Home » साहित्य-सिनेमा-जीवन

सबसे बेचैन दौर से गुज़र रही है कहानी

9 April 2011 3 Comments

हिंदी कहानी के पात्रों की यात्रा पर प्रवेश कुमार का ये आलेख औपचारिक आलोचना दृष्टि से अलग बहुत-से विचारणीय बिंदु पेश करता है। प्रवेश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए कर रहे हैं और…। इस और…में जीवन के बहुत से सकारात्मक पक्ष छिपे हैं, जिन्हें शब्दों में बयां करना मुश्किल है। चौराहे की थड़ी पर प्रवेश का स्वागत

 

# प्रवेश कुमार

माला पिरोते वक़्त जब सुई की पतली नोक अंगुलियों में बार बार चुभ जाती है और बेचारी घायल अंगुलियाँ काँपती हुई अवसाद ग्रस्त हो कर ठहर जाती हैं | अंगुठे की ताकत भी उस बोझिल साथियों  को ज़्यादा दूर तक नहीं ले जाती | तदोपरांत टूट जाती हैं मालाएं और बिखर जाती हैं मोतियाँ | कहीं कोने में बिखरी उन मोतियों की बेचैनी को आत्मसात करता हुआ रचनाकार प्रस्तुत होता है | हिंदी कहानी का दौर इतना बेचैन ना था जितना कि आज है | उसका कारण भारतीय परिवेश में कुछ आमूल चूल परिवर्तनों से जुड़ा हुआ है |

हिंदी साहित्य में कहानियों का प्रारम्भ 19वीं सदी के प्रारम्भ में सरस्वती पत्रिका से होती है | आज तक जितनी भी  कहानियाँ लिखी गई उनका आधार या तो भाव परक रहा या तो व्यक्ति परक | कुल मिला के कहें तो कहानियों का जुड़ाव समाज से रहा या व्यक्ति मन की उन समस्याओं से जिन्हें समाज अब तक नहीं जान पाया था | हिंदी कहानियों का एक दौर वह भी था जब कहानियों का अंत सुखांत होता था उसके पात्र या तो परमपरावादी होते थे या आस्थावादी | उस समय के पाठक ने ऐसी कहानियों को बखूबी सराहा और स्वीकारा |

‘प्रेमचंद’, ‘जयशंकर प्रसाद’, ‘चंद्रधर शर्मा गुलेरी’ जैसे रचनाकार ने इस परम्परा को बखूबी निभाया | ‘प्रेमचंद’ के ‘ईदगाह’ में ‘हामिद’’ की बात करें या ‘प्रसाद’ के ‘पुरस्कार’ में ‘मधुलिका’ की सभी पात्र अपने आप में आदर्श एंव अपने आस्थावादी चरित्र को उभारते नज़र आते है | इस दौर की कहानियों के पात्रों में जीवंतता है जो उन्हें व्यक्ति पात्र के रूप में मुखर करता है | ‘गुलेरीजी’ द्रारा रचित ‘उसने कहा था ‘के पात्र ‘लहना सिंह’ भी बलिदान का प्रतीक है | कुल मिला के उस समय की जो कहानियाँ थीं उसके पात्र बेहद परोपकारी या समाज सुधारक प्रवृति के होते थे | तथा समाज की समस्या ही उनके केंद्र में होती थी |

परंतु कहानियों में एक ऐसा दौर भी आता है जब ‘जैनेंद्र’ की कहानी पाज़ेब में मनोविज्ञान की बात की जाती है | वहीं इन के बाद  ‘अज्ञेय’ प्रेमचंदीय युग की परम्परा को तोड़ते हुए कथा में नया आयाम प्रस्तुत करते हैं | ध्यान केंद्रित करें तो द्वितीय विश्व युद्ध के पुर्व हिंदी कहानी के पात्र समाजिक रहे हैं | परन्तु द्वितीय विश्व युद्ध और भारत विभाजन  के बीच का जो संक्रमण काल है | उस दौर की कहानियों के पात्रों में एक विशेष बदलाव का रूप देखने को मिलता है | सभी पात्र अंतर्द्वंद और मन के संधर्ष से जुझते नज़र आते हैं | यही कारण है कि आज के पात्र प्रेमचंदीय युगीन पात्रों की तरह ना तो परोपकारी हैं ना तो आदर्शवादी |अब की कहानियों में यह ऐसा दौर आया जब पात्र गतिशील नहीं वरन शीथिल हो चुके  हैं  आज के पात्र मे जो  निराशा, अवसाद, कुंठा, संघर्ष, द्वंद की स्थिती है उसका कारन संक्रमन  काल से है |

‘अज्ञेय’  की कहानी ‘रोज़ गेंग्रीन’ परिवर्तन के तौर पर  हमारे सामने आयी ईस कहानी में ‘मालती’ नामक युवती के विवाहोत्तर जीवन को चित्रित किया गया है जिसमें उसके अभावग्रस्त नीरस जीवन को प्रकाश में लाया गया है | तिल तिल मरती हुई उस युवती के मौन को लेखक ने बेहद कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है | इस कहानी के पात्र ‘मालती’ एक ऐसे वस्तू का नाम है जो नीरस है, निराशा से लिप्त है, और जैसे तैसे जीवन जीने की कोशिश कर रही है | ‘मालती’ का जो मर्म है वह सम्पूर्ण हिंदी कहानी में पहली बार आधुनिकता का आभास करवाती है |  ग़ौरतलब है कि मालती में भी कहीं न कहीं परम्परा के आंशिक रूप मौजूद हैं | परंतु बदलाव का एक संकेत भी है | उसके अवसाद और निराशा भरी ज़िंदगी को लेखक  खुद से जीने के उपरांत उभारा है | लेखक इतना व्याकुल है कि वह साँस खींचने के लिए भी अकेलापन ढ़ँढ़ता है | उसकी बेचैनी इस बात से है कि मालती से उसके सम्बंध का अस्तित्व समाप्त हो चुका है | सम्बंधों के बीच आने वाले यह फ़ासले को भरने की नाकामयाब  कोशिश लेखक ने की है | लेकिन  ‘मालती’ के जीवन मे  एक     बोझिल और ऊबाउपन की  गहरी फाँक अभी भी मौजूद है  इसके अलावा ‘अज्ञेय’ की और रचनाओं को देखें तो उसमें भी एक उदासी और द्वंद का भाव पनपता दिखता है | असल में यह उदासी सम्वेदना में परिवर्तन के कारण पनपा हुआ वह पौधा है | जिसे तत्कालिक लेखकों ने नई कहानी के लेखकों के सहारे छोड़ दिया था | हिंदी कहानी में रचनाकार हमेशा एक तलाश जारी रखता है | भले उस  तलाश का परिणम  निराशा और अवसाद ही क्यों न हो | लेकिन वह एक नई शुरूआत थी  | देश विभाजन के उपरांत हिंदी कहानियों का प्रारूप बिल्कुल परिवर्तित हो गया था |  अब कहानियों में भावों का कोई स्थान नहीं था | अब पात्र का चयन काल्पनिक ना रहा |  विचारों और वास्तविकता के मंथन से हिंदी कहानियों   ने एक नया रूप ले लिया था |

उस समय के  रचनाकारो    ‘कमलेश्वर’  ‘निर्मल’  वर्मा ‘मोहन राकेश’ ‘भीष्म साहनी’ ‘मन्नू भंडारी’ ‘राजेंद्र यादव’ अथवा ‘कृष्णा सोबती’ जैसे रचनाकार थे  जिन्होने विभाजन के उस वीभत्स घटनाओं को अपने ज़ेहन में आत्मसात किया | और इनकी रचना व कहानियों में  जो पात्र थे उन पर उस घटनाओं का प्रभाव लाजिमी था |  भारतजैसे देश में कितनी ही धारणाएं एक साथ टूटी थीं | सम्बंध टूटे थे | परिवार टूटा था | और व्यवहार टूटा था | आंसूओं की ऐसी बाढ़ चली थी जिसने सभी आशाओं को मटिया मेट कर दिया था | इन सबों के बीच हिंदी रचनाकार के विचारों में एक बिखराव की  स्थिति स्वत: बन पडी थी |

शुरूआत में ‘राजेंद्र यादव’ की कहानियों पर दृष्टि डालें तो ‘टूटना’ उनकी  सफलतम  कहानियों  में से एक है | इस कहानी का आधार ही निराशावादी है | कहानी की गहराई मे  मानवतावादी दृष्टिकोण का अंत; घुटन और अवसाद का सृजन  देखा जा सकता है |  कहानी के मुख्य पात्र किशोर अपनी ज़िंदगी का अधिकांश भाग संत्रास में जीता है | असल में आज़ादी के उपरांत जो हिंदी कहानियाँ लिखी गई वह बिना किसी काल्पनिक जामा के प्रस्तुत की गई | यही कारण है कि किशोर का जो व्यक्तित्व है वह बेहद निराशावादी प्रतीत होता है | हिंदी कहानी की सबसे खास बात यह है कि इसके पात्र मध्यवर्गीय परिवार से जुड़ा होता है | तंगी और अकाली उसके जीवन को जड़ से  पकड़ी हुई होती है | उसका सम्पूर्ण जीवन आत्मसंधर्ष  और आत्म विशलेषण में गुज़रता है | और आज की हिंदी कहानी के पात्र अपने अस्तित्व की तलाश में ताउम्र उन घटनाओं को अंजाम देता है | जिसके कारण विद्रुपता और द्वन्द उसके जीवन को घेरे रखती है | हिंदी कहानी के पात्रों की निराशा   उनके मौन और चुप्पी से जुड़ी हुई है | वे  बेचैनी की अभिव्यक्ति पुराने पात्रों के समान  शब्दों और सम्वादों के माध्यम से नहीं देते | आज की कहानियों में पात्रों के माध्यम से  प्रतिस्पर्धा और शहरीकरण के जीवन में विशेष फाँक दिखता है | ‘किशोर’ की सोच ‘लीना’ को लेकर बेहद सम्वेदंशील है | ‘लीना’, ‘किशोर’ की पत्नि है | इस कहानी मे  पति-पत्नि के सम्बंध बिच्छेद को  बारीकी से देखने का प्रयास किया है | वर्तमान समय में पति-पत्नि के बीच जो अविश्वास का भाव पैदा हुआ है | सम्बंधों में विकल्प की सम्भावनाएं उभरी हैं | निर्णय लेने के बाद भी व्यक्ति अपने आप को संतुष्ट नहीं कर पा रहा है | उसकी असंतुष्टि को कहानीकारों ने बड़े ही तटस्थ हो कर बताया है |

इस संदर्भ में मन्नू भंडारी की कहानी यही सच है और बंद दराजों का साथ को देखें तो स्थितियाँ स्पष्ट हो जाती है | कि किस प्रकार स्वतंत्रता भी अवसाद का  कारण बनता है |  अ‍सल मे इस दौर की कहानियों में पात्रों की स्वतंत्रता वादी विचारधारा के नकारात्मक पक्ष को भी दिखाया गया है |  यह सच है कि हिंदी कहानी में आधुनिकता आई है परंतु उस आधुनिकता ने जीवन को सम्वेदनहीन और बोझिल बना दिया है | रचनाकारों को अपनी कमजोरियाँ और खामियों का पता चलने लगा है और अपने अकेलेपन को पात्रों के माध्यम से अभिव्यक्ति दी  |        सच तो यह है कि एक रचनाकार पूरे समाज को जीता है और अपनी भावनाओं और विचारों को सहजता से रखने का प्रयास करता है | ‘यही सच है’ में ‘इंदू’ ने जीवन में दो बार प्रेम किया है | प्रेम के बीच का उसका सफर द्वंद में गुज़रता है | और जहाँ द्वंद है वहाँ अंधकार है और जहाँ अंधकार है वहाँ अ‍वसाद  है |

वर्तमान समय में हिंदी कहानी के पात्र पूर्ण रूपेण यांत्रिक हो गये है | घुटन उनके केंद्र  में है | एक हद तक उन्होंने परम्प्राओं को तोड़ा है पर अपने जीवन के जकड़न को नहीं तोड़ पाया है |  कशमकस की ज़िंदगी जीते रहना उनका स्वभाव बन गया है | ऐसा ही कुछ ‘परिंदे’ के पात्रों में भी देखने को मिलता है | वर्मा जी के पात्रों में एक विशेष प्रकार का नीरसपन का आभास होता है | जो उसके जीवन के आकांक्षाओं और आशाओं को धूमिल कर देता है | वास्तव में हिंदी कहानी का पारूप निराशावादी नहीं था | लेकिन परिवेश की जटिलता ने उसके पात्रों को निराशावादी होने पर मजबूर कर दिया है | अमरकांत की कहानियाँ भी इसी परिपेक्ष्य में हमारे सामने आती हैं | उनकी कहानियों में पात्रों की जो समाजिक स्थिति है वह बेहद सोचनीय है | उनकी कहानियों में ज़िंदगी और जोंक ऐसी कहानी है जिसका पात्र रजुआ है | लेखक स्वय उसके स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं कर पा रहा | वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता | अपनी बेचैनी और निसहायपन का उसे ख्याल है | तभी उसके पात्र इतने  अवसादित रूप में हमारे समक्ष आते हैं |

मोहन राकेश उन रचनाकारों मे से हैं जिन्होंने विभाजन की त्रासदी को आत्मसात किया है | उनकी प्राय: सभी कहानियों के पात्र में एक ठहराव का बोध होता है एक ऐसा ठहराव जो पूरे वातावरण को चुप्पी साधने पर मजबूर करता है | मलवे का मालिक में चिराग़दीन के पिता गन्नी जब अपने मलबे को देखता है और देखती हुई उसकी आँखें खुली की खुली रह जाती है | ऐसा लगता है कुछ देर के लिए उसकी साँसें भी रूक गई हो | उसका हल्का शरीर कुछ देर के लिए भारी सा हो जाता है | और निराशा की लहरें उसके पूरे शरीर में कौंध जाती हैं | ये निराशा और ये ठहराव उस पर जान बूझ कर डाला गया होता है | और यही कारण है कि अपने बेटे को खोजती हुई उसकी आँखें कुछ देर के लिए जीवंत हो उठती हैं |

इसके उपरांत कमलेश्वर की बात करें तो उनके पात्र भी अपनी दिशाओं को खोजते हुए नज़र आते हैं | इस कहानी का पात्र चंदर के समक्ष जो परिस्थियाँ हैं वह बिल्कुल प्रतिकूल है | उसने जीवन भर जिस लड़की से प्रेम किया | आज उसी लड़्की ने उसकी भावनाओं को अनदेखा कर दिया है | खोई हुई दिशाएं भारतीय वर्ग विशेष की बदलती मानसिकता का परिचायक है | क्या होता है जब किसी क्यक्ति का स्वप्न टूट कर बिखर जाता है और उसकी कल्पानाओं को तुफान अपने आगोश में ले उड़ता है | निराशा की बू उसके सम्पूर्ण जीवन की खुशबू को पल भर में धो डालती है | असल में कमलेश्वर के पात्र भारतीय युवा वर्ग की मानसिकता और उनके घुटन को दर्शाता है |

‘उषा प्रियंवदा’ के पात्र की स्थिति में भी अकेलेपन और निराशा की स्थिति बनी हुई  है | यहाँ  भी अवसाद और कुंठा का रूप मौजूद है | कहानी वापसी को देखें तो पता चलता है कि व्यक्ति अपने जीवन में सब कुछ प्राप्त करने के बाद भी बेचैन रहता है | ‘गजाधर बाबू’ इस कहानी के एक ऐसे पात्र हैं जिनकी उम्र परिवार की सेवाओं में गुज़रती है | त्याग और बलिदान के रूप में ‘गजाधर बाबू’ निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करते हैं | किंतु उन्हें जब परिवार की ज़रूरत होतीहै तो परिवार उन्हें अकेला छोड़ देता है | इस कहानी की सबसे ख़ास बात यह है कि इसमें पत्नि भी पति के समक्ष परिवार को चुनती है|

कुल मिला कर हिंदी कहानी में पात्रों की स्थिति में उतार चढाव होता रहा है | सभी रचनाकारों ने अपने अपने ढंग से पात्रों का गठन किया है | प्रेमचंद युगीन कहानियों को छोड़ दिया जाये तो अब तक की जो भी कहानियाँ है उसके पात्र में अकेलापन, बेचैनी , जटिलता , शिथिलता, निराशा खीझ और अवसादवादी प्रवृति देखने को मिलती है | इसका परिणाम और कारण दोनों हिंदी कहानी के अंत;वस्तु में छुपी हुई है | वर्तमान समय के प्रति स्पर्धा ने और वैश्वीकरण ने मनुष्य की मनोवृति को अंधेरे में छोड़ दिया है | जहाँ उनकी आत्माएं  चीख-चीख कर अपनी आज़ादी की गुहार लगा रही है | उस अंधकार में भी एक ऐसे किरण को तलाश रही है जिसकी उम्मीद अब भी ज़िंदा है |

3 Comments »

  • Tripurari Kumar Sharma said:

    प्रवेश जी का प्रवेश स्वागत योग्य है…

    शुभकामनाएं…

  • nisha singh said:

    apki dirsti bohat peni h.ap aane wale samay k ache alochak h.

  • nisha singh said:

    ap ek behtrin alochak h.apki dwara ki gai ye tipri bohat hi satik h