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‘तुम को न भूल पाएंगे’

5 April 2011 2 Comments

अब्बास नकवी युवा पत्रकार हैं। बिहार के रहने वाले अब्बास प्रभात खबर में भी रहे और इन दिनों दिल्ली के एक हिंदी दैनिक में कार्यरत हैं। विश्वकप में भारत की उल्लेखनीय जीत के पार्श्व में जिन दो खिलाड़ियों की विदाई को महत्व नहीं मिला, उन्हें ही याद कर रहे हैं अब्बास।

# अब्बास नकवी

जोश, जुनून, जीत के साथ विश्वकप समाप्त हो गया। जाहिर सी बात है एक भारतीय होने के नाते मेरे लिए यह विश्वकप यादगार रहा। इन सब के बावजूद यह विश्वकप छोड़ गया कई यादें–कुछ अच्छी और कुछ बुरी। विश्व के दो महान गेंदबाजों ने क्रिकेट की दुनिया को आखिरी सलाम कहा। रावलपिंड़ी एक्सप्रेस को जहां आखिरी मैच खेलने का मौका नहीं मिला, वहीं आखिरी मैच खेल रहे दुनिया के महानम गेंदबाज मुथैया मुरलीधरन विकेट के लिए तरसते नजर आए। इन दोनों खिलाड़ियों की ऐसी विदाई होगी, शायद ही किसी ने सोचा हो।

मुरलीधरन का ये पांचवां विश्वकप था। टेस्ट और वनडे, दोनों ही में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले मुरलीधरन ने टेस्ट से तो पहले ही संन्यास ले लिया है, लेकिन इस विश्वकप के बाद उन्होंने वन डे क्रिकेट को भी अलविदा कह दिया। यकीनन टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने 800 विकेट लिए हैं और वनडे में 534 विकेट लेकर ऐसा विश्व रिकॉर्ड बना दिया, जिसे तोड़ना किसी भी गेंदबाज के लिए आसान नहीं होगा। अंतिम विश्वकप में मुरलीधरन ने 15 विकेट लिए। संयोगवश ही सही मुरली ने टेस्ट और वनडे में आखिरी पारी भारत के खिलाफ खेली। इसे महज एक संयोग कहा जा सकता है। मुरलीधरन स्पिन गेंदबाजी का नया व्याकरण रचने वाले गेंदबाज के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे।

मुरली का कैरियर काफी उतार-चढ़ाव का गवाह बना। अपने आपको साबित करने के लिए उन्हें कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ा। उनकी स्पिन गेंदबाजी को लेकर शुरुआत में कई सवाल उठे,  लेकिन 1996 और 1999 में दोनों बार आईसीसी ने उन्हें क्लीनचिट दे दी। वर्ष 1992 में 20 साल की उम्र में ऑस्ट्रेलिया के साथ खेले गए अपने पहले टेस्ट के दौरान 141 रन देकर उन्होंने तीन विकेट लिए। ज्यादा से ज्यादा टेस्ट विकेट लेने की होड़ में शेन वॉर्न को वो लगातार कड़ी टक्कर देते रहे। तीन दिसंबर 2007 को मुरलीधरन ने इंग्लैंड के साथ खेलते हुए 709 वां विकेट लेकर इस कीर्तिमान पर अपना परचम लहरा दिया। फरवरी 2009 में उन्होंने वनडे में वसीम अकरम के 502 विकेट के रिकार्ड को तोड़ा। 534 विकेट के साथ उनका ये रिकॉर्ड आज भी कायम है। श्रीलंकाई चीते उन्हें वे विदाई नहीं दे सके जिसका उन्हें हक था।

दुनिया के सबसे तेज गेंदबाज शोएब अख्तर को भारत के खिलाफ मैच में बेंच पर बैठना पड़ा। भारत के हाथों मिली हार के बाद यह खिलाड़ी चर्चा काफी पीछे छूट गया, जो वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट जगत में चर्चा के केंद्र में बना रहा। कभी सुपरफास्ट गति से, तो कभी साथी खिलाड़ी को पीटने के कारण। 30 मार्च को भारत और पाक के मैच के शोर-गुल के बीच इस खिलाड़ी को भुला दिया गया। शोएब ने आखिरी मैच न खेलने का दर्द ट्विट करके बयान किया।

शोएब ने लिखा – काश मैं भी आज का मैच खेल पाता। यह है एक खिलाड़ी की व्यथा, जिसने वर्षों तक पाकिस्तानी तेज गेंदबाजी आक्रमण का नेतृत्व किया। राविलपंडी एक्सप्रेस इस तरह से यार्ड में जाएगी, किसी सोचा भी नहीं था। शोएब अख्तर की चर्चा करते समय उन्हें एक बेहतर गेंदबाज के अलावा, एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में भी याद किया जाएगा, जिनका विवादों से कभी पीछा नहीं छूटा। अपने कैरियर के दौरान ज्यादातर विवादों के लिए वे खुद ही जिम्मेदार रहे। चाहे वो डोपिंग का मामला हो, साथी खिलाड़ियों से झड़प का मामला हो।  शोएब अख्तर हर मामले में संतुलन खोते रहे। उनपर गेंद से छेड़छाड़ के आरोप लगे। इन सब के बीच वे फिटनेस से भी जूझते रहे। इन सबके बावजूद 35 वर्षीय शोएब अख्तर ने क्रि केट प्रेमियों को क्रि केट की अद्भुत दुनिया दिखाई। वर्ष 1997 में शोएब ने पहला टेस्ट वेस्टइंडीज के खिलाफ खेला। अख्तर की वो शानदार गेंदबाजी कौन भूल सकता है, जब उन्होंने 1999 की एशियन टेस्ट चैंपियनशिप के दौरान कोलकाता टेस्ट में दो लगातार गेंदों पर सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ आउट किया था। शोएब ने अंतरराष्ट्रीय कैरियर में 46 टेस्ट मैच और 163 एक दिवसीय मैच खेले। उन्होंने टेस्ट में 178 विकेट और वनडे में 247 विकेट लिए। 14 साल का उनका कैरियर हमेशा विवादों से घिरा रहा।

कैरियर के आखिरी पड़ाव पर शोएब में पहले जैसी धार नहीं रह गई। दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमी अब शायद शोएब और सचिन की जुंगलबंदी नहीं देख सकेंगे, जिसका उन्हें भी मलाल होगा। जहां शोएब का मैदान पर गेंद लेकर पैथर स्टाइल में दौड़ना लोग मिस करेंगे ,वहीं मुरली की फिरकी भी लोगों को नजर नहीं आएगी। दुनिया की यही रीत है, जो आता है उसे जाना ही पड़ता है। इन सब के बीच एक ही वाक्य याद आता है ‘तुम को ना भूल पाएंगे ’। अलविदा मुरली और शोएब…

2 Comments »

  • nafees said:

    world cup 2011 was totally dominated by sachin tendulkar n this was the main reason both of above players were not highlighted much.anyways thanx for refreshing there memories once again………very well written….

  • Haider said:

    well said Sir !! i agree. I am going to miss Murali for sure.