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झुग्गी में सरकार आए हैं…

27 March 2011 2 Comments

चौराहा शुरू करने से लेकर अब तक, शायद जीवन-उत्साह के अंत तक ये इरादा कायम रहेगा कि इस मंच पर राजनीति का दखल ना हो। इक्का-दुक्का अपवादों के साथ ये संकल्प मौजूद है।

आज इसमें हम हस्तक्षेप कर रहे हैं जनबात के सदरे आलम की इस टिप्पणी के साथ। मुझे लगता है-इसमें राजनीति नहीं, आक्रोश है। गुस्सा है व्यवस्था की ख़राबी को लेकर। 23 मार्च, 2011 को दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती को तोड़ दिया गया। ऐसा करना जायज था या नहीं, झुग्गीवाले शहर की खूबसूरती पर कितना बड़ा धब्बा हैं…या ये शहर की ज़रूरत हैं…उनकी ज़िंदगी कौड़ियों की भी नहीं है या फिर वो बेशकीमती हैं…इस सबका जवाब ना सदरे दे रहे हैं, ना मैं…। हम सब बस देखा-सुना-समझा हुआ यहां रख रहे हैं। फैसला आपके ही हाथ है।
इसके साथ ही, चौराहे पर जुटने वाले राहगीरों की राय भी आमंत्रित है…इस लेख पर और चौराहा पर इसके प्रकाशन के औचित्य को लेकर : मॉडरेटर

सरकार का गरीबों के साथ नाइंसाफी का एक और वीभत्स रूप सामने आया कि कैसे निर्दयता से झुग्गीवासियों के जीवन पर सत्ता ने बिना बताए गैर कानूनी तरीके से हमला किया है। दिल्ली के बलजीत नगर की पंजाबी बस्ती/गायत्री कालोनी पर 23 मार्च को चार बजे अचानक कहर बरपा। 500 पुलिस फोर्स व बुल्डोजरों के काफिलों ने झुग्गी पर धावा बोला, पहले दिन कुछ झुग्गियों को और दूसरे दिन देखते ही देखते लगभग दो – ढ़ाई हजार के आसपास झुग्गियों को तबाह कर दिया। इस बस्ती में लगभग पांच हजार के आसपास घर थे जिनमें 75 से 80 फीसदी लोग दलित समुदाय के थे। जब डीडीए पुलिस की ताकत के बल पर लोगों की जिंदगीयां उजाड़ने गई तो लोगों ने भयंकर विरोध किया, सत्ता निहत्थों का विरोध कब सुनती है, पुलिस ने लाठी चार्ज किया। बच्चे, बूढ़ों और औरतों पर बेरहम लाठी बरसायी गई।

कचरे में ज़िंदगी जी रहे थे, अब सांस भी पतझड़ हुई

लगभग 35 साल से बसे हुए लोगों को पल भर में बेघर कर दिया।  इस घटना से दिल्ली सरकार का चरित्र तो साफ हो ही गया, साथ ही सरकार की सामाजिक न्याय की नीतियों की भी पोल खुल गई। आरोप ये है कि कुछ पुलिसवाले लड़कियों को घसीटकर पास के जंगल में ले जाने की कोशिश करने लगे, जब लोगों को पता चला तो वो पुलिसवालों से जूझ कर उन लड़कियों को बचाया। यह तथ्य संकेत करता है कि दिल्ली पुलिस की कार्य प्रणाली कितनी गंदी और दुषित हो चूकी है। दरअसल, हर शहर के चरित्र को सरकारें नए रंग में ढाल रही हैं, जिसमें गरीब और दलित शहरों की सेवा तो करें मगर वो शहरों में रहें न। यानी वो ही पुरानी सामंतवादी व्यवस्था को नया चोला पहनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। गांवों में रोजगार को खत्म किया जा रहा है और शहरों में बसने नहीं दिया जाता, आखिर कहां जाये सदियों से दबाये गये लोग ? वहीं भारत के सबसे अकलमंद मंत्री पी. चिदम्बरम ने दिसम्बर 2010 में अन्य राज्यों से दिल्ली आनेवाले मजदूरों के बारे में गैर संवैधानिक बात कही थी, इसी मंत्री ने विकिलीक्स के मुताबिक नॉर्थ और इस्ट भारत को देश की परेशानी के रूप में साम्राज्यवाद के दूत के सामने पेश किया। इसके अलावा, साम्राज्वाद की रक्षा के लिये जनता के हितों की बली देने के क्या सबूत हो सकते हैं।

पुनर्वास नीति के तहत पहले हटाए जाने वाले लोगों को सूचना और निश्चित वक्त दिया जाता ताकि वो अपने रहने का इंतजाम कर सकें, साथ ही उचित पुनर्वास की भी व्यवस्था है मगर इस झुग्गी को अचानक सब कानून ताक पर रखकर क्यों तोड़ा गया ? क्योंकि इस झुग्गी में रहने वाले गरीब हैं और उपर से दलित भी। प्रशासन और सत्ता में बैठे हुए जातिवादी लोगों के दिमाग में यह बात अवश्य मौजूद थी कि दलितों को क्या कानूनी रूप से हटाना। दूसरी ओर यहां के सांसद अजय माकन, विधायक राजेश लिलोटिया और पार्षद भीमसिंह की तरफ से कोई भी आवाज नहीं आई, क्योंकि उजाड़ा गया समुदाय उनके समुदाय से सामाजिक और आर्थिक स्तर पर अलग है। अगर उनके समुदाय के किसी इंसान को कांटा भी चुभ जाता तो वो आसमान सर पर उठा लेते।

जिस दिन झुग्गियों को उजाड़ा गया, उसी दिन बच्चों की परीक्षा थी, हजारों बच्चों की परीक्षाएं छूट गईं, उनके भविष्य के लिए कौन जिम्मेदार है। सवाल ये उठते हैं कि सरकार के इस कदम से जितने सामान टूटने, झुग्गी टूटने, मजदूरी मारे जाने के रूप में जिन गरीब, दलित और मजदूरों का लाखों का नुकसान हुआ है क्या सरकार उनका मुआवजा देगी ? इन झुग्गीवासियों के सम्मान पर जो ठेस पहुंची है सरकार उसकी भरपाई कैसे करेगी ? वो सैकड़ों बच्चे जिनकी परीक्षा चल रही थी क्या अब दोबारा परीक्षा आयोजित की जायेगी और वो अपने टूटे घर के दुख के साथ क्या परीक्षा दे पाएंगे ? जिन सरकारी अधिकारियों ने प्रक्रिया को भूल कर झुग्गियां हटाने की कोशिश की, उनको कौन सा तमगा दिया जाएगा ?

यह सब उसी दिन हो रहा है 23 मार्च 2011, इससे ठीक 80 साल पहले अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने तीन युवकों–भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी दी थी, भगत सिंह ने कहा था -लोगों को आपस में लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत हैं। गरीब मेहनतकश व किसानों कोस्पष्ट समझा देना चाहिए कितुम्हारे असली दुश्मत पूंजीपति हैइसलिए तुम्हें इनके हथकंडों सेबचकर रहना चाहिएऔर इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए

संसार के सभी गरीबों के -चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों-
अधिकार एक ही हैं। भगतसिंह

परिचय : सदरे आलम। छात्र आन्दोलन से निकले, अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूरों एवं झुग्गी बस्तियों के सवालों को सांस्कृतिक माध्यमों से उठाना. 9 साल से ‘जनबात’ के द्वारा जन की बात जन तक पहुंचाने का अनुभव।

2 Comments »

  • शिशिर शुक्ला said:

    बहुत खूब …

  • चण्डीदत्त शुक्ल said:

    शुक्रिया शिशिर।