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चौराहा पर पांच कवि

4 April 2011 2 Comments

विता की दुनिया में सन्नाटा हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। सच यह है कि प्रेमी और कवि, हर मोहल्ले की पूरी जनसंख्या के हिसाब से तकरीबन आधे तो होते ही हैं। ठीक वैसे ही, जैसे हंसी-मज़ाक में लोग कहते हैं–जवानी में कम्युनिस्ट,  अधेड़ावस्था में संघी/भाजपाई/ और बुढ़ापे में कांग्रेसी हो जाते हैं (यह महज मज़ाक है, दिल पे नहीं लेने का) । ख़ैर, कवियों / शायरों की बाढ़ में उम्र के अनुपात में कमी आती है, तो कई बार इज़ाफा भी होता है। मसलन–जवानी में गज़ल / कविताएं लिखने वाले बड़े होते-होते इस धर्म से रिटायर भी होने लगते हैं। ऐसी चौराहा-छाप, दो कौड़ी की समीक्षा पढ़कर आप सिर धुनें, इससे पहले मुद्दे पर आ जाता हूं, सो मुद्दा यह है कि चौराहा पर आज पांच कवियों / कवयत्रियों को हम ला रहे हैं। इनमें एकदम युवा से लेकर मेच्योर उम्र और विचार के लोग भी शामिल हैं। इन पांचों  रचनाकारों के बारे में मैं अपनी समझ से बस इतना ही कह सकता हूं कि ये सब कविता अपने जीवन से तलाशकर लाए हैं। कभी प्यार में गिरफ़्तार हुए, किसी लमहा निराश हुए, कभी खुशी से सराबोर हुए और तब लिखा। इनाम-इकरामों के लिए नहीं, रिसालों के लिए नहीं, शोहरत की खातिर नहीं, बस कुछ कहने की जद्दोज़हद और तड़प से इनकी कविता निकली है। इन रचनाओं के प्रतीकों को भले ही अट्ठारहवीं सदी का कहा जाए, बासी-अनुत्प्रेक बोल दिया जाए, इसे साहित्य में अनधिकृत हस्तक्षेप माना जाए, लेकिन ये भी सच है कि ऐसे ही दीवाने लिट्रेचर की नई परिभाषा लिख देते हैं, कुछ और नए रास्ते खोल देते हैं : मॉडरेटर

इस मंच पर पहला नाम है मनीषा उपाध्याय का। मनीषा दक्षिण भारतीय फ़िल्मों में काम करने के अलावा, टेलिविजन की चर्चित पत्रकार हैं। इन दिनों फोकस टेलिविजन में एक्जिक्यूटिव प्रोड्यूसर की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी संभाल रही हैं। रात अभी बाकी है, सरीखे हिट कार्यक्रम की एंकर मनीषा का दिल शायराना है, सो वह खूब-खूब लिखती भी हैं। किसी पब्लिक डोमेन पर मनीषा की यह पहली प्रस्तुति है।

 

1.

हमसे ना पूछो हमारी बर्बादी की दास्तां…
बड़ी मुश्किल से खुद को जोड़ा है
टूटने का डर है, फिर बिखरने का खतरा है…
कहना चाहें तो कैसे कहें
अरमा नहीं, जिगर निचोड़ा है
अश्क नहीं आंखों से, हमने लहू बहाया है
कातिल नहीं कोई हमारा…
अपनों ने रुलाया है
हमसे ना पूछो हमारी बर्बादी की दास्तां
बड़ी मुश्किल से खुद को जोड़ा है
टूटने का डर है फिर, बिखरने का खतरा है
बिन लब खोले गर कहना चाहें आंखो से तो कैसे कहें
है दिल में जलती चिंगारी…
अश्कों का समुंदर गहरा है…
तुम कहते हो, के धूल हटादो..बीती बातों से…,उन यादों से
हम कहते हैं,…जरा हवा चले….तो पता चले
ये सुलगते हुए अंगारे हैं…
पुराने जख्मों को ना कुरेदो..नए फसाने बाकी हैं
सपनों का शीशमहल नहीं हमारा
टूटे हुए घरोंदें है…
मिट्टी की दीवारों के बीच…कुछ घुटती सांसों को छोड़ा है
हमसे ना पूछो हमारी बर्बादी की दास्तां
बडी मुश्किल से खुद को जोड़ा है…

2.

बिछड़े साथी से बरसों बाद मुलाकात

बेकसी के उस आलम में,
कुछ ऐसी एक मुलाकात हुई…
दो घड़ी दिल को रोका,
दो घड़ी में दिल से बात हुई
यादों का सैलाब उमड़ा,
लम्हों की बरसात हुई
दो घड़ी को चंदा यूं चमका,
दो घड़ी में काली रात हुई
जुदाई का मंज़र याद आया,
तस्वीरें भी साफ हुईं
दो घड़ी को शिकवे किए,
दो घड़ी में ख़ता माफ हुई
सिमटे जज़्बातों के दरिया में,
तेज़ उलफत की मौज हुई
दो घडी को फिर दिल धड़का,
दो घड़ी में रोशन रात हुई

3.

शाख टूटी जब दिल मिले
जाने कैसे गुल खिले
आंखों में था रिमझिम का मौसम
पैरों में सूखे पात बिछे
खामोश-सी उन निगाहों में
सपनों का कांरवां चले
तपते सूरज की गरमी में
दिल के हर एक तार जले
मेहंदी रची हाथों में
लकीरों में अरमान बसे
पूरा हो हर ख्वाब हमारा
या रब ऐसी मिली किस्मत किसे
4.
वो गिने जाते है, मुल्क के वफादारों में,
कंचों का खेल बचपन में
जो बिन बेईमानी ना जीत सके
कौन कहता है, लेन-देन का काम नहीं दिल की बातों में
वो ज़ख्मों के सौदागर हैं बडे़, मरहम जो ना बेच सके
नारेबाज़ी करते है वो, अमन-सुकूं की चाहत में
कंकड़ मार उडा दे जो बैठे पंछी का चैन ना देख सके

5.
बेवफाई कर गया
पलकों से छलका वो एक आंसू
उनकी याद सीने में दफनाए
वरना महफिलों में लाख मुस्कानें लुटाईं हमने

खाक़ हुई दिल की बस्ती,
हम शोर करके परेशां हुए
बन रहे है अंजान वो,
जिनकी हर आह पर जान लुटाई हमने

बहारों की कभी तिश्नगी ना थी,
खुशबुओं के कभी दीवाने ना थे
ये समझाकर नादान दिल को
हिज्र को भी गले लगाया हमने
जिया ना गया , सहा ना गया,
आंखो से पानी भी रवां हुआ
सदिया बीत गईं…..मुस्कुराने की चाहत में….
हर एक अश्क बहाया हमने

यूं भी दूर तलक,
मायूसी के साए थे
वो दिल के चराग भी बुझा गया
जिस रौशनी के खुदा की आस में
सितारों-सा दिल जलाया हमने
दिल की खरोचों को सिया,
लहू को बहने दिया
निशान दर्द के ना मिट सके
जख्मों को लाख छुपाया हमने

वक्त की धार भी थम गई,
जुगनू भी टिमटिमाकर फना हुए
ज़माना बीत गया, चोट खाए मगर
दिल को दुबारा ना धडकाया हमने

6.

तड़प के छलके जब अश्क,
तनहाई के सेहरा में
ग़म के उस एक लम्हे में
जाने कितने सावन बीत गए

बर्बाद हुए हम, गमसार हुए
रो-रोकर ज़ार–ज़ार हुए
दिल जलाकर मेरा,
मुझसे ही वो हंसने के बहाने सीख गए

सांझ ढली जब, रात जली जब
चांद का भी पहरा था
नींद तो ना आई,
मगर उस करवट में
जाने कितने सपने टूट गए

7

मुझे छूकर, कुछ यूं गुज़री है हवा…
इश्क के शोलों को फिर जलाना हो जैसे….
मुझे छूकर, कुछ यूं गुज़री है हवा…
दफ्न यादों को फिर जगाना हो जैसे

दिल पर चोट खाकर, हम यूं भी जिंदा नहीं है
मगर मुझे छूकर , कुछ यूं गुज़री है हवा…
मेरा दिल गम-ए-तीर का निशाना हो जैसे

दर्द-ए-उलफतने ,ख़ाक़-ए-नशीं कर दिया है
मगर मुझे छूकर, कुछ यूं गुज़री है हवा…
इस राख से कोई बारूद, सुलगाना हो जैसे….

8

वो रोज़ दरवाज़ा खटखटाकर
जाने कहां गुम होता रहा
मैं रोज़ शाम उस दहलीज़ पर
दिये को हवा से बचाती रही
दोपहर की परछाईं सा
आंख-मिचौली वो खेलता रहा
मैं रोज़ छत की मुंडेर से
धूप से आंख मिलाती रही
दूर किसी पहाडी से वो
रोज़ मुझे पुकारता रहा
मैं बेचैन होकर उस बुलावे पर
यूं आवाज़ से नाता निभाती रही
चंचल था वो लहरों सा आता और जाता रहा
मैं रोज़ ख्वाब के उस साहिल पर
एक रेत का घर बनाती रही

 

भरत तिवारी। मूलतः  यूपी के फैजाबाद के रहने वाले हैं। व्यवसायी हैं और शानदार पर्सनेलिटी के मालिक हैं। मूलतः शायराना मिजाज़ के हैं, सो उर्दू पसंदीदा ज़बान है। सबसे पहले उनका लिखा हुआ

उसकी नज़रों की है  तलाश मुझे

जो देखे है मेरी ही आँखों से मुझे …

मैंने ढूंढा बहुत इन किताबों में तुझे

ना मिला तू हर्फ़-ओ-इबारत में मुझे..

चढ़ी सीढ़ियां तमाम सर ये झुका

जो था ना वहाँ क्यों बुलाया मुझे…?

पेशानी हुई काली तो हुई लाल कहीं

नजर तू फिर भी  नहीं आया मुझे..

यकीं है अब, के तू है आसपास कहीं

दिखा दे ज़रिया दरस भी दे दे मुझे …

मिली दामन की तेरे मासूम छाँव

तू मिला आवाज़ में माँ की मुझे…

तेरे ख्याल हैं तेरा है कमाल यहाँ

समझता आलम हैं ‘दस्तकार’ मुझे…

 

हम तो तब ही रंग गए थे

जब

मैं से हम हुए थे

इश्क का ख्वाब देखा

फिर कहाँ हम हुए थे …

प्यास से मोहब्बत

बे-अब हम हुए थे …

वो गरीब शहर

अजीब था

जहाँ दुनिया के हम हुए थे …

आँख लगती नहीं ‘भरत’ की

किस नज़र से जुदा हम हुए थे…

*बे-अब = बिना पानी के

चौराहा पर पंडित प्रेम बरेलवी की ग़ज़लें आप पहले भी पढ़ चुके हैं। आज पेश हैं, उनकी कुछ और रचनाएं। प्रेम इन दिनों एक हिंदी अखबार में बतौर सब एडिटर कार्यरत हैं और फ्री-लांस भी खूब लिखते रहते हैं।

(1)

हमारी ख़्वाहिशों का यूं जनाज़ा वह निकाले है।

हवा के रुख़ पे जैसे धूल के कंकड़ उछाले है।।

छुपा है क्यूं मुझे यूं देखकर यह चांद बदली में,

दुपट्टा जैसे दुल्हन रुख़ पे शरमा करके डाले है।

निकलकर आ रहा है वो भरी रुत में बहारों-सा,

भला ऐसे में कैसे कोई अपना दिल संभाले है।

हुआ है ख़ुश हमारी मौत से शायद कोई पैकर,

हमारी कब्र पर अब तक ये बादल अश्क डाले है।

दुआओं का हमें देता है तोहफा उम्र लम्बी हो,

सितम जिसका कि ग़म जिसका हमीं को मार डाले है।

भरी महफिल में पहुंचा है अभी बेपर्दा होकर वो,

यह मुमकिन है कोई पागल उधर कीचड़ उछाले है।

बशर की जि़न्दगी और मौत में है फ़र्क कितना-सा

कि लेवे जि़न्दगी सांसें, मौत आकर निकाले है।

वफ़ा में लब नहीं खोलूं तुम्हारी यह अजब-सी जि़द,

हमारा दिल निकाले है, हमारी जां निकाले है।

बड़ी लम्बी जुदाई है, सफ़र तन्हा कि ऐसे में,

पिया चिठिया न डाले है, न डाले है, न डाले है।

किसे है ‘प्रेम‘ दुनिया में वफ़ा से वास्ता यारो,

जिसे भी देखिए साहिब, वही मतलब निकाले है।

(2)

दर्द से सामना नहीं होता।

वक्त अब ख़ुशनुमा नहीं होता।।

सिर्फ़ यादें हैं रात-दिन उनकी,

वस्ल उनसे ज़रा नहीं होता।

इश्क़ में टूट जाए दिल कोई,

मर्ग से कम सिला नहीं होता।

तर्क की बात प्यार से कर लो,

रज़्म से फ़ैसला नहीं होता।

तुम अगर बेवफ़ा नहीं होते,

मैं कभी बेवफ़ा नहीं होता।

इश्क़ की ‘प्रेम‘ हद नहीं होती,

हिस्र का ख़ात्मा नहीं होता।

 

और चौथे कवि हैं भोलानाथ शुक्ल। गोंडा, यूपी के रहने वाले भोलानाथ ने वीडियो संपादन की पढ़ाई की है, एकेडेमिक्स की पढ़ाई पूरी करने में जुटे हैं। फिलहाल, अपने शहर में ही हैं और प्रचुर मात्रा में कविताओं का उत्पादन कर रहे हैं।

1.
किसी की राह खो गई

किसी को चौराहा न मिल सका
कभी सफ़र पर जब हम चले
तो साथ तेरा न मिल सका
सवाल तो बहुत से हैं
पर जवाब देने वाला कोई न मिल सका
जूनून तोअकारण ही शांत हो गया
मगर सुकून मुझे न मिल सका
यह आइनों का ख्वाब था
वो देखने से रह गए
किसी भी नर्म दोष पर
उनके सामने सर ये न झुक सका
अभी डग हमने भरा न था
कि रास्ते सारे सिमट गए
तेरा साथ ऐसा  छूटा
कि कदम जिन्दगी के ठिठक गए
अभी कल की ही तो बात है
वो मेरे साथ – साथ था
जरा पलक क्या झपक गई
कि उसका साथ जीवन भर न मिल सका

2.

कुछ बीते-अच्छे दिन जब याद आते हैं,
तो आँखों में तुम्हारी यादों के साथ
कुछ अनसुलझे प्रश्न कौंध जाते हैं,
प्रश्न हमारी कहानियों से जुड़े  हुए
सच में मैंने खुद को तुम्हारी यादों में इतना डुबा लिया है
हर पल जिन्दगी का बीतता है सदियों  की तरह
शाम होती है तो हृदय मेरा
चीखता है तुम्हारे दर्द से
तुम पूछती हो-हम इन राहों में क्यों हैं अकेले
मैं देता हूं सांत्वना-
शायद जिस चौराहे पर खड़े हैं हम
उसकी कोई राह तुम्हारे घर से नहीं गुजरती

कविताओं की इस महफ़िल के पांचवें हस्ताक्षर हैं महावीर जायसवाल। महावीर प्रखर पत्रकार हैं। दैनिक एनकाउंटर के संवाददाता के रूप में सफ़र शुरू किया और कड़ी मेहनत के दम पर अमर उजाला, लखनऊ में वरिष्ठ संवाददाता की कुर्सी तक पहुंच गए। ख़बरों को लेकर गहरी भूख उनमें है और ठीक ऐसी ही तड़प लिखने-पढ़ने को लेकर है।

तेरा चेहरा…

हथेलियों पर देखा था जिसका चेहरा ..
रेखाएं मिलती, सिकुड़ती, फैलती …
फिर तन-सा जाता उसका चेहरा …
यह चेहरा ही तो है जिसे रोज हथेलियों में ….
पढ़ा करते हैं …..

बारिश की बूंदों

बारिश की बूंदों से वर्षा रानी की याद आई.
जब हमें उसकी बूंदों से मिलती थी राहत.
उसकी हर बूंद से करते थे प्यार इतना,
कि हर बूंद को हथेलियों से जकड़ कर …
बाहों में भरते, दुलराते, छेड़ते ….
और फिर हथेलियों को गाल पर लगाते ….

हम भी कभी इश्क किया करते थे

जब उसकी धुन में जिया करते करते थे,
हम भी चुपचाप पिया करते थे,
आँखों में प्यास हुआ करती थी,
दिल में तूफान उठा करते थे,
लोग आते थे हमसे गजल सुनने,
हम उनकी बातें किया करते थे,
सच समझते थे उनके वादों को,
दिन-रात उसकी यादो में जिया करते थे,
सपनो में उससे मिलकर,
दिल में फूल खिला करते थे,
घर की दीवार सजाने की खातिर,
हम उसका नाम लिखा करते थे,
आज उन्हें देखकर फिर याद आया,
हम भी कभी इश्क किया करते थे.
हम भी कभी इश्क किया करते थे.
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मेरी बेबो अब उसकी परी बन गई….

मेरी बेबो अब उसकी परी बन गई….
परी ही रहना उड़नपरी मत बनना …
पंख संभालना, दरिन्दे बहुत है यहाँ ….
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उसका मेकअप हो रहा था धुआं ….

सोचा था उसका कत्ल कर देंगे …
पर ख़ुद का ही कत्ल करवा बैठे …
जब उसे सजा देने की बारी आई तो …
… ख़ुद पर इल्जाम लगा बैठे ?

हम रुखसत हुए उनकी यादें लेकर …

वे मस्त हुए मेरी कब्र पर आकर …

ऊपर से आँखों में अश्क थे,

अन्दर से चमक, मेरे रुखसत होने की

मेरा दिल फिर भी तड़प रहा था ….

उसका दिल मार रहा था हिलोरे …

कब्र की मिटटी मेरे दिल की आंसू से हो रही थी गीली …

उसके बनावटी आंसू से, चेहरा नही …

उसका मेकअप हो रहा था धुआं ….

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दोस्ती मरते दम तक निभाएंगे…..

खुदा से क्या मांगू तेरे वास्ते
सदा खुशियों से भरे हों तेरे रास्ते
हंसी तेरे चेहरे पे रहे इस तरह
खुशबू फूल का साथ निभाती है जिस तरह
सुख इतना मिले की तू दुःख को तरसे
पैसा शोहरत इज्ज़त रात दिन बरसे
आसमा हों या ज़मीन हर तरफ तेरा नाम हों
महकती हुई सुबह और लहलहाती शाम हो
तेरी कोशिश को कामयाबी की आदत हो जाये
सारा जग थम जाये तू जब भी गए
कभी कोई परेशानी तुझे न सताए
रात के अँधेरे में भी तू सदा चमचमाए
दुआ ये मेरी कुबूल हो जाये
खुशियाँ तेरे दर से न जाये
इक छोटी सी अर्जी है मान लेना
हम भी तेरे दोस्त हैं ये जान लेना
खुशियों में चाहे हम याद आए न आए
पर जब भी ज़रूरत पड़े हमारा नाम लेना
इस जहाँ में होंगे तो ज़रूर आएंगे
दोस्ती मरते दम तक निभाएंगे…..
एक बिछड़े दोस्त के लिए…
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बहुत उदास हैं ….तिनके

हम बहुत उदास हैं ….
सोचता हूँ उस तिनके का क्या होगा ….
जो हवा के झोंके से कभी तनता है, तो कभी गिरता है..
फ़िर भी पड़ा रहता है मौन…
ना रोता है, ना हँसता है ….
बस उस एक झोंके का इन्तजार करता है …
जो उस को पहुंचाए कहीं और ……

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मैं मरना नही चाहता… : जाफरी

भाइयों,
मैं मरना नही चाहता ।
वो मुझे कत्ल कर देंगे तो मैं तुम्हारे दिलों में जिन्दा रहूँगा ।
मैं आरागोन की नज्मों में जिंदा रहूँगा…
उन मिसरों में जो आनेवाले खूबसूरत दिनों की बशारत देते हैं ।
मैं पिकासों के फन में जिंदा रहूँगा …
राबसन के गीतों में जिंदा रहूँगा ।
और सबसे ज्यादा …
और सबसे बेहद तरीके से …
मैं रफीकों के कामयाब व कामरान कहकहों में जिंदा रहूँगा ।

(अंतिम कविता  ‘लखनऊ की पाँच रातें ‘ के ‘गलीना ‘से ली गई है, जिसे ‘अली सरदार जाफरी ‘ने मास्को यात्रा के दौरान रचा। जाफरी जुलाई 1955 में मास्को यात्रा पर थे, जहाँ एक दिल के रोगी शायर ने मरते हुए पलों में  यह सबकुछ कहा था। गलीना उस शायर की डॉक्टर थी, जो शायर को किसी तरह से बचाना चाह रही थीं। एक मार्मिक रचना से लबरेज इस लेख में डॉक्टर और मरीज के संबंधों को उकेरा गया है । जाफरी उत्तर प्रदेश के गोंडा जनपद से जुड़े बलरामपुर में पैदा हुए, जो अब अलग जनपद बन चुका है )

 

पेंटिंग्स : कलाकृतियां : jim_warren, eonid-afremov,
zapatastudios.compopartmachine.comescapeintolife.com तथा अन्य वेबसाइट्स

2 Comments »

  • Ashish said:

    बहुत मुश्किल है बंजारा मिज़ाजी ,

    सलीका चाहिये आवारगी में भी |

  • Tripurari Kumar Sharma said:

    हुआ है ख़ुश हमारी मौत से शायद कोई पैकर,

    हमारी कब्र पर अब तक ये बादल अश्क डाले है।