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ठिकाना

28 March 2011 3 Comments


भोलानाथ शुक्ल
ने वीडियो एडिटिंग की पढ़ाई की है। फ़िलहाल, एमए की परीक्षाएं देने में जुटे हैं। कविताएं लिखते हैं और लेख भी। उनकी पहली रचना चौराहा पर। भोलानाथ का ब्लॉग है…  http://bholanathshukla.blogspot.com/

 

दिल जला हो गया बेगाना
खुदी मेरी खुद-ब-खुद गई
भूला राग गाना बजाना
‘ भोले ‘ का भुलावा गया
दिल का छलावा गया,
बुद्धि करती रही बहाना
भूला गाँव – पता – ठिकाना ,
काबिलों के बीच पैठ कैसे हो
मुखालिफ हो जब सारा जमाना ,
बेअक्ल को अक्ल आ नहीं सकती
कबूतरी पंचम राग में कभी गा नहीं सकती ,
काबिलों से कैसे चलेगा बहाना
एक ही बार की हार से
हार क्यों मान ले
क्यों छोड़ दें जोर आजमाना,

बार – बार लगातार
लगे रहने से मिलता…कहां ठिकाना…

 

3 Comments »

  • Shawbhik Palit said:

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है…

  • Mast said:

    Kya likha hai . Vaah kya baat hai .

  • yogesh said:

    bahut achhi kavita….