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`बीते वो दिन याद आए रे!’

16 April 2015 No Comment

दैनिक भास्कर के रसरंग में प्रकाशित। कॉपीराइट प्रोटेक्टेड।

याद गली से : शमशाद बेगम

बरसों-बरस शोहरत की बुलंदी देखी, कई साल गुमनाम रहीं, लेकिन कुछ तो बात है कि अपने जमाने की मशहूर सिंगर शमशाद बेगम के गले की खनक कभी पुरानी नहीं पड़ी। 1919 में अप्रैल की 14 तारीख को अमृतसर में पैदा हुईं और साल 2013 में 23 अप्रैल को 94 साल की शमशाद बेगम ने पवई (मुंबई) स्थित घर से अलविदा कह दिया। इसी आवाज़ के साथ-साथ यादों की गली में चलते हैं दो-चार कदम :
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– चण्डीदत्त शुक्ल

एक दिन फोन आया — `हैलो, मैं रंगून से बोल रहा हूं। मैं अपनी बीवी रेणुका देवी से बात करना चाहता हूं… हां…हां’! बीवी रेणुका भी तान देने लगीं — `मेरे पिया गए रंगून, किया है वहां से टेलीफून, तुम्हारी याद सताती है’! बर्मा की गलियों से आया टेलीफोन देहरादून में सुनते हुए रेणुका के चेहरे पर ऐसा कोई भाव नहीं था, जिससे लगे कि वे आकुल हैं, व्याकुल हैं, न उनकी आवाज़ (जो दरअसल, शमशाद बेगम की है) में कोई तड़प थी। नहीं, हम ये नहीं कह रहे कि फिल्म `पतंगा’ में शमशाद के सुर, बोल के साथ इंसाफ नहीं करते। बेगम सिचुएशन के साथ पूरी तरह न्याय कर रही हैं, क्योंकि यहां नायिका को विरह कम सता रहा है, `प्राउड’ ज्यादा है। इस बात का नखरा है कि संगी-सहेलियां, साथवालियां मुल्क में टिकी हैं, उनके पति मोहल्ले-कस्बे में रोजी-रोटी जुगाड़ रहे हैं, जबकि रेणुका के शौहर तो पैसा कमाने रंगून गए हैं। और वे दोनों `टेलीफून’ पे बात कर रहे हैं, जो दुर्लभ है, सबके नसीब में नहीं होता!

तो यही हैं शमशाद बेगम, जिनकी मचलती सुर लहरी उठती है तो दिल में अलग सा उफान ले आती है। चहकना चाहें तो आवाज़ साथ-साथ चहकने लगती है — `एक दो तीन, आ जा मौसम है रंगीन’! याद कीजिए, `आवारा’ का नग्मा! राजकपूर खोए-खोए से हैं, भोले-भाले, कॉमनमैन के प्रचलित-अभ्यस्त किरदार में। रॉकेट जैसी रफ्तार के साथ एक युवती नृत्य कर रही है। नाचघर में शोर-शराबा है, लेकिन हर कलाकार, माहौल और शोर से आगे एक आवाज़ छा जाती है… `ये मदमस्त जवानी है, तेरे लिए ही दीवानी है…’ हो-हल्ले में भी नहीं दबती। शमशाद के सुर महीन, पतले और स्त्रियोचित कमनीयता वाले नहीं हैं, उनमें कुछ मोटाई है, हल्का सा खुरदुरापन है, पर वो चुभता नहीं… दम लगाकर सहला जाता है।

आज भी ताज़ा, कशिश से भरपूर, ज़िंदादिली से भरपूर लगती है यही आवाज़। ऐसा यूं ही नहीं है कि रि-मिक्स बनाने वालों की पहली पसंद उनके गाने हैं। हर बंधन से मुक्त, पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी के ऐन बगल से धरती की ओर झरती – झरने की चाल, फिर भी आसमान को छू लेने वाली, पुरुष गायकों की तान को मात देती, कुछ कुरेदती, लंबी और मीठी एकसाथ जो आवाज़ है, उसका ये असर है।

जादू दस-बीस साल पुराना नहीं है। कितना पुराना है, ये समझने के लिए कई किस्से पढ़ने होंगे। कोई मशहूर होता है तो उसके बारे में अलग-अलग किस्से मशहूर हो जाते हैं। एक ब्योरा ये है कि शमशाद घर में एक पुराने ग्रामोफोन पर गाने सुनती थीं और वहीं से संगीत से प्रेम हुआ। एक चाचा को उनकी प्रतिभा पर यकीन था तो वे रिकॉर्डिंग कंपनी तक लेकर गए, जहां 1932 में `हथ जोड़ा पंखिया दा’ गीत गाने के एवज में 12 रुपए, 50 पैसे फीस मिली। इसके बाद वे रेडियो स्टेशन तक पहुंची और आखिरकार, आठ साल बाद, 1940 में दलसुख पंचोली की पंजाबी फिल्म `यमला जट’ फिल्म से प्ले बैक सिंगर बनीं। (मशहूर विलेन प्राण ने पंचोली फिल्म्स की इसी पिक्चर से अपना एक्टिंग करिअर शुरू किया था।)

दूसरे संदर्भ के मुताबिक, 1947 में पेशावर रेडियो पर पहली बार (16 दिसंबर को) शमशाद की तान गूंजी और मुहावरे की ज़ुबान में कहें तो – `दिल-ओ-दिमाग पर छा गई’। म्यूज़िक कंपनी जेनोफ़ोन ने उन्हें साइन कर लिया! उन दिनों हर गाने के लिए शमशाद को 15 रुपए मिलते थे और जब कंपनी के साथ एग्रीमेंट पूरा हुआ तो पूरे 5 हजार रुपए दिए गए। नात गाने के लिए मशहूर, क्लास की हेड सिंगर बन चुकी शमशाद को हर शादी, सगाई के मौके पे सदा दी जाती और वे बेहिचक नग्मों की बौछार करने पहुंच जातीं। सारंगी के सुल्तान कहे गए उस्ताद हुसैन बख्शवाले ने शागिर्द बनाया, हुनर बख्शा और फिर तो शमशाद के कदम कभी न थमे। महबूब खान की `तकदीर’ के गीत पसंद किए गए। इसके बाद रफीक गजनवी, पंडित गोबिंदराम, अमीर अली, राशिद अत्रे, पंडित अमरनाथ, बुलो सी रानी, एम.ए. मुख्तार जैसे कई संगीतकारों ने भी शमशाद को माइक के पीछे आने की दावत दी।

बेहद कम उम्र में इश्क हुआ और उन्होंने गणपत लाल बट्टो से शादी कर ली। हालांकि साथ देर तक कायम न रहा और 1955 में बट्टो ने शमशाद और दुनिया से हाथ छुड़ा लिया। मोहब्बत के मामले में तो शमशाद ने अपने मन की ही सुनी, लेकिन गाने की दुनिया में आने के लिए बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी। पिता ने तब रिकॉर्डिंग के लिए भेजा, जब शमशाद ने वादा किया कि बुर्का पहनकर ही गाएंगी और कभी कैमरे के सामने न आएंगी। अपने वादे पे वे खरी उतरीं। शमशाद की गिनी-चुनी तसवीरें ही हमने देखी हैं और उनमें से भी ज्यादातर बुजुर्ग होने के बाद की हैं।

40 और 50 के दशक में शमशाद ने मचलते, बहकते, इठलाते, ठुनकते नग्मों में रंग भरे! यूं तो, लता मंगेशकर की तरह ही बेगम भी केएल सहगल की दीवानी थीं (संदर्भ से अलग हटकर बताएं, केएल सहगल को लता इस कदर पसंद करती थीं कि उनसे शादी करना चाहती थीं और बेगम इस तरह दीवानी थीं कि `देवदास’ 14 बार देख चुकी थीं), लेकिन जब गायन में प्रयोग करने की बात होती थी, तब शमशाद हर सरहद को लांघने के लिए तैयार हो जाती थीं। बहुत कम लोग जानते हैं कि वेस्टर्न संगीत की छाप लिए शुरुआती गाने (एक तो `आना मेरी जान संडे के संडे’ ही है) बेगम ने गाए हैं, लेकिन `मदर इंडिया’ और `मुगल-ए-आजम’ के नग्मे अलग ही अदा दिखाने वाले हैं। अंदाज जब `फोक’ की ओर मुड़ता है तो मचलती बेगम कितनी शायराना, अदब भरी और मिठास से भरपूर हो जाती हैं, ये समझने लायक बात है। शकील बदायूंनी की कलम और नौशाद का म्यूज़िक और शमशाद की तड़प मंत्रमुग्ध करती है — `तेरी महफिल में किस्मत आजमाकर हम भी देखेंगे, घड़ी भर को तेरे नज़दीक आकर हम भी देखेंगे… अजी हां हम भी देखेंगे’! सच तो ये है कि 40 के दशक तक हिंदी फिल्मों में लोक संगीत का असर थोड़ा कम होने लगा था, तब नौशाद, शमशाद, मुबारक, उमादेवी, जौहरबाई अंबालेवाली सरीखे फनकार इस जादू को फिर संजोकर लौटा लाए थे।

विविधता की बात करें तो इतना वैविध्य एक साथ किसी एक कलाकार में कम ही दिखता है। राजकपूर की शुरुआती फिल्म `आग’ में `काहे कोयल शोर मचाए रे’ गीत सुनिए, आप भी कह उठेंगे — `मोरे नैनों में नीर भर आए रे, मोहे बीते वो दिन याद आए रे’। यहां नौशाद और ओपी नैय्यर (जो शमशाद की आवाज़ को `मंदिर की घंटी’ मानते थे) जैसे म्यूजिक डायरेक्टर्स और राजकपूर-शम्मी कपूर सरीखे काबिल, संगीत की समझ रखने वाले कलाकारों को भी क्रेडिट देना होगा, जिन्होंने शमशाद की `स्ट्रेंथ’ का अच्छा इस्तेमाल किया। एक और गीत याद आता है — `ब्लफ मास्टर’ का, जिसमें `मोसे इनकार जो ये करते हैं, साफ जाहिर है हम पे मरते हैं’ लाइनें गाते हुए शमशाद अपने सुरों को ऐसे उठाती-उछालती हैं कि अरमान सिसकने लगते हैं।
12 April Rasrang
… पर वक्त एक-सा नहीं रहता। चढ़ता सूरज भी ढलता है, इसलिए जिस दौर में लता लोकप्रियता के शिखर पर थीं, तब शमशाद चर्चा से कुछ वक्त के लिए ही सही, बाहर रहीं। ये दीगर बात है कि नौशाद को शुरुआती कामयाबी शमशाद के सदके मिली थी, इसलिए वे अपनी प्रिय गायिका के लिए मौके गढ़ते और तलाशते रहे। `अनोखी अदा’, `मेला’, `दुलारी’, `बाबुल’, `दीदार’, `जादू’ के नग्मे इसकी गवाही हैं। 1972 में शमशाद ने फिल्म‘बांकेलाल’के लिए अंतिम गीत ‘हम किससे कहें, क्या शिकवा करें’ गाया। इसके बाद चाहे उम्र का तकाजा कहें या बदलते दौर की अलग किस्म की मांग का — हमने बेगम को फिर किसी फिल्म में नहीं सुना।

अधिक प्रचलित तथ्यों के मुताबिक, शमशाद की पहली फिल्म गुलाम हैदर के संगीत निर्देशन में `खजांची’ (सभी 9 गीत) और अगले साल ही `खानदान’ थी। इसके बाद का सफर कैसा रहा, `पद्मभूषण’ के अलावा, कौन-से सम्मान, पुरस्कार मिले, `मदर इंडिया’, `मुगल-ए-आजम’, `पतंगा’, `आर पार’, `सीआईडी’, `बाबुल’, `दीदार’, `बैजू बावरा’, `बहार’, `मेला’, `किस्मत’ समेत और किन-किन फिल्मों में गीत गाने का अवसर मिला, हिट नग्मे कौन-से थे — ये जानकारियां पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर पढ़ने को मिल जाती हैं, इसलिए इनका जिक्र करने का कोई लाभ नहीं। जरूरी है कि हम शमशाद के संगीत को, उनके लगभग 500 गीतों को याद रखें और इस एहसास को ज़िंदा रखें कि कुछ आवाज़ें मुकम्मल होती हैं। वे हर मोड़ पर ठहरने का, सरपट दौड़ पड़ने का, गले लगा लेने और सिसक उठने का और अगले ही दम, चहकने का माद्दा रखती हैं। बेगम की आवाज़ ऐसी ही है, जो कभी धूमिल नहीं होगी, कभी मद्धम नहीं पड़ेगी। बीमारी के दिनों में शमशाद ने बेटी उषा और दामाद योग रत्रा से कहा था — `मैं कहीं नहीं जाऊंगी, अपने गीतों में समाई रहूंगी।’ हमें इस बात पर यकीन रखना होगा। बॉलीवुड 100 साल पुराना हो चुका है और इसके शुरुआती दौर की आवाज़ों में से एक, शमशाद को सही मायने में श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उन्हें सुनते रहें और नई पीढ़ी को सुनाते रहें।

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