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एक थे बाबा, एक थीं दादी…

29 March 2011 5 Comments

नवीन कुमार त्रिपाठी, जिन्हें हम सब प्यार से तेवारी जी कहकर बुलाते हैं, यूपी के बहराइच ज़िले के रहने वाले हैं। हैदराबाद में ईटीवी की सेवा में कई साल रहे, फ़िलवक्त फोकस टीवी की हिंदी आउटपुट डेस्क में बतौर प्रोड्यूसर कार्यरत हैं। त्रिपाठी जी सजग पत्रकार हैं, इसलिए देश-दुनिया की ख़बरों पर सधी निगाह रखते हैं…इस भागदौड़ और सतर्कता के बीच उनके मन में गांव ज़िंदा है। सीधी-सरल बातचीत करने वाले नवीन के लिए गांव-घर के खूब मायने हैं। वो ठीक ऐसे हैं, जैसे `मोस्ट एलिजिबल बेचलर’ होते हैं, यानी सर्वगुण संपन्न। हालांकि नवीन शादीशुदा हैं और `पिता’ भी। जैसा कि मैंने पहले ही बताया, गांव और कस्बा उनके साथ-साथ चलता है, ऐसे में उन्होंने अपनी जो तस्वीर भेजी, उसमें भी वो `स-घर’ हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चकाचौंध में काम करने वाले इस घरेलू पत्रकार का एक संस्मरण हम भी पढ़ें, जिसमें कटाक्ष भी भरपूर है…अंदर ही अंदर। अगर आप ये सवाल करने वाले हों कि किसी का व्यक्तिगत संस्मरण क्यों पढ़ें, तो इसका विनम्र जवाब मेरे पास यही है–अगर गांव-गोबर-घर की खुशबू महसूस करनी है…तो! : मॉडरेटर

मई 1993

मैं एक तिलक समारोह में शामिल होकर घर लौट रहा था। रास्ते में बाबा के बारे में ख़बर मिली कि अब वे नहीं रहे। आनन-फानन में पापा हम लोगों को लेकर गांव रवाना हुए। बाबा के क्रिया कर्म की जिम्मेदारी बड़े होने के नाते पापा ने उठाई। तेरह दिनों तक तो मुझे कुछ भी एहसास नहीं हुआ। तेरहवीं के बाद सभी मेहमान चले गए। कुछ दिन बाद गांव वाले चाचा घर की ज़मीन के कुछ दस्तावेज लेकर आए और कहने लगे कि बाबा की संपत्ति सभी भाइयों के नाम हो गई है। अचानक मुझे लगा कि अरे ये क्या हो रहा है।

हालांकि ये हक़ीक़त है। हर समाज की, जहां घर का बुजुर्ग सभी को एक सूत्र में बांधकर रखता है। उसके न रहने पर सूत्र बिखर जाता है।मैं देश के उस बुजुर्ग की बात कर रहा हूं, जो हमेशा घर के बाहर खटिया पर पड़े-पड़े पूरे परिवार को चलाने के दिशा-निर्देश देता है। उसकी एक दहाड़ से सभी चुप हो जाते हैं। मेरे बाबा भी कुछ ऐसे ही थे। उनके चारों बेटों की उनके आगे घिग्घी बंधी रहती थी। वे गाली देकर संबोधित करते थे, लेकिन उनके बेटों की क्या मजाल कि चूं तक करें या फिर उनकी बात मानने से इनकार कर दें। जब तक बाबा थे, आस पास के जंवार में हमारे घर की एकता की मिसाल दी जाती थी। उनके न रहने पर सबकुछ बंट गया।

1999

लेकिन दादी अभी ज़िंदा थीं, इसलिए खुलकर कुछ नहीं किया यानी, एक और बुजुर्ग घर को बांधे हुए था। 1999 में दादी के इस दुनिया से विदा होने के बाद चटपट बंटवारा हो गया। ऐसा लगा, जैसे सभी उनके मरने का इंतजार ही कर रहे थे। लेकिन नहीं, ये उनकी बुजुर्गियत और अनुभव की ताक़त थी, जो पूरे घर को बांधकर रखे हुए थी। मृत्यु एक सच है। ये भारतीय संयुक्त परिवार की संरचना है, जहां पूरा घर सबसे वरिष्ठ सदस्य से बंधा होता है। वही फैसले लेता है सबकी सहमति से। वो बूढ़ा/बूढ़ी जब तक ज़िंदा रहते हैं, घर में एक चूल्हा होता है। इसे इज्ज़त से भी जोड़कर देखा जाता है। जिस तरह हमारी महत्वाकांक्षाएं बढ़ती गईं, परिवार एकाकी होने लगे।

वरिष्ठ सदस्य परिवार पर बोझ बनने लगे, क्योंकि वे परिवार की आर्थिक मदद कर पाने में अक्षम हो गए। उनकी सलाहें घरवालों को काटने लगीं। शहरों में ओल्ड एज घरों का चलन बढ़ने लगा।मैं फिर बाबा पर लौटना चाहता हूं। बाबा अनपढ़ थे, लेकिन दुनियादारी आती थी। इसकी बदौलत उन्होंने अपने चार बेटों, एक बेटी को उनकी जिंदगी जीने लायक बनाया। जब तक वो थे, सभी उनकी मर्जी के बिना कोई फैसला नहीं लेते थे। स्कूलों में गर्मी की छुट्टियों में पूरा परिवार गांव जाता था। बाबा के साथ आम की बगिया में दिनभर खेलता रहता था। रात में वे कहानियां सुनाते और उनकी तंबाकू की महक वाले बिस्तर में ऐसी नींद आती कि एक ही करवट में कब सुबह हो जाती, पता ही नहीं चलता।

पहले मिट्टी और खपरैल से बना घर था, एक था। आज उतनी ही ज़मीन में चार पक्के मकान खड़े हैं….महत्वाकांक्षा के। बाबा के समय में एक चूल्हा था। खुद बाबा लकड़ियां लेकर आते थे…आज चार गैस चूल्हे हैं। अब तो बिजली भी आ गई है लेकिन मनके की मोतियां अलग अलग हो गई हैं। जिन्हे पिरोने के लिए बाबा और दादी जैसा रिश्तों का धागा अब नहीं रहा।यदि हम अब भी नहीं सुधरे। बुजुर्गों को सम्मान देना शुरू नहीं करेंगे तो कोई भी घुसपैठिया हम पर हमला कर देगा। बाबा थे तो एक जोड़ी बैल, दो चार भैसों से दुआरा भरा रहता था। मुझे याद है, उनके रहते ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी शादी या दूसरे समारोहों पर अनाज खरीदने की नौबत आई हो। एक खेती थी खूब जमकर पैदावार होती थी। अब चीजें चार हिस्से में बंट गई हैं। घर में खाने के लिए भी अनाज खरीदना पड़ता है। भाइयों के दिल भी अलग-अलग हो गए हैं।

5 Comments »

  • प्रमोद प्रवीण said:

    “पहले मिट्टी और खपरैल से बना घर था, एक था। आज उतनी ही ज़मीन में चार पक्के मकान खड़े हैं….महत्वाकांक्षा के।”
    नवीन जी और चंडीदत्त जी आपदोनों को इस संस्मरणीय लेख के लिए धन्यवाद… इसी महत्वाकांक्षा ने हमारे भीतर के “हम” को मार दिया है और “मैं” की मूरत खड़ी कर दी है.. और वो दिन दूर नहीं जब इसी “मैं” के भीतर की आग भी बुझ जाएगी,,और रह जाएगा सिर्फ राख.. और तब हमारे बच्चे उस राख को गंगा-यमुना में विसर्जित करने की जरुरत भी नहीं समझेंगे,,क्योंकि इसकी शुरुआत और सीख भी उन्हें हमलोग ही दे रहे हैं..नवीन जी ने ये पीड़ा महसूस की है.. इसलिए अभी वक्त है,,संभलने का.. बुजुर्गों के जरिए अपना भविष्य संवारने का..वरना, फिर किसी से गिला मत रखना.. क्योंकि जब भी गिला करना,, पहले सामने आईना रखना…

  • ABHITOSH SINGH said:

    मनके की मोतियां अलग अलग हो गई हैं। जिन्हे पिरोने के लिए बाबा और दादी जैसा रिश्तों का धागा अब नहीं रहा… इन लाइनों ने दिल में आहट दी है कि और सोचने पर मजबूर किया है कि क्या आज की भागदौड़ भरी इस ज़िंदगी में रिश्तों के धागे में इतनी मजबूती है कि वो अपनों को बांधें रखें… बेहतरीन संस्मरण और बेहतरीन सीख… शायद अब भी समय है कि हम अपने बड़े बुजुर्गों की अहमियत समझें और वो सम्मान दें जिसके लिए वो हैं…

  • Yogesh Gulati said:

    “फिर बाबा पर लौटना चाहता हूं। बाबा अनपढ़ थे, लेकिन दुनियादारी आती थी। इसकी बदौलत उन्होंने अपने चार बेटों, एक बेटी को उनकी जिंदगी जीने लायक बनाया।”
    प्रेरणादायक संस्मरण…..नवीन जी ने अपने मन की बात कही है!

  • Yogesh Gulati said:

    फिर बाबा पर लौटना चाहता हूं। बाबा अनपढ़ थे, लेकिन दुनियादारी आती थी। इसकी बदौलत उन्होंने अपने चार बेटों, एक बेटी को उनकी जिंदगी जीने लायक बनाया।
    प्रेरणादायक है!

  • Anil Goel said:

    Just a few tears… what else…