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तीन कविताएं

26 March 2011 No Comment

जानकी शरण शुक्ल अपने ज़माने में गांव के पहले नौजवान थे, जिन्होंने एमए तक पढ़ाई की थी। बाद में डबल एमए किया, संस्कृत और हिंदी में। लॉ की पढ़ाई की। आर्युवेद में माहिर हैं। आर्युवेद सूचीवेध विशारद जैसी डिग्री भी की, बाद में इलेक्ट्रो होम्योपैथी भी। पशु-पक्षियों से प्यार है और इंसानों से भी। गोंडा के लालबहादुर शास्त्री महाविद्यालय में पुस्तकालयाध्यक्ष के रूप में सबसे लंबी नौकरी की। यूं दिललगाने के बहुत-से बहाने रहे हैं उनके पास। जीवट ज़बर्दस्त है। हंसते हैं तो अभाव डरकर दूर भाग जाता है। फ़िलहाल, सेवानिवृत्ति के बाद परिवार और समाज की सेवा में जुटे हैं। आध्यात्मिकता, संस्कारों के प्रति प्रेम और रूढ़ियों से लड़ते हुए जानकी शरण शुक्ल भरपूर आधुनिक सोच के मालिक हैं। मेरे पिता हैं, इसलिए उनका बहुत लंबा-चौड़ा परिचय बेटे का सहज मोह और प्रेम मान लिया जाएगा, इस डर से बस इतना ही। उनके ब्लॉग त्रिमुहानी से उनकी तीन कविताएं चौराहा के पाठकों के लिए साभार और साधिकार :

उदबोधन

मन के सर में नहाओ
कर दो सपूतों सा कुछ
अग-जग में जिससे
कायर कपूत न कहाओ .

अविराम साधना का जल
धो देगा संचित मल .
बन निर्मल रस धार
बरसाओ – सरसाओ .

रहो मस्त हरदम
चैन की वंशी बजाओ
विषय – रस में धरा क्या है
इस मरुस्थल में हरा क्या है

आवेशित मन को भान नहीं होता
भटके मन का सम्मान नहीं होता ,
जैसे कैसे इसे राह पर लाओ .

यादें

एक वह भी पल था
दूसरा यह भी पल है
न तब कल था
न अब कल है

तब रात का अँधेरा था
अब अँधेरे का घेरा है
कितनी सजीली रातें थी
कैसी लजीली बातें थी

अब तो बस उनकी यादें हैं
जब भी फुहार पड़ती है
जब भी अँधेरा घिरता है
बिजली व्योम में चमकती है
यादें बलात आ ही जाती हैं
केवल – केवल सताती हैं .

वे दिन
न जाने कब बीत गए
रीते-सुभीते वे दिन ,
छोड़ चित्र अनगिन .
सुधा भरे पीन घट से
सिंचित यौवन पल छिन ,
अधमुंदी अधखुली
पलकों के पीछे-पीछे
उठती गिरती अलकें अनुछिन ,
अधर रस टपकाती रही
नयनों को इधर – उधर
बस यों ही नचाती रही
प्रियजनों को बार – बार
संकेतों से सताती रही
प्रतिपल अनुदिन …

अनायास ही शलभ सब
जल गए उसी आग में ,
मानो किंशुक रचित रंग से
रंगती रंगाती फाग में …

चाह करना तो चलाऊ
आह करना असभ्यता ,
गाती रही निजी राग में
नवयुग की भव्यता ,
सच को सच कहना
कहाँ की सभ्यता
घोर उद्दंडता असहनीय अभद्रता…

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