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कुछ सवालों के संग मैं भी हूं अन्ना के साथ…

7 April 2011 One Comment

योगेश समदर्शी एक ऐसे कवि और कलाकार हैं, जिन्हें प्रोफेशनल एक्सिलेंस और भावना, दोनों के साथ न्याय करना आता है। आज़ादी बचाओ आंदोलन से जुड़े रहे योगेश बाबू अन्ना हजारे के आंदोलन के साथ वैचारिक सहमति जताते हुए कुछ सवाल भी पूछ रहे हैं, जिनके जवाब तलाशने बहुत ज़रूरी हैं…

 

# योगेश समदर्शी

अन्ना हजारे का अनशन चल रहा है. मीडिया जमा है. हर पल की खबर देश-विदेश की जनता को मिल रही है। लगभग पूरे देश मे‌ अन्ना आधुनिक गांधी के रूप मे देखे जा रहे हैं. जगह-जगह से लोग अन्ना के इस अभियान से जुड रहे हैं. मै तीन दिन से लगातार जन्तर मन्तर पर जा रहा हू. वहां की हवा देख रहा हूं. देख रहा हूं कि किस तरह से लोगों में उत्साह है. जोश है. लोग टीवी पर देख कर आन्दोलित हो रहे है. जन लोकपाल विधेयक को भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत हथियार माना जा रहा है. राजनैतिक गलियारों में भी इस अनशन से खलबली है. देश की सरकार भी हिलती दिखाई दे रही है.

देश का युवा वर्ग एकजुट दिखाई दे रहा है. बडे़-बडे़ बयान आ रहे हैं. हर जमात से आ रहे हैं. जैसे वास्तव मै सारा देश भ्रष्टाचार से मुक्त होना चाहता है. पर एक सवाल है. क्या अन्ना की मांग मानलेने से और पूरी तरह से जनलोकपाल बिल को मन्जूर कर देने के बाद कोई गारंटी दे सकता है कि भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा?

मैं दिल से अन्ना के साथ हूं। इस् अभियान के साथ भी हूं. खुद बहुत भ्रष्ट भी नहीं हूं (क्योंकि जहां काम करता हू, वहां मै चाहकर भी भ्रष्टाचार नहीं कर सकता हूं) फिर भी मैं खुद यह सवाल  उठा रहा हूं कि मीडिया बूम के कारण यदि हम इसे कोई बदलाव की आन्धी कह भी दे‌ तो क्या यह अतिश्योक्ति नही‌ं होगी।

पहली बार ऐसा थोडे़ ही हो रहा है. जे पी आन्दोलन को याद कीजिए. सरकार तक गिरी, लेकिन बाद मे‌ क्या हुआ। उस आन्दोलन से जुडे़ एक् नेता जो एक् राज्य के मुख्यम‌त्री भी रहे, खुद उनपर भ्रष्टाचार का मुकदमा चला. आन्धी है. बद्लाव भी सम्भव है. पर क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून बन जाने मात्र से भ्रष्टाचार मिटने वाला है. हत्या के खिलाफ कानून भी है और सजा भी. तो क्या हम कह सकते हैं कि हत्या पर रोक लग गई. सबसे अधिक भ्रष्टाचार कोर्ट में है. न्याय की शुद्द्ध्ता की कोई गारण्टी दे सकता है क्या? तो नए कानून को कैसे लागू कर पाएंगे यह कठिनाई मुझे तो दिखती है. हां, यह भूख हडताल ओर् लोगों का हुजूम यदि खुद आगे आकर खुद के जीवन से भ्रष्टाचार को निकाल फेंकने का संकल्प दिखाए,  शु्द्ध जीवन अपनाने की तरफ अग्रसर होकर दिखाए. अन्ना से अन्ना के चरित्र व सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा ले कर इस् अभियान से जुड़े तो यह कहा जा सकता है कि यह लडाई क्रान्ति की दिशा मे‌ जा रही है.

युवक सन्कल्प लें कि वह जीवन मे कभी चरित्रहीनता नहीं अपनाएगे. जीवन में गलत रास्ते से सफलता नहीं प्राप्त करेगे. हक और हलाल की कमाई से ही जीवन यापन करेगे. ईमानदारी के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे. मेरा मानना है कि अन्ना के अनशन का सही मायने मे‌ समर्थन तभी होगा, जब इस अवसर पर हम अपने व्यवहार में परिवर्तन लाएगे. केवल नारे लगाकर समर्थन करने से जन लोकपाल बिल पास हो जाएगा, कानून भी बन जाएगा पर भ्रष्टाचार खत्म नही‌ होगा.. आओ चरित्रवान भारत बनाने की तरफ कदम बढाएं…

और अब गोंडा से आई एक तस्वीर, जिसमें वहां के कई जोशीले युवा हाज़िर हैं, यह कहते हुए–अन्ना के साथ हमारे हाथ हैं…

One Comment »

  • Anand Rathore said:

    apne bachchon se apne ghar se shuru karen ye kaam…tabhi sambhav hai ek imandar nagrik desh ke liye taiyar karna….saath sarkar aur samaj sunishchit kare ki kisi ko lachari mein galat kadam uthane ke liye majboor na hona pade…

    जनता की मांग न मानना तानाशाही है. लोकतंत्र नहीं

    आदरणिय प्रधानमंत्री जी

    लोकपाल बिल मानने में समस्या क्या है? देश का हर नागरिक इस से सहमत है. फिर आप लोगों को किस बात का डर है ? यहाँ तो आप लोगों की वोटे भी नहीं कट रही? कोई भी कारण आप बता सकते हैं जिसकी वजह से आप इसे टरका रहे हैं? देश की जनता इतनी मूर्ख नहीं है , कि अगर आप कारण बताएं और हम समझ न पायें. आप लोकपाल बिल न पास करने का एक उचित कारण बता दीजिये , हम अन्ना हजारे का साथ नहीं देंगे.. लेकिन हमे पता है… आप के पास कोई कारण नहीं है. माफ़ कीजियेगा इस से हमे यही सन्देश मिलता है, की आप भी भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं करना चाहते. हमे आपकी इमानदारी पर कोई शक नहीं है, लेकिन देश की जनता आप पर ऊँगली उठाने लगी है . इसकी वजह आपको तलाशनी होगी.. अन्ना हजारे की मांग जायज है और ये हम सबकी मांग है. जनता की मांग न मानना तानाशाही है. लोकतंत्र नहीं. .. जनता अगर नाजायज मांग करे तो बात समझ में आती है. उसे नहीं माना जाना चाहिए. लेकिन लोकपाल बिल में कुछ भी नाजायज नहीं है… ये जनता के हक में है..आप बस लोकपाल बिल न मानने की एक वजह भी बता दीजिये.?

    दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की असली स्वामी जनता है और उसके नाते मुझे आप और हर मंत्री -संत्री को हुकुम देने का अधिकार है.. फिर भी आपसे हाथ जोड़ कर प्रार्थना है , कि जनता कि आवाज़ को पहचानिए … आप जैसे ईमानदार प्रधान मंत्री से हमे आशाएं हैं. आशा है आप हमारे जज्बातों की कद्र करेंगे ..

    आपका शुभाकंशी
    आनंद राठोर

    A drop of ink, makes million think