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आज भारत बंद है!

30 March 2011 One Comment

जब, सबकुछ क्रिकेटमय है, तो चौराहे की चर्चा अछूती, अलग कैसे रहे। अब पीयूष पांडेय का व्यंग्य पढ़िए। पीयूष वरिष्ठ मीडियाकर्मी हैं। आगरा के रहने वाले पीयूष आजतक में लंबे समय तक सेवारत थे।  उनकी पहचान रचनात्मक साइबर पत्रकार के रूप में भी होती है।

 

 

तो लीजिए साहब हिसाब बराबर हो लिया। रविवार को होली पड़ी तो राष्ट्रीय अवकाश मारा गया। लेकिन, बुधवार को बैठे बिठाए राष्ट्रीय अवकाश मिल गया। इस देश में छुट्टी की महिमा अपरंपार है। लोग नए साल के पहले दिन दिलकश, मस्त और झनझनाती तस्वीरों से पटे कैलेंडर पर भी छुट्टियों की संख्या तलाशते हैं। कितनी हैं इस साल? कितनी छुट्टियां संडे की आग में तल गईं? खैर, राष्ट्रीय अवकाशों की अपार महिमा पर निबंध फिर कभी।

आज बात कैलेंडर में अघोषित राष्ट्रीय अवकाश की। यानी भारत-पाकिस्तान के बीच मुकाबले की। चचा ग़ालिब ने भारत-पाकिस्तान के बीच मुकाबले के दिलफाड़ू रोमांच को झेला होता तो दो चार मारु किस्म के शेर कुछ यूं लिखे होते। रनों के लिए दौड़ने-फिरने के हम नहीं कायल/जब पाक ही से न खेला तो फिर खेल क्या है? ग़ालिब का नाम आते ही शायरी का शहद चिपकने लगता है। लेकिन, बात शायरी की नहीं,राष्ट्रीय अवकाश की करनी है।

तो साहब,आज राष्ट्रीय अवकाश है। कैलेंडर से आंख चुरा 30 मार्च को हाईजैक करने वाला राष्ट्रीय अवकाश। छुट्टीबाजों के लिए ऐसे राष्ट्रीय अवकाश जश्न का मौका होते हैं। पर, इस बार तो मामला ऐसा है कि जश्न या मातम कुछ भी हो सकता है। मान लीजिए आपके कुंठित बॉस ने आपको छुट्टी नहीं भी दी, तो क्या वो आपसे काम करा ही लेगा? यानी भौतिक या आत्मिक रुप से राष्ट्रीय अवकाश है ही।

अब मैं अगर अब आपको सलाह दूं कि भइया आप ब्लड प्रेशर के मरीज हैं तो कृपया आज भारत-पाकिस्तान का मैच न देखें तो आप क्या कहेंगे। आप कहेंगे-चुप बे चिरकुट। तो नहीं देता ये सलाह! यूं सभी पतियों की तरह मेरी सलाह मेरी बीवी भी नहीं मानती, लेकिन सलाह देना हर भारतीय का जन्मसिद्ध अधिकार है। और इंडिया-पाक के मुकाबले से ऐन पहले तो इस अधिकार का इस्तेमाल मैं करके रहूंगा।

तो साहब,सलाह के मुरब्बे का रेसिपी कुछ यू है कि आप अपने टेलीविजन का प्राइमरी चैकअप कर लें। टेलीविजन को अगर लोहे के किसी डब्बे से ढंकने की व्यवस्था कर सकें तो यह बहुत ही अच्छा है। फिर, केबल पर आएं। अगर आप मैच के लिए केबल ऑपरेटर के रहम-ओ-करम पर निर्भर हैं तो यकीं जानिए कि आप बड़ा रिस्क ले चुके हैं क्योंकि अब तो सैटटॉप बॉक्स भी इंस्टॉल नहीं हो सकता। बावजूद इसके, आप यूं कर लें कि केबल ऑपरेटर को फोन घुमाकर उसे हड़का दें। भले आपका केबल धांसू टाइप का आ रहा हो। इन दो महत्वपूर्ण कामों को अंजाम देने के बाद आप अपनी सोसाइटी-मुहल्ले या गली में किसी ऐसे बंदे को रस की चाशनी में डूबी एक फोन कर दें,जिसके घर कम से कम 120 सेंटीमीटर का एलसीडी,पावर बैकअप,चाय कॉफी पिलाने और गुटखा लाने के लिए एक दो चेले और हल्ला मचाने पर कोई टोकने वाला न हो। इस तरह की व्यवस्था कर आप एक फूलप्रूफ व्यवस्था कर लेंगे। और यह लगभग तय हो जाएगा कि आप मैच देखेंगे।

तो साहब, मैच की जुगाड़ अपने या अपने मुकाबला मित्र के यहां हो गई। अब, घर पर मैच देख रहे हैं तो कोई बात नहीं। लेकिन, अगर सामूहिक रुप से मैच देखने की कोई योजना सैट की हो तो एक काम और कीजिए। वर्ल्ड कप के पिछले चारों भारत-पाक मैचों का स्कोरकार्ड और टर्निंग प्वाइंट रट लीजिए। अपनी क्रिकेटीय बौद्धिकता छाड़ने के लिए इनकी आपको बहुत आवश्यकता होगी।
भारत देश में रहने के बाद आपसे यह कहना बेकार है कि आप चार-छह गालियां भी सीख लें। इस महान राष्ट्र की मिट्टी में ऐसा तेज है कि यहां खेला-खाया हर बच्चा में मां-बहन के गगनभेदी नारों का ककहरा उसी वक्त सीख लेता है,जब वो एप्पल और बैट के आगे बोलना सीखता है। दूसरे मुल्क के प्रति सम्मान प्रगट करने में आपको इन गगनभेदी नारों की जरुरत पड़ेगी। और सामूहिकता का सौंदर्यबोध तो इन नारों के बिना पूर्ण ही नहीं होता!

तो साहब,अब आप पूरी तरह से मुकाबले में जान लड़ाने के लिए तैयार हैं। हां, बरसते रनों के बीच अंगूर की बेटी का रस भी छन जाए तो बात ही क्या? लेकिन, ऐसा होना आपकी औकात, उबालात और जज्बात पर निर्भर करता है।

वैसे,मैच शुरु होते ही अपने पेट को पराया समझ लें और धकापेल खाएं। इसकी कई वजह हैं। एक, इंडिया के फाइनल में पहुंचने की खुशी में आप इतने टल्ली हो सकते हैं कि फाइनल देखने की जुगाड़ फिर हॉस्पीटल में ही हो। दूसरी-खुदा न खास्ता मैच हार गए तो भी आप इतने ही टल्ली हो सकते हैं। तीसरी, हारने की स्थिति में आपका हार्ट फेल भी हो सकता है। वैसे भी किसी अक्लमंद ने कहा है कि खाने के लिए जीना ही जीना है…बाकी तो सब बेमानी है।

तो साहब….कुछ जरुरी तैयारी कर लीजिए और फिर मस्ती से देखिए आज का मुकाबला! कौन रोकता है आपको इस राष्ट्रीय अवकाश का लुत्फ लेने से।

चित्र साभार : facebook friends

One Comment »

  • नवीन कुमार त्रिपाठी said:

    उम्दा। इस बिन बुलाए राष्ट्रीय अवकाश का लुत्फ लेना ही लेना है। किसी को क्या मालूम था सेमीफाइनल में पड़ोसी पड़ोसी भिड़ जाएंगे। जिसके बहाने कूटनीतिक अमन लाने की कोशिश भी हो रही है। दोनो देशों के दर्शक अपने अपने जज्बे के साथ अभी से ही मैच देखने बैठ गए हैं। जाम तो छलकाना ही है। आमीन