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मरुभूमि का राग – मांड

29 November 2014 No Comment

– कोषा गुरुंग

झरनों के संगीत और नई फसल की खुशी, अपने आप उगे हुए फूलों की मादक सुगंध, पक्षियों का कलरव, पहाड़ों की चोटियों पर बर्फ की सफेद चादर, बच्चों की किलकारियां, सरल हृदय युवतियों का प्यार, जातीय पर्व-त्योहार, यही तो है – लोक संगीत, जो हमें मानवीय संवेदनाओं से जोड़ता है और हमें अपने आप से रू-ब-रू कराता है।

अचानक पहाड़ के पीछे से दल के दल बादल निकल आते हैं और धूप की गर्मी खत्म हो जाती है। गांवों के लोग घरों से और खेतों से बाहर चले आते हैं और जमा हो जाते हैं। वर्षा के आगमन के हर्ष-उल्लास में गाने लगते हैं और नाचने लग जाते हैं, यही तो है – लोक संगीत । हर जगह की अलग-अलग संस्कृति, कला और उनकी विशेषता होती है।

राजस्थान की पृष्ठभूमि पर जब भी किसी फिल्म का निर्माण हुआ है, उन फिल्मों के संगीतकारों ने इस राग का भरपूर फायदा उठाया है। कई हिन्दी फिल्मों में केसरिया बालम को अलग-अलग अंदाज में संजोया गया है। उदाहरण के तौर पर फिल्म रेशमा और शेरा में जब नायिका वहीदा रहमान लोगों की नजरों से बचती-बचाती, अपने आंचल में मिर्ची और रोटी छुपाती ठंडे रेगिस्तान में अपने प्यार को मिलने जाती है और दूसरी ओर, उसका प्यार यानि सुनील दत्त अलाव जलाकर उसका इंतजार कर रहा है। अपने प्यार को देखते ही गाने लग जाती है – तू चंदा, मैं चांदनी, तू तरुवर मैं शाख रे। मांड राग पर आधारित इस गीत को बालकवि बैरागी ने लिखा है।

केसरिया बालमा पधारो म्हारे देस… सुनते ही जेहन में रेगिस्तान से गुजरते ऊंटों के काफिले के साथ बंजारों की यायावरी जीवंत हो उठती है। राजस्थान के राजाओं की रूमानी कहानियों के पर आधारित लोक गीत है, जो राजस्थान की मिट्टी से जुड़ा हुआ है। रेगिस्तान की मिटटी में रचे बसे इस राग पर जाने कितनी रचनाएं बनीं। इस गीत में मान-मनुहार है, श्रृंगार है, सौंदर्य का जादू है तो विरह का दर्द भी छुपा हुआ है।

मांड बिलावल थाट का वक्र संपूर्ण राग है। इसमें दोनों निषाद तथा शेष स्वर शुद्ध लगते हैं। कुछ कलाकार आरोह में केवल ऋषभ को और कुछ रिषभ व निषाद को वर्जित कर देते हैं। इसमें अधिकतर राजस्थानी लोक गीत, भजन, गजल और ठुमरी गाई जाती हैं। एक धुन की भांति प्रचलन में रहे इस राग को किसी भी समय गाया बजाया जा सकता है। राजस्थान में मांड के कई प्रकार प्रचलित हैं।

मांड ने हमेशा से संगीत प्रेमियों का दिलों पर राज किया है। देशी-विदेशी सब पर इसने अपना जादू चलाया है। सही मायनों में मांड राजस्थानी लोक संस्कृति की सच्ची पहचान है। केसरिया बालम… की धुन से हर संगीत प्रेमी परिचित है। यह लोक गीत मांड का एक शुद्धतम रूप है। बरसों बरस जाने कितने फनकारों ने इसे अपनी आवाज में तराशा। यहां तक कि आज के पॉप गायक-गायिकाएं भी इसके सम्मोहन में डूबे नजर आए हैं। टीवी चैनलों पर संगीत के रियलिटी शो में तो इस गीत को जिसने भी गाया उन्हें ऑडिशन में खास तवज्जो मिली।

इस राग को स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपने स्वर दिए। इतना ही नहीं, सरहद पार पाकिस्तान से गजल का बादशाह मेहदी हसन साहब, रेशमा व अन्य कलाकारों ने भी खूब संवारा। सरोद वादक अली अकबर खां साहब हो या विश्व प्रसिद्ध मोहनवीणा का जनक पं. विश्वमोहन भट्ट सारंगी उस्ताद सुल्तान खां, सितार मेस्ट्रो शाहिद परवेज हो अथवा शहनाई, बांसूरी या हारमोनियम। कोई भी मांड का जादू से बच नहीं पाया। धोरां री धरती के लोकगायक लंगा मागणियार हो या बॉलीवुड में धूम मचाने वाले सोनू निगम या फिर पाकिस्तान का सुप्रसिद्ध गायक राहत फतेह अली खां कÞसरिया बालम हर एक का दिल की धडकन बन उन्हें रिझाया है। यहां तक की गजèल सम्राट स्व. जगजीतसिंह ने भी मांड गायिकी में सुकून तलाशा।

राजस्थान की मिट्टी की खुशबू है इस राग में, जिसे सुनते ही मन जैसे पंख लगाकर उड़ने लगता है उस रंगीली सरजमीं पर जहां ऊंटों की चलती कतारें, रंग-बिरंगी पगडिय़ां सिर पर बांधे वहां के सजीले लोग, बंजारों का सुरीला संगीत, स्वादिष्ट खानपान, कुल मिलाकर इन सभी चीजों की एक झलक दिखा जाता है राग मांड। जब कभी संगीत समारोह में कहीं मांड का जिक्र होता है तो संगीतप्रेमी गदगद हो जाते हैं। जयपुर के मांडगायक पं. चिरंजीलाल तंवर किसी समारोह में मौजूद हो और मांड गायन न हो, नामुमकिन है। संगीत प्रेमी दीपक दाधीच कहते है ‘मांड सुनने पर ही संगीत की पूर्णता का अहसास होता है।’

‘केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस’ जब कहीं सुनाई पड़ता है तो हृदय में मरुभूमि की सरसता का एहसास होता है। इस गीत में न केवल वीरता, शौर्य और साहस का आदर दिखाई देता है। वहीं हजारों पर्यटकों को राजस्थान की ओर आकर्षित भी करता है। यह अमर गीत प्रख्यात मांड गायिका अल्लाह जिलाई बाई के कंठों से निकलकर राजमहलों से लेकर राष्ट्रपति भवन और विदेशों में भी सुरीले अंदाज में पहुंचा है। मरुभूमि के इस गीत को अल्लाह जिलाई बाई ने अमृता प्रदान की है। आकाशवाणी की वह प्रिय गायिका बनीं और घर-घर में उनके गीत गूंजने लगे। एच.एम.वी. ने उनके गीतों का एक कैसेट, एल.पी., ई.पी.ई., सीडी, डीवीडी रिकॉर्ड भी जारी किए।

राजस्थान का थार रेगिस्तान की खास पहचान मांड गायिकी को देश-विदेश में नया मुकाम दिलाने वाली लोक गायिका रुक्मां का निधन का बाद मांड जगत में खासी रिक्तता पैदा हो गई है। गुजरात के वड़ोदरा में रहने वाले चुरू जिले के निवासी शंकर शर्मा राजस्थान में नए मांड कलाकारों की कमी से खासे चिंतित है, उनका कहना है, ‘अगर नए कलाकार विधिवत् शिक्षा ग्रहण नहीं करेंगे तो हमारी इस कला से आने वाली पीढ़ी वंचित रह जाएगी।’

आरोह-अवरोह में वक्र संपूर्ण राग। समय का कोई बंधन नहीं। जब चाहे तब गाएं। मांड राग पर आधारित फिल्मों के गीत –

शबाब – जो मैं जानती

बैजू बावरा – बचपन की मुहब्बत को दिल से न जुदा करना

रेशमा और शेरा – तू चंदा मैं चांदनी, तू तरुवर मैं शाख

अभिमान – अब तो है तुमसे हर खुशी अपनी

लम्हे – मोरनी बागां मा बोले आधी रात मा

स्वर्ग-नर्क – पिया पिया बोले मोरा जिया

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