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एक नज्म सा कुछ…

25 March 2011 12 Comments

जरूरी आत्मकथ्य- ”बार बार दिल को समझाने की कोशिश की है कि मियां कितना भी कर लो, बडे मियां दुष्यंत कुमार की गजलगोई से आगे जाके उन्हीं के नाम से उन्ही की विधा में नाम नहीं पैदा कर सकते ..पर क्या करें मन है कि फिर फिर लौटता है ..फिर गजल या नज्म सा कुछ कहने की इस गुस्ताखी को अमल देने के लिए इक खयाल आता है कि चलो! वे बीसवी सदी के दुष्यंत थे, मैं इक्कीसवी सदी का दुष्यंत हूं ” – dr.dushyant@gmail.com


# दुष्यंत

आ ही गए हो तो कुछ देर जरा ठहरो
जिस्म में लरजिश हो
और रूह सुर्खरू हो
मेरे वजूद का एक एक कतरा
तेरे वजूद से रूबरू हो
ठहर जाओ कि जिंदगी चले
और वक्त ठहर के तारीख बन जाए
मौसम बदलने को है
नई रूतें आई हैं अबके
लबों पे जुबान फेरती है हवा
गए मौसम लौटेंगे जब
वक्त की किसी टहनी पे खिलेगे
हमारे साथ के फूल

आओ के ठहर जाओ कुछ देर मेरे हमनवा
आ ही गए हो तो कुछ देर जरा ठहरो

आप अगर नहीं आते तो कोई बात नहीं थी
रात तो बेशक रात थी मगर वो रात नहीं थी
एक रात का उलाहना है बाकी
एक वादे का निभाना है बाकी
आ ही गए हो तो
आके जरा दिल से लगा लो कुछ लम्हे ही सही
उन लम्हो को मगर इतनी सी मोहलत तो देना
कि लम्हों की सलीब पर मुहब्बत ना रहे
आ ही गए हो तो इतनी सी इनायत कर देना
चुपके से सहला के शिकायत कर लेना
मेरी शिकायत कुछ भी नहीं
और तेरी शिकायत वाजिब है
ठहर के चलना मुश्किल है मगर
ठहर ठहर के चलना ही तो हासिल है
कि कुछ देर ठहरने में तुम्हारा जाता क्या है
आ ही गए हो तो कुछ देर जरा ठहरो

आंखें खोले हुए, बिना एनेस्थेसिया के ओपेन हार्ट सर्जरी करानी हो, तो दुष्यंत को पढ़िए…पेशे से ख़बरनवीस हैं, जयपुर के एक अखबार के संडे सप्लिमेंट इंचार्ज हैं, लेकिन फ़ितरतन शायर, आर्टिस्ट हैं।

कलाकृति आभार: Leonardo Ruggieri

12 Comments »

  • Tripurari Kumar Sharma said:

    कुछ देर ज़रा ठहरो…

  • aaradhna solanki said:

    lovely. touchy poems,congrats dushyant ji.

  • mohan thanvi said:

    ठहर जाओ कि जिन्दगी चले…लम्हों को सदियों का जामा…दिल छू गई आपकी ये…अनवरत चलती जिन्दगी…दिल में उतर गई…ये जिन्दगी…गए मौसम लौटेंगे जब…वक्त की किसी टहनी पे खिलेगे…हमारे साथ के फूल…

  • prithvi said:

    आ ही गए हो तो कुछ देर जरा ठहरो…(:

  • vivekanand jha said:

    bejod!

  • Dileep Nagpal said:

    आप अगर नहीं आते तो कोई बात नहीं थी
    रात तो बेशक रात थी मगर वो रात नहीं थी
    एक रात का उलाहना है बाकी
    एक वादे का निभाना है बाकी
    आ ही गए हो तो…

    Ye Hamaare Dushyant Jee Ka Kamaal Hai Ki Sab Thaher Gaye…

  • ish madhu talwar said:

    वाह….! दुष्यंत का ताज़ा दूध के झाग की तरह उफनते शब्दों का अपना नया अंदाज़….पुरानी मधुर पंक्तियाँ भी ताज़ा हो गयीं….तुम ही सोचो ज़रा क्यूँ न रोकें तुम्हें , जान जाती है जब उठके जाते हो तुम…!

  • dushyant said:

    shukriya tripurari ji, aaradhna ji, mohan ji, prithvi ji, vivekanandji,dileep, and talwar sir!
    and BIG thanks to chauraha, of course!

  • शिशिर शुक्ला said:

    वाह-वाह

  • suman singh said:

    ”कि कुछ देर ठहरने में तुम्हारा जाता क्या है
    आ ही गए हो तो कुछ देर जरा ठहरो…..”

    ”और जो आके….जाने का ही दिल न करे……….तो कोई क्या करे…….

    ये भी तो कहिये……..

  • aparajita krishna said:

    apni kavitayon se ru-b-ru karane ke liye shukriya. aapki site par theharne ke liye web invitees aur gate-crashers dono ki lambi line lagegi. bahut achchi baat-cheet karti hain aapki kavitayen.

  • dushyant said:

    bahut bahut shukriya shishir ji, suman ji,aprajita madam!