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और एक ब्लॉग–त्रिमुहानी

17 March 2011 2 Comments

 

जानकी शरण शुक्ल

जन्मा हूँ
उसी तट पर

खेला पला बढ़ा हूँ ,
उसके ही जल में

गोते खाकर सीखा हूँ ,
उसके ही कूल पर
बैठ-बैठ पढ़ा हूँ
उसी का हूँ
जैसा भी गढा अनगढ़ा हूँ ,
लहरों की थाप सुहानी

टेढ़ी का अमृतमय पानी
घरघर संगम के कारण
बना घाट तिरमुहानी

आसपास फूलते पलाश
झुरमुट में फुदगती
रूपसी सी गौरैया सयानी ,
अनगिनत दृश्य मन हरते
नयन मूंदने पर भी
पटल से नहीं हटते
पल – प्रतिपल करते

अठखेलियाँ चतुर्दिक
सोने पर भी आते रहते
सपने अनगिन लासानी ,
वंदनीया जननी सम

जन्मभूमि दिव्यानी
मेरे रग रग में बहती
लहू बन त्रिपथगा तिरमुहानी
सुधाधार सम कल्याणी


लेखक विचारवान साहित्यकार हैं। गोंडा, उप्र में लालबहादुर   शास्त्री महाविद्यालय में पुस्तकालयाध्यक्ष रहे। अब  सेवानिवृत्ति के बाद साहित्य और परिवार सेवा कर रहे हैं। नया-नया ब्लॉग बनाया है…त्रिमुहानी http://tirmuhani.blogspot.com/

2 Comments »

  • bhola nath shukla said:

    aapki rachnaayen bahut hi sundar hain pitaji

  • dushyant said:

    jiski rachna itnee sundar wo kitna sundar hogaa!
    bahut khoob! jindgee se bharpoor!