Home » चर्चा में किताब, दिल के झरोखे से..., साहित्य-सिनेमा-जीवन, है कुछ खास...पहला पन्ना

`मैं सुनी, मैं समझ गई, लेकिन इग्नोर कर दिया’

16 October 2017 No Comment

दैनिक भास्कर में प्रकाशित, कॉपीराइट प्रोटेक्टेड

हेमा मालिनी के जन्मदिन (16 अक्टूबर) पर विशेष

धर्मेंद्र पंजाबी में कमेंट पास करते हुए निकले, हेमा मालिनी ने बताया

`मैं सुनी, मैं समझ गई, लेकिन इग्नोर कर दिया’

हेमा मालिनी आज 69वां जन्मदिन मना रही हैं। आज ही भारतीय सिनेमा में उनके 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर एक किताब `बियॉन्ड द ड्रीमगर्ल’ लॉन्च की जा रही है। इसके लेखक राम कमल से चण्डीदत्त शुक्ल ने बातचीत की :

1967 की बात है। `सपनों का सौदागर’ फिल्म की शूटिंग चल रही थी। ब्रेक टाइम में फिल्म की हीरोइन हेमा मालिनी राहत की सांस ले रही थीं। तभी पास से गुजरते हुए गबरू जवान धर्मेंद्र ने दोस्त शशि कपूर से पंजाबी में कुछ कहा। तमिलियन हेमा मालिनी कुछ अरसा पहले ही मद्रास से आई थीं, पर वे समझ गईं कि धर्मेंद्र उन पर छींटाकशी कर रहे हैं। हेमा बताती हैं, `मैं सुनी, मैं समझ गई, लेकिन इग्नोर कर दिया।’ बात ये है कि हेमा बचपन में दिल्ली में रह चुकी थीं। उन्हें हिंदी अच्छी तरह समझ में आती थी और पंजाबी तो उससे भी ज्यादा! हेमा की ज़िंदगी में बहुत-से मोड़ आए हैं। दिलचस्प और डरा देने वाले भी। जब वे पहली बार जुहू के बंगले में शिफ्ट हुईं तो अक्सर रात में अजीब सी हलचल दिखाई देती। धीरे-धीरे लोग उसे भूत बंगला कहने लगे, लेकिन हेमा मालिनी को यकीन था कि भूत जैसी किसी चीज का वजूद नहीं होता।
सफलता-असफलता के उतार-चढ़ाव से जूझते हुए हेमा मालिनी ने भारतीय सिनेमा में पांच दशक पूरे कर लिए हैं, लेकिन वे न रुकी हैं, न थकी हैं। लगातार कुछ न कुछ नया कर लोगों को अचरज में डालती जा रही हैं। हाल में ही वे सिंगर भी बन गई हैं। उन्होंने लक्ष्मी स्तुति `सौंदर्य लहरी’ रिकॉर्ड की। बाबुल सुप्रियो के साथ एक म्यूज़िक वीडियो तैयार किया। `गोपाला को समर्पण’ शीर्षक से आठ गीतों का एलबम निकाला। राजन – साजन मिश्र, शंकर महादेवन और हरि प्रसाद चौरसिया की कंपोजिशन गाई। हेमा मालिनी ने जीवन के उस पड़ाव पर गायकी की ट्रेनिंग हासिल की है, जब लोग रिटायरमेंट ले लेते हैं।

हेमा नहीं चाहती थीं कि उन पर किताब लिखी जाए, बोलीं – `मैंने कुछ खास किया ही नहीं है : राम कमल

हेमा मालिनी जैसी हस्ती को शब्दों और तसवीरों में समेटा नहीं जा सकता। हां, अनदेखे-अनूठे चित्रों और घटनाओं के बयान के ज़रिए `ट्रिब्यूट’ देने की कोशिश जरूर की जा सकती है। 2005 में हेमा जी पर आधारित, 1500 रुपए कीमत की कॉफी टेबल बुक `दीवा अनवील्ड’ की 10 हजार कॉपी छपी थी। बाद में लगा कि मेहनत क्यों जाया होने दें और एक कंप्लीट किताब बनाएं। बीते 12 वर्षों मेें हेमा जी की ज़िंदगी में जो बदलाव आए हैं, उन्हें नई किताब में दर्ज करने की कोशिश की गई है। `बागबान’ हेमा जी की अहम फिल्म थी। इसके बाद वे पूरी तरह से पॉलिटिक्स में एक्टिव हो गईं। राज्यसभा से लोकसभा पहुंचीं। चुनाव लड़कर मथुरा से सांसद बनीं। नए बैले लॉन्च किए। आगरा में हुए भयंकर हादसे को भी हेमा कभी भुला नहीं सकेंगी। चूंकि वे सेलिब्रिटी हैं, इसलिए गुलाब के साथ हर बार कांटे भी उन्हें उपहार में मिलते हैं। हमने हेमा जी को किताब की प्लानिंग के बारे में बताया तो उन्होंने मना करते हुए कहा – मैंने जीवन में अब तक ऐसा कुछ खास किया ही नहीं है कि मुझ पर पुस्तक लिखी जा सके।’ हालांकि उनके हां कहने के बाद आहाना ने भी पहली बार इंटरव्यू दिया। ये किताब अगले साल हिंदी और बांग्ला में भी लाई जाएगी।

 

Comments are closed.