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शनि की दशा

25 March 2011 No Comment

कथा और कटाक्ष का भरपूर मेल पेश करती संदीप कुमार मील की ये लघुकथा…

मुकुल स्टेशन से बाहर निकलकर रिक्शा लेने की सोच रहा था कि अचानक पीछे से एक ज्योतिषी ने हाथ पकड़ लिया। मुकुल दिल्ली पहली बार आया था, इसलिए पहले से ही डर रहा था कि पता नहीं वहां कैसे लोग हों। जब तक खुद को संभाल पाता, ज्योतिषी बोला, ‘बेटा ! तेरे पर तो शनि की दशा है, जीवन में कभी सफल नहीं हो पाएगा।’ मुकुल का भविष्यदृष्टाओं में कोई विश्वास नहीं था, वो हर सफलता के पीछे मेहनत को महत्वपूर्ण मानता था, इसलिए गांव का पहला छात्र है, जो इंजीनियरिंग करने दिल्ली आया है। मगर ज्योतिषी से पीछा छुड़ाने के लिए बोला, ‘बाबा, शनि की दशा उतारने का कोई तरीका भी है क्या?’
बाबा तो सुबह से लेकर शाम तक इसी फिराक में रहते हैं कि कोई आए, जिसकी शनि की दशा उतारकर खुद के भविष्य के लिए भोजन की व्यवस्था करें, क्योंकि जीवन में मेहनत से नाता जो तोड़ लिया है। इसी फिराक में बाबा ने कहा, ‘तुम्हारी जेब में 500 रुपए हैं, तो उतार दूंगा।’ मुकुल वैसे इन बाबाओं के चरित्र से वाकिफ था कि ये चाहे दिल्ली की सड़क पर खड़े हो या फिर रामगढ़ की पर उनका मानसिक स्तर एक ही होता है। ‘नहीं’ उसने सपाट सा जवाब दे दिया।
‘कोई बात नहीं बेटा, हम शनि महाराज को राजी कर लेंगे, 100 रुपए दे दो’-बाबा वार खाली नहीं जाने देना चाहता था।
‘नहीं है बाबा मेरे पास’ मुकुल बाबा की असली मंशा समझ गया था।
‘50 रुपए तो होंगे, वो दे दो’, अब बाबा अपनी औकात में आ गया था।
‘ नहीं है बाबा। मैं गांव से आया हूं, घरवालों ने सिर्फ किराया दिया, जो रस्ते में लग गया’, मुकुल को अब आत्मविश्वास आ गया था।
बाबा एक आदमी के पीछे इतना समय बरबाद नहीं करना चाहता था, सो बोला, ‘कितने पैसे हैं तुम्हारे पास ?’
‘5 रुपए हैं बाबा’, मुकुल को मन ही मन में हंसी आ रही थी।
बाबा ने झटके से मुकुल का हाथ छोड़कर कहा, ‘जा बेटा ! तेरा शनि भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।’

(संदीप कुमार मील, राजस्थान के रहने वाले हैं. पढ़ाई-लिखाई, कामकाज के सिलसिले में दिल्ली निवास है। अच्छा लिखते-पढ़ते-सोचते हैं।)

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