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एक भटकता हुआ आत्म

31 March 2011 4 Comments

पंकज नारायण

कुछ लोग सचमुच `वर्सेटाइल’ होते हैं, महज कहने को ही नहीं। पंकज नारायण उनमें से एक हैं, उनका गद्य भी कविता की ख़ूबसूरती से सना-सजा होता है। पंकज फ़िल्मों से लेकर मंचों तक, पत्रकारिता से लेखन के अनगिनत विहानों तक विचरते हैं। मूलतः बिहार के रहने वाले हैं और फ़िलवक्त दिल्ली में जीवन-बसर, उन्हीं का लिखा हुआ कुछ चौराहा पर, पर इससे पहले भी बारी है उनके आत्मकथ्य की

याद नहीं, पहली बार कब अपने भीतर से ढिशुम-ढिशुम की आवाज़ आई कि तब से लड़ाई कभी थमी नहीं। रोज सोने से पहले खुद को बटोर कर मन के कूड़ेदान में डाल देता हूं और मन खोलकर बैठ जाना तो हर सुबह की चाय जैसी आदत हो गई है। लगता है, मेरे हंसते-खेलते बाहर के भीतर कोई है, जो समाधि में है, जब से मैं जगा हूं। या फिर कोई जगा हुआ मेरी समाधि में है, जिसका मेरी दुनिया से कोई लेना- देना नहीं। सच कहता हूं, तो अपने ही सामने एक बहुत बड़ा झूठ लगता हूं। झूठ बोलता हूं, तो समाधि वाली दो आंखें खट से अचानक खुल जाती हैं। कभी शीशे में भी मैं ‘मैं’ नहीं, एक भटकता हुआ आत्म- चिंतन दिखता हूं। अपने बारे में इतना सोचने वाले को क्या कहेंगे–आत्म-मुग्ध या आत्म-जयी होने के लिए सुरंग खोदने वाला एक आदमी? खैर, कुछ पंक्तियां, जो कविता है भी और नहीं भी। ये पंक्तियां मैंने अपने बारे में लिखी हैं, न आत्म-मुग्ध होकर, न आत्म-जयी होकर…पंकज नारायण

 

रात नींद और सपने…
रात मुझे सोने नहीं देती,
दिन मुझे जगाकर रखता है,
कुछ लोग कहते हैं
मैं नींद में जागता हुआ एक आदमी हूं।

बिना शर्त सपने देखता हूं,
हर शर्त पर उसे पूरा करना चाहता हूं,
कुछ लोग कहते हैं,
मैं नींद में भागता हुआ एक आदमी हूं।

मेरा नींद से पुराना रिश्ता है,
नींद कभी फैल जाती है,
मेरे आकार लेते सपनों पर

सपने कभी लेट जाते हैं
मेरी नींद में
कुछ लोग कहते हैं,
मैं नींद में समाता हुआ एक सपना हूं।

पेंटिंग : Silhouettes by Leonid Afremov

4 Comments »

  • vandana said:

    पंकज,सहज और गहरी कविता…अच्छी लगी
    शुभकामनायें

  • Tripurari Kumar Sharma said:

    hamesha ki tarah… pankaj

  • tejwani girdhar said:

    बहुत प्यारी रचना है

  • aradhana said:

    पंकज शब्दों का जादूगर है.