इस मामले पर सम्पूर्ण हिंदू समाज के साथ है.

इसी तरह जब ओडिशा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की ह्त्या कर दी गयी थी तब उसके विरोध में एक शब्द भी नही बोल कर वहां हिंदू संगठनों को आतंकवादी साबित करने वाला बयान देने भी अग्निवेश पहुच गए थे लेकिन ओडिशा सरकार ने इन्हें कंधमाल जाने की इजाज़त नहीं दी थी. जब आज़ाद का एनकाउंटर हुआ था तब भी उसके पास से अग्निवेश का ही पत्र बरामद हुआ था जिस आधार पर हाल ही में दिवंगत एक बड़े पत्रकार ने अग्निवेश के गिरफ्तारी की भी मांग की थी.

पिछले साल पदयात्री बन कर अग्निवेश करीब साठ सामाजिक कार्यकर्ताओं को गुमराह कर बस्तर पहुचे थे तब भी उनकी नीयत भांप पर कुछ साथी पदयात्रियों ने अग्निवेश पर समूचे आंदोलन को हड़प लेने का आरोप लगाया था. ये भी उन लोगों को कहना था कि ‘स्वामी धोखेबाज़ हैं और अपने छुपे राजनीतिक एजेंडा पर चल रहे हैं.’ इससे पहले अग्निवेश ने 2004 में एक राजनीतिक दल का भी गठन किया था लेकिन तब मुंह की खाने के बाद शायद इस तरह से बस्तर की आग पर रोटी सेंक कर वे अपनी राजनीतिक ज़मीन तलाश रहे हैं.

तो जो बस्तर आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है. जिस नक्सल समस्या को आज देश के समक्ष उपस्थित आंतरिक सुरक्षा पर सबसे बड़े चुनौती के तौर पर देखा जाता रहा हो, वहां अग्निवेश जैसे विवादास्पद एवं संदेहास्पद व्यक्ति को इस आंदोलन को हड़प लेने की, किसी भी तरह से मध्यस्थता करने की इजाज़त देना निश्चय ही लोकतंत्र को कमज़ोर करना माना जाएगा.

आज देश और सभी नक्सल प्रभावित राज्यों में चुनी हुई सरकारें हैं. लाख कमियों के बावजूद सभी सरकारें अपनी वैधानिक सीमा में रह कर लोकतंत्र को स्थापित करने हेतु प्रयासरत भी हैं. फ़िर भी अगर कहीं कोई कमी रह जाती है तो उसको देखने के लिए सभी जगह सशक्त विपक्ष, ताकतवर मीडिया है. इसके अलावे न्यायपालिका एवं मानव अधिकार आयोग समेत सभी वैधानिक संस्थाएं तो हैं ही. तो इतनी सारी प्रासंगिक संस्थाओं के बीच जबरन अपनी भूमिका साबित करने वाले अग्निवेश को अप्रासंगिक बनाना, उनकी हरकतों को, नक्सल समूहों को मज़बूत करने वाली गतिविधियों को हतोत्साहित करना देश में लोकतंत्र की सफलता के लिए ज़रूरी है.

न केवल हतोत्साहित करना बल्कि न्याय व्यवस्था के खिलाफ जाते हुए अगर अग्निवेश प्रतिबंधित संगठनों के पक्ष में नारे लगाते हुए पाए गए हैं तो उनको  गिरफ्तार कर उनपर मुकदमा चलाने की भी ज़रूरत है. निश्चित ही फैसले की इस घड़ी में सरकार द्वारा कुछ कड़े कदम उठा कर, दृढ इच्छाशक्ति का परिचय देकर ही इस संकट से पार पाया जा सकता है. यह फ़िर-फ़िर कहने की ज़रूरत है कि लोकतंत्र किसी अग्निवेश, किसी विनायक, किसी अरुंधती से ज्यादा महत्वपूर्ण है.

6 Comments »

  • मयंक सक्सेना said:

    पंकज जी जैसा कि हमेशा लिखते आए हैं वैसा ही इस बार भी पढ़ने को मिला…आश्चर्य नहीं हुआ…हां मैं सहमत हूं कि अग्निवेश न तो स्वामी ही हैं और न ही ठीक से साम्यवादी…उनका अपना एक निश्चित पॉलिटिकल एजेंडा है….जिस पर वो काम करते हैं…इस आंदोलन में भी वो अपने माइलेज के लिए जुड़े….लेकिन हां मैं पंकज जी का एक लेख स्वामी रामदेव के राजनीतिक एजेंडे पर भी पढ़ना चाहूंगा…अगर वो लिखें तो…और हां नक्सल समस्या किसी अग्निवेश की वजह से नहीं अपितु सरकारों द्वारा पूंजीपतियों की अंधसेवा से है…वो सरकारें कांग्रेसी भी हैं…भाजपाई भी…और वामपंथी भी….पर पंकज जी रामदेव के एजेंडे पर भी आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी…थोड़ी पत्रकारिता भी होनी चाहिए…हमेशा पार्टी का एजेंडा थोड़े ही लिखा जाएगा…

  • पंकज झा. said:

    धन्यवाद मयंक जी…बहुत आभारी हूं आपका. अग्निवेश के कारण भले ही नक्सलवाद पैदा नही हुआ हो लेकिन उसे खाद-पानी देने का काम यही लोग कर रहे हैं. चुकि पिछले आधे से ज्यादा दशक से छत्तीसगढ़ में हूं तो उसी के बारे में लिखना ज्यादा मुफीद होता है मेरे लिए. बाबा रामदेव पर तो सैकड़ों टन कागद कारे किये जा चुके हैं. फ़िर भी ज़रूर आपके आदेश का कभी पालन करना चाहूँगा. लिखूंगा ज़रूर कभी तफसील से कभी रामदेव के बारे में भी.
    फिलहाल दो टूक कहना चाहूँगा कि बाबा रामदेव ने योग के द्वारा एक क्रान्ति ला दी है यह सही है. लेकिन योग करने के लिए जुटे समूह को अपना राजनीतिक समर्थक मान लेना उनकी भारी भूल होगी. वो इस मुगालते से जितनी जल्दी बाहर निकल जाएँ उतना अच्छा है. हमारी राजनीतिक समस्याओं का हल अंततः लाख बुराइयों के बावजूद अपनी ही राजनीतिक प्रणाली में निहित है. और यह प्रणाली ज्यादे से ज्यादा रामदेव को चाणक्य के रूप में तो स्वीकार कर सकती है (ज्यादे से ज्यादा) लेकिन उन्हें चंद्रगुप्त की भूमिका के लिए किसी मौर्य वंश का चयन कर लेना चाहिए. उसी तरह जैसे मोहनदास ने तब के असली कांग्रेस का चयन कर महात्मा होने तक का सफर तय किया था…धन्यवाद.

  • Jitendra Dave said:

    बड़ी अजीब बात है कि अग्निवेश को आर्यसमाज अपना नहीं मानता, वह किसी संगठन-समुदाय या संस्थान का प्रतिनिधित्व भी नहीं करते. फिर भी वह इतनी लाइम लाईट क्यों पाते है. क्या यह अपरिपक्व मीडिया से सेटिंग और भगवे वस्त्र धारण करके उसी के खिलाफ काम करने की अनैतिक अधमता नहीं है?
    आपके लेख में कई नई बाते जानने को मिली. इस तहकीकात के लिए साधुवाद. महेश भट्ट की तरह हर बात में अपनी टांग अडाने वाले और हमेशा देश विरोधी हरकतों की पैरवी करनेवाले लोगो को बेनकाब करना जरूरी है. ऐसे खोजपरक खबर हमारे चैनल कभी नहीं दिखाते. इसलिए आप जैसे निर्भीक पत्रकारों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है.

  • tejwani girdhar said:

    बेहतरीन तहकीकात और सटीक टिप्पणी है आपकी

  • digvijay chaturvedi said:

    bilkul sahi kaha aapne….yeh bahut bada awasarwadi hai…..uttam lekh..

  • एक आम नागरिक said:

    बहुत सटीक और बेबाक लेख !ज्वलंत प्रश्न,और कुछ ढोंगी सफेदपोशों कि असलियत उघाड़ता ,जिससे आम जनता अनभिग्य,को ज़ाहिर करते कुछ ज़रूरी दस्तावेज़ !,जनता कि भावनाओं और सहज मांगों पर अपने स्वार्थों कि रोटी सकने वाले अग्निवेश जैसे सीधे २ शब्दों में देश के गद्दारों का साम्राज्य हो जाता है,तो निस्संदेह स्थितियां गंभीर हो जाती हैं !और ये भी सच है कि ऐसे अहसान फरामोश तत्वों के आडम्बरों का सारा का सारा कारोबार ,उनके शातिर मस्तिष्क की योजनाएं जनता के बीच और उन्हीं के माध्यम से पूरी की जाती हैं ! देश के असली दुश्मन वो नहीं जो गोलियों से लोगों को खुलेंआम भून रहे हैं ,और खुद भी जान गंवाने को तैयार हैं और गँवा रहे हैं !,कम से कम उनकी मनसा उनके कर्मों से स्पष्ट तो हैं ,क्यूँ चाहते हैं ,और क्या कहते हैं और चूँकि चीजें (मांगें )सपष्ट हैं इसलिए देर सबेर सरकार और उनके बीच बातचीत के द्वारा कुछ समाधान खोज लेने कि जगह भी है,है?पर अग्निवेश जैसे ढोंगियों देश द्रोहियों को क्या कहा जाये जो एक ओर नक्सलियों की पीठ थपथपाते हैं और वक्त की नब्ज़ भांप उनका विरोध भी करते हैं … देश के असली दुश्मन दरअसल ये और ऐसे ही पाखंडी ,मुखौतेदार नेता हैं ! भगवा पोशाक अब इस तरह के तथाकथित धर्म के दलालों की काली करतूतों की ढाल हो गई हैं जिसके भीतर उन्हें लगता है कि बहुत सी गुप्त योजनाओं को प्रश्रय मिल सकता है और जिन्हें हिंदुस्तान कि आम जनता सहजता से मान्यता दे देती है !वही धर्म की अफीम वाला नुस्खा !वो दिन गए जब देश को नेताओं के सुपुर्द छोड़कर स्वर्ण युग के सपने देखे जाते थे ! सच तो ये है,कि आज जनता को बहुत जागरूक रहने की ज़रूरत है ,और ऐसे पाखंडी नेताओं,तथाकथित देश भक्तों ,और समाज ऐसे के ठेकेदारों जो अरबों के सम्पती के ढेर पर बैठकर जोर २ से समाज सुधरने की युक्तियाँ बताते हैं(बाबा रामदेव) !हद तो ये है कि अन्ना जैसे विशुद्ध गांधीवादियों के सार्थक और सशक्त आंदोलनों में भी ये हवा का रुख देख मंच पर न सिर्फ विराजमान दिखाई देते हैं बल्कि लोहिया और गांधी वादिता के कसीदे भी पढते हुए दिखाई दिए !क्या ये लोग जनता को मुर्ख समझते हैं ?क्या ये नहीं जानते कि जनता के सामने इनकी मनसा ,और करतूतों का भंडाफोड जब होगा तब इनकी ये पोशाक और संबोधन स्वतः ध्वस्त हो जायेंगे ,इनके तमाम मंसूबों कि धज्जियां उड़ा दी जायेंगी ?