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पंचायत से संयुक्त राष्ट्र संघ तक पहुंच गई सरपंच

28 March 2011 2 Comments

ताज़ा खबर

राजस्थान के सोडा गांव की युवा सरपंच छवि राजावत जब दुनिया की सबसे बड़ी सभा संयुक्त राष्ट्र संघ में बोलने के लिए खड़ी हुईं, तो पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। 30 वर्षीय छवि ने संयुक्त राष्ट्र 11वीं सूचना-गरीबी विश्व कॉन्फ्रेंस में 24 और 25 मार्च को हिस्सा लिया और दुनियाभर के देशों के वरिष्ठ राजनेताओं व राजदूतों के बीच गरीबी से लड़ने और विकास के तरीके पर विचार व्यक्त किए। रपट थोड़ी पुरानी है, पर बहुत इंट्रेस्टिंग है। इसे ताज़ा ख़बर से जोड़कर पढ़ें। रपट लिखी है सुमन कछावाह ने। उनका परिचय, सबसे नीचे।

 

क्या आप यकीन करेंगे कि आज वह लड़की अपने गांव की सरपंच हैं, जिसने चित्तूर (आंध्र प्रदेश) के ऋषिवैली स्कूल से दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद की पढ़ाई मेयो कॉलेज, अजमेर से की। इसके बाद दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक और फिर पुणे से एमबीए करने के बाद पहली नौकरी टाइम्स ऑफ इंडिया में की….

रोजाना की तरह ऑफिस निकलने से पहले फोन की घंटी बजने लगी। देखा तो छवि का फोन था। उनसे मिलने के लिए जब एक सप्ताह पहले फोन किया तो वह बाहर जाने की तैयारी में व्यस्त थीं। बोली, वापस आकर मिलती हूं। दरअसल तिरुपति सिटी चेंबर की ओर से महिला सशक्तिकरण प्रयासों के लिए छवि राजावत को ‘उगाधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनके घर पहुंचकर बातचीत का जो सिलसिला शुरु हुआ तो ढाई घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला। बातचीत के दौरान उनकी मां हर्ष चौहान भी साथ थीं। गांव की चौपाल पर बैठी किसी महिला सरपंच की आपकी कल्पना से इतर हैं छवि राजावत। टोंक जिले में मालपुरा  का एक छोटा सा गांव है सोडा। इस छोटे और अनजाने से गांव से मात्र ढाई महीने पहले सरपंच बनी छवि राजावत अन्य महिला सरपंचों से कई मायनों में वाकई अलग हैं। जब मुझसे मिलीं तो पहली नजर में मुझे कई संदेह हुए पर धीरे-धीरे बात करते हुए सारी धुंध छंट गई, अपने गांव और गांव की बुनियादी समस्याओं को लेकर जानकारी, समझ और संवेदना तीनों के स्तर पर छवि को बहुत सजग और सक्रिय पाया। चौपाल और ग्राम सभाओं में चटख रंग के पारंपरिक पहनावे लहंगा-ओढऩी पहने बैठी महिला सरपंच की जगह आप पाते हैं- जींस-टॉप पहने आधुनिक पहनावे और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली एक मॉडर्न सरपंच। लेकिन यह पहनावा और भाषा उनके और गांववासियों के बीच संवाद में कभी बाधा नहीं बना।

वह कहती हैं- गांव में होने के बावजूद मेरे पहनावे ने मेरे लिए मुश्किल खड़ी नहीं की क्योंकि मैं इस गांव की बेटी हूं। हां, अगर मैं यहां की बहू होती तो बात कुछ और हो सकती थी तब मुझे अपने कपड़ों पर ध्यान देना पड़ता। उच्च शिक्षित छवि ने एमबीए करने के बाद टाइम्स ऑव इंडिया और एअरटेल जैसी कंपनियों में काम किया। बाद में अपने परिवार के ही होटल व्यवसाय में मां को मदद की। जयपुर में उनका अपना एक हॉर्स राइडिंग स्कूल है जहां वे बच्चों को घुड़सवारी सिखाती हैं। छवि बताती हैं, सरपंच बनने के बाद अब इन सबके लिए समय कम ही मिल पाता है। गांव में होती हूं तो रोजाना सुबह सात बजे से गांव वालों से मुलाकात और तालाब पर खुदाई के कामों के बीच कब समय बीत जाता है, पता ही नहीं चलता।

ख्वाब छोटा सा : पानी की कमी से जूझ रहे गांववासियों को पीने का पानी मुहैया कराना उनकी पहली प्राथमिकता है और इसे दिशा में वे सार्थक प्रयास करती नजर आती हैं। गांव के रीते पड़े तालाब को लेकर परेशान छवि का पहला प्रयास है कि कैसे भी करके मानसून से पहले उसकी खुदाई पूरी करा ली जाए ताकि बारिश का पानी सहेजा जा सके। करीब डेढ़ सौ बीघा में फैला तालाब मिट्टïी भरने की वजह से समतल हो चुका है। हैरानी की बात है कि इसके लिए यह युवा सरपंच फावड़े और पराती लेकर खुद मैदान में उतर आई हैं। उनके हौसले गांव की महिलाओं को प्रेरित करते हैं, वे उनका साथ देने के लिए घर से निकल श्रमदान के लिए आगे आई हैं।

मां हर्ष कंवर बताती हैं, बचपन से ही जुझारु रही है छवि। हम नहीं चाहते थे कि घर में उपलब्ध संभ्रात माहौल छवि को स्पेशल होने का एहसास कराए। हम चाहते थे कि दूसरे आम बच्चों की तरह यह भी साधारण माहौल में ही बड़ी हो। छवि बताती हैं, तालाब की क्षमता काफी ज्यादा है और बारिश से पहले यह काम हो जाए तो दो साल तक न सिर्फ ग्राम सोडा बल्कि आस-पास के गांवों को भी पानी की कभी कमी नहीं होगी। बस इसी लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में प्रयासरत हैं छवि। हमें दुआ करनी चाहिए कि उनका नेक ख्वाब पूरा हो जाए।

कहां से कहां तक : छवि ने चित्तूर (आंध्र प्रदेश) के ऋषिवैली स्कूल से दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद की पढ़ाई मेयो कॉलेज, अजमेर से की। इसके बाद दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक और फिर पुणे से एमबीए करने के बाद पहली नौकरी टाइम्स ऑफ इंडिया में की। शहर के संभ्रांत और अभिजात्य माहौल से गांव तक पहुंचने का छवि का सफर काफी रोमांचक रहा है। वे कहती हैं, गांव से पीढिय़ों का नाता होने के कारण मेरा खास जुड़ाव रहा है। उनके परदादा और फिर दादा यहां के सरपंच रह चुके हैं। अब मैं सरपंच बन गई हूं इसलिए काम के सिलसिले में ज्यादा समय यहीं बीतता है। शहर की आदतें मुझे परेशान नहीं करती। क्योंकि बचपन में चित्तूर में ऐसा माहौल मिला जहां कोई विशेष सुविधाएं नहीं थीं। बर्तन मांजना, झाडू-पोंछा, कपड़े धोना आदि तक सारे काम खुद करने होते थे। आत्मनिर्भर बनने का पहला पाठ वहीं से सीखा, आज भी यदि मुझे टॉयलेट साफ करने को कहें तो मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी।

गांववालों का खास स्नेह है छवि पर, वे उन्हें प्यार से ‘बाई सा कहकर संबोधित करते हैं। इस बार महिला सीट होने की वजह गांव वाले पीछे पड़ गए। उनका विशेष आग्रह था कि मैं सरपंच बनूं। अब मेरा फर्ज बनता है कि उनकी तकलीफों को समझूं और दूर करुं। गांव में पीने के पानी के लिए बना एक तालाब और करीब दस नाडिय़ां हैं लेकिन देखरेख के अभाव की में ये दम तोड़ चुके हैं। हालत यह है कि तालाब के आसपास के मीठे पानी के कुएं भी अब सूख चुके हैं, मजबूरी में लोगों को फ्लोराइडवाला और खारा पानी पीना पड़ रहा है। सीमित संसाधन और आर्थिक समस्याएं सामने हैं। बारिश नजदीक है इसलिए इस समय भी सीमित में 75 बीघा भराव क्षेत्र की ही खुदाई हो पाएगी। काम करने से ही होगा, और प्रयासों में मैं कोई कमी नहीं रखना चाहती।

मंजिलें दूर हैं अभी : पहली बार जब वार्ड सरपंचों की मीटिंग हुई तो सातों महिला वार्ड पंचों की जगह उनके पति आ गए। मैंने पूछा तो कहने लगे हम हैं ना। मैं हैरान हुई फिर उन्हें समझाया कि यहां आपकी नहीं उनकी जरूरत है, जाइए उन्हें भेजिए। शुरू-शुरू में मीटिंग में कई बार देर हो जाने पर उनमें से कई के पति फोन करते थे कि बाईसा मेरी लुगाई को भेजो, खाना बनाना है देर हो रही है। लेकिन अब स्थिति बदल रही है, वे ही लोग कहते सुनाई पड़ते हैं कि घर की चिंता मत करना मैं संभाल लूंगा। मात्र ढाई महीने में गांव की स्थिति और सोच में बदलाव की आहट आ रही है। कहना होगा कि यह युवा सरपंच सही मायनों में अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ाती नजर आ रही हैं।

मरना सभी को है : अगर पता है कि आप कल मरने वाले हो तो कोई भी काम में अपना सौ फीसदी देने की कोशिश करते हैं।  ऐसा जज्बा जिंदगी के हर दिन में होना चाहिए।

मेरी पसंद

हंसाने वाली किताबें,   प्लेटो, शेक्सपीअर का जूलियस सीजर, मैकबैथ, मच एडू अबाउट नथिंग, हैमलेट, द टेमिंग ऑव द शू्र, ऑथेलो, चाल्र्स डिकिन्स, जेन ऑस्टिन आदि के क्लासिक उपन्यास

फिल्में : मासूम, लगान, तारे जमीं पे और कॉमेडी फिल्में

आदर्श इनसान : मेरे नानाजी और मेरे पिता नरेंद्र सिंह राजावत।
दस साल बाद : मैं वर्तमान को जीती हूं।  फिलहाल मेरा लक्ष्य अपने गांव के लिए पेयजल की व्यवस्था करना है।

(सुमन कछावाह। लगभग दशक भर से वे पत्रकारिता में हैं,  जयपुर में रहती हैं,  इन दिनों राजस्थान पत्रिका समूह में काम कर रही हैं। सुमन को आप अपनी प्रतिक्रिया चौराहा के ज़रिए या फिर सीधे sumankachhawa@gmail.com पर मेल भेजकर बता सकते हैं)

2 Comments »

  • Dr. M.S.Shekhawat said:

    very good attempt, keep it up and give such type of directions to the society, wish both of u good luck.

  • astha sharma said:

    wonderful article. many thanks to suman !