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बिन पानी सब सून…और निजीकरण का जिन्न

25 March 2011 One Comment

– संदीप कुमार मील

दिल्ली सरकार द्वारा जल बोर्ड में निजीकरण की शुरुआत ने दिल्ली की जल व्यवस्था पर बहुत से सवाल खड़े कर दिए। अभी ये निजीकरण घरों में मीटर लगाने और दक्षिण दिल्ली में बिल भेजने के कार्य से शुरू हुआ है और इसका सबसे पहला प्रभाव रोजगार पर पड़ने वाला है, क्योंकि आने वाले समय में सरकार पिछले दरवाजे से जल संयत्रों में भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को घुसाने की फिराक में है। इनकी वजह से हजारों लोगों की जीविका प्रभावित हो सकती है। इन कंपनियों की मुनाफा नीति से सबसे ज्यादा प्रभावित मध्यवर्ग और मजदूर तबका होगा, क्योंकि जैसे बिजली का निजीकरण हुआ और लोगों को समय से बिजली मिलने लगी, लेकिन बिजली बिल आसमान छूने लगे, वैसे ही पानी का निजीकरण होते ही पानी भी उपलब्ध होने लगेगा, लेकिन पानी बिल दिल्ली की जनता के बजट को प्रभावित करेगा। इसका मतलब यह है कि पानी की कमी नहीं है, लेकिन सरकार जनता की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी मुनाफा कमाकर ही करेगी।
पानी की पर्याप्तता के बाद भी सरकारी तंत्र की अव्यवस्था व उचित प्रबंधन के अभाव के कारण ठीक से सप्लाई नहीं हो पाती है। पाइप लाइनों की उचित व्यवस्था व रखरखाव के अभाव में दिल्ली, मुम्बई और चेन्नई जैसे महानगरों में 14 से 44 प्रतिशत पानी जल पाइपों से रिस जाता है। 2008 में 500 करोड़ रुपए पानी टैंकरों पर खर्च किये गये लेकिन लगभग 100 कॉलोनियों में अब भी पानी कनेक्शन नहीं है। यह पानी टैंकर जरूरत की जगह पहुंचने की बजाय किसी कारखाने को अवैध रूप से पानी बेच देते है। एक टैंकर साल में लगभग 6 लाख रुपए का मुनाफा कमाता है, जिसमें से ज्यादातर पैसा अवैध पानी बिक्री का होता है। जब पानी की पूरी व्यवस्था निजी हाथों में दे दी जायेगी तो जाहिर है कि निजी कम्पनियां पानी तो पैदा करेंगी नहीं, केवल व्यवस्थित रूप से उस पानी का वितरण करेंगी और इसी के बदले में मुनाफा कमाने लिए आम जनता से महंगा बिल वसूल लेंगी।
पानी जीवन का अहम हिस्सा है, जिसको लोग जीवन से अलग नहीं कर सकते, लिहाजा इस अतिरिक्त खर्च का असर उनके जीवन स्तर में किसी अन्य मद में कटौती के रूप में भुगतना पड़ेगा। एक उदाहरण के रूप में देख सकते हैं कि टैंकरों पर लिखा होता है- ‘बूंद बूंद पानी बचावो।‘ और उसी टैंकर में लीकेज के कारण पानी की नाली सड़क पर बहती रहती है।
यह हालत तब है, जबकि सरकार के पास जल बोर्ड जैसा पूरा तंत्र है, जिसके माध्यम से व्यवस्थित रूप से पूरी दिल्ली में पानी सप्लाई किया जा सकता है। आज सवाल केवल प्राकृतिक संसाधनों की कमी का नहीं है, अहम मुद्दा उनके उचित प्रबंधन और आवंटन का है, जिसे निजीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से हल नहीं किया जा सकता है।
दिल्ली में देखा जाए, तो सबसे ज्यादा पानी की समस्या का सामना झुग्गी बस्तियों और पुनर्वास कॉलोनियों के लोगों द्वारा किया जाता है, क्योंकि इनके हिस्से का पानी पैसा लेकर पानी माफिया किसी कारखाने या होटल वगैरह में पहुंचा देते है। पानी को लेकर होने वाला भ्रष्टाचार पूरी दिल्ली में फैला हुआ है, 500 रुपए लेकर एक घर में पानी का पूरा टैंकर पहुंचा दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ एक बस्ती पानी के लिये त्राहि-त्राहि करती रहती है। और पानी की समस्या से ज्यादातर महिलाएं प्रभावित होती हैं, क्योकि पानी भरने का काम तो समाज में उन्हीं के द्वारा किया जाता है, ऐसी स्थिति में पानी भरने के स्थान पर उनके साथ अभद्र व्यवहार जैसे मामले भी सामने आते हैं। धीरे-धीरे पानी के निजीकरण से समस्या का हल होने की बजाय और विकराल रूप सामने आ रहा है।
अगर सरकार दिल्ली जल बोर्ड की कार्यप्रणाली में सुधार करे और पानी के अपव्यय को रोककर उसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाए तो इससे लोगों को सस्ती दरों पर पानी भी उपलब्ध हो जाएगा और रोजगार के अवसर भी बने रहेंगे। हालांकि निजीकरण की जनविरोधी नीतियों के कारण मुनाफा कमाने के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं, उनके दुष्प्रभाव आने वाले समय में राजधानी में दिखाई दे सकते है। गर्मियों के मौसम में निजी कंपनियों को जल संयत्र दे दिए जाएंगे तो स्थिति भयावह हो सकती है।
दिल्ली की कुल 1.75 करोड़ की आबादी को रोजाना 90 करोड़ गैलन पानी की जरूरत होती है और उस जरूरत को निजीकरण से नहीं, एक ठोस जल नीति बनाकर पूरा किया जा सकता है। इसमें पानी के अपव्यय को रोककर उसके उपयोग का समुचित प्रबंध हो, इसमें यमुना नदी की सुरक्षा हो। जल संरक्षण के तमाम उपाय अपनाए जाने की जरूरत है। अनुभव साफ बताता है कि जहां पर पानी का निजीकरण किया गया है वहां पर भी जल संकट दूर होने की बजाय बढ़ा है। सरकार अपने तंत्र की असफलता छुपाने के लिए निजीकरण का सहारा लेकर लोक कल्याण को नज़रअंदाज कर रही है।

ये आलेख लिखा है संदीप कुमार मील ने। राजस्थान में जन्मे, दिल्ली में रहते हैं। कहानियां, कविताएं, लेख–सबकुछ लिखते हैं। पढ़ने-लिखने में रुझान है। स्वाभिमानी हैं, लेकिन अहंकारी नहीं हैं। चौराहा पर आप उनकी कुछ और रचनाएं भी पढ़ सकते हैं।

One Comment »

  • आभा एम said:

    आदरणीय संदीप जी
    बहुत सुंदर लेख है.. लेकिन सिर्फ सरकार की ही आलोचना है… जनता की जिम्मेदारी कहां है…हम जो नल से पानी बहाते रहते हैं…उसका क्या