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न कोई दोज़ख, न कोई जन्नत…

25 March 2011 2 Comments

बेचैन सुबहों, अर्थहीन दोपहरियों और थकी हुई सांझों के बीच खुद के होने और बिखरते जाने के अंतराल में हंसी-खुशी बांटने की ख्वाहिशों और पपड़ाए सपनों की किरचें ढोने के अजब-से प्रतीक अभिषेक गोस्वामी की कविता में मिलते हैं। उनसे फेसबुक पर मिला था, रूबरू अब तक नहीं हुआ। पता नहीं, कभी मिलेंगे या नहीं, लेकिन अब तो बातों, ख़यालों और अहसासों में हर उस पल मुलाक़ात होती-सी दिखती है, जब भी तनहाई और अर्थहीनता का आलम जेहन को घेर लेता है। चौराहा के पाठकों के लिए जयपुर के अभिषेक गोस्वामी की कविता पेश है, इस नोट के साथ कि…कुछ लोग रंगकर्म को महज तमाशा और तमाशबीनी से जोड़ते हैं, वो जान लें कि अभिषेक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की टाई कंपनी में शामिल और सक्रिय रहे हैं। वो दर्शकों को प्रभावित करते हैं, क्योंकि उन्हें लिखने-पढ़ने में गहन रुचि है, वैसी ही–जैसी ज़िंदगी जीने के लिए किए जाने वाले बाकी कामों में…या शायद उससे भी ज्यादा।

न कोई दोज़ख
न कोई जन्नत
न कोई पीछे पैदा हुआ हममें से
न कोई आगे पैदा होगा
हम सब मिले हैं किसी
अनजान टापू पर

उगता है चमकता है सूरज
तेरी रूह के भीतर
मुझे भी महसूस होता है
ढल जाएगा शाम होते होते
थक जाएगा

फिर छाएगी तारों से भरी
ठंडी नीली रात
और हम सब सो जाएंगे
के दूजे का सिराहना बनकर

फिर सुबह होगी
हम निकल पड़ेंगे
इस जगह के लिए
कोई अर्थपूर्ण नाम खोजने
की कोशिश में
सुनाई देगा तब दिन भर
कलम, फावड़ों और हसियों
का कोरस

लौटेंगी जब पंछियों की कतारें
अपने घरों को फिर शाम होगी
जला अलाव अपनी थकन का
हम सब बैठेंगे एक घेरे में
और बाँट लेंगे अपनी-अपनी
आपबीती हंसी ख़ुशी
और नाम देंगे इस जगह को

न कोई जन्नत
न कोई दोज़ख

हम सब मिले हैं
किसी अनजान टापू पर…

2 Comments »

  • Tripurari Kumar Sharma said:

    निर्मल वर्मा ने लिखा है…

    “अगर रचना को पढ़ते समय रचनाकार का नाम भूल जायें तो यह उस रचनाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है…”

    इस रचना से गुज़रते हुए भी कुछ ऐसा ही म्हसूस हुआ…

    “न कोई जन्नत
    न कोई दोज़ख

    हम सब मिले हैं
    किसी अंजान टापू पर…”

  • सुशीला पूरी said:

    ”बाँट लेंगे अपनी अपनी आप बीती खुशी ”…… बहुत सुंदर !!!