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नवरंग # दैनिक भास्कर = सिगरेट फेंको और बताओ – एक्टिंग करोगे?

18 May 2013 No Comment

दैनिक भास्कर में प्रकाशित सामग्री. कॉपीराइट प्रोटेक्टेड…

बल्लीमारान से ग़ालिब और ग़ज़ल का गहरा ताल्लुक है पर कौन जानता है – यहां एक शख्स ऐसा भी जन्मा, जिसे देखकर लोग गालियां देने लगते थे। ये बात और है कि उस इंसान जैसा दयालु शायद ही ढूंढने से मिले। ये हैं हिंदी सिनेमा के सबसे ख़तरनाक विलेन और खूब दुलारे चरित्र अभिनेता प्राण। प्राण को दादा साहेब फाल्के एवार्ड दिए जाने की घोषणा की गई है। यह खबर सुनते ही प्राण के कितने ही किरदार आंखों के सामने घूमने लगे हैं। उनके सिनेमा और फ़िल्मी सफर से तो हम सब वाकिफ हैं, पर यह नहीं जानते कि कैसे हुई प्राण की सिल्वर स्क्रीन पर एक्टिंग करियर की शुरुआत!

– चण्डीदत्त शुक्ल

‘सता ले, सता ले मेरा भी वक्त आएगा’
– फ़िल्म `कश्मीर की कली’ में प्राण का एक डायलॉग…

और वक्त आ गया। देर से ही सही, पर यह अच्छी खबर मिली है कि प्राण को भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से नवाज़ा जाएगा। 100 साल पुराने भारतीय सिनेमा के 93 वर्षीय अभिनेता हैं प्राण। अच्छा, एक बात तो बताइए, आप जानते हैं न इन्हें? अगर नहीं जानते तो घर की बड़ी-बूढ़ियों से पूछिए। ये वही प्राण हैं, जिन्हें 70 एमए के परदे पर देखते ही मांएं अपने बच्चों को आंचल तले छुपा लेती थीं…। कुछ बड़े बच्चे प्राण की एक झलक पाते ही आंखें मींच लेते, थोड़ी देर बाद पूछते – मां! आंखें खोलूं? वो चला गया न? फ़िल्म `शोले’ का डायलॉग भले ही गब्बर के लिए कहा गया हो – `सो जा बेटा नहीं तो गब्बर आ जाएगा’ पर असल डर तो प्राण ने ही पैदा किया था। रास्ते से गुजरते तो लोग गालियां देते – `लफंगा!’ ऐसे बैडमैन थे प्राण। फ़िल्म अभिनेत्री सायरा बानो भी याद करती हैं – `वे आए तो थे हीरो बनने, लेकिन विलेन के रूप में ऐसी धूम मचाई कि मैं उनकी अदाकारी देखकर दांतों तले अंगुलियां दबा लेती थी।‘

बड़ी-बड़ी आंखें, पुतलियों में कांपती क्रूरता, हंसी में ज़िद और रहस्य, चाल-ढाल में अजब सा गुरूर, आवाज़ में पत्थरों जैसा वजन और किरदार में कमाल का काइंयापन…। इतने बदनाम कि जिस दौर में वे सबसे ज्यादा कामयाब विलेन थे, हिंदुस्तान की शायद ही किसी मां ने अपने बच्चे का नाम `प्राण’ रखा हो। (प्राण की बेटी पिंकी ने कुछ अरसा पहले एक प्रतियोगिता आयोजित की थी, जिसमें उन बच्चों और उनकी मांओं को ईनाम देने की बात कही गई थी, जिनका नाम प्राण हो!)

कुछ पुरानी फ़िल्में याद कीजिए। क्रेडिट रोल में सबसे अंत में बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा आता था – और प्राण! पर यहां और प्राण का मतलब बस इतना नहीं था कि इस फ़िल्म में प्राण भी हैं, बल्कि आशय यह था – प्राण हैं तो फ़िल्म में जान होगी ज़रूर।
यूं तो, 12 फरवरी, 1920 को दिल्ली के बल्लीमारान में जन्मे 93 साल के प्राण को अब चलने-फिरने में भी तकलीफ होती है पर एक जमाना वो भी था, यानी साल 1942 से 1991 तक, जब उनकी आवाज़ सुनते ही रगों में दहशत दौड़ने लगती थी। प्राण 1940 से 2007 तक हिंदी सिनेमा की सिल्वर स्क्रीन पर नज़र आते रहे। बेशक अलग-अलग गेटअप, कास्ट्यूम्स और किरदार में। शुरुआत में बतौर हीरो – खानदान (1942), पिलपिली साहब (1954) और हलाकू (1956), फिर विलेन, एक वक्त में नायक-खलनायक दोनों और अंततः न भुला पाने वाले चरित्र अभिनेता के रूप में भी। इतनी बड़ी पारी, इतना वैविध्य और ऐसी लोकप्रियता – बिरलों को ही नसीब होती है। 1969 से 1982 के बीच प्राण को अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे भी ज्यादा फीस मिलती थी। साढ़े तीन सौ से ज्यादा फ़िल्में कर अविस्मरणीय ऊंचाई हासिल करने वाले प्राण को फ़िल्म इंडस्ट्री में एंट्री भी बेहद मज़ेदार तरीके से मिली।

कैसे? आइए, चलते हैं सत्तर साल पहले के वक्त में झांकते हैं। बल्लीमारान स्थित उस पंजाबी परिवार में रहते थे – सिविल इंजीनियर पिता केवल किशन सिकंद, गृहिणी मां रामेश्वरी, चार भाई और तीन बहनें। पर एक जगह टिककर रहना न हुआ। पिता की नौकरी में तबादले खूब होते थे। पिता के साथ-साथ परिवार और प्राण भी अलग-अलग शहरों, मसलन – देहरादून, कपूरथला, मेरठ और उन्नाव घूमते रहे। पढ़ाई भी किश्तों में चलती। पिता को सड़कें और शहर बनाने का शौक था और प्राण को फोटोग्राफी का। आखिरकार, प्राण ने रामपुर से हाईस्कूल की परीक्षा पास की और तब सपना देखा – फोटोग्राफर बनने का। सोचिए, कैमरे के लेंस से झांकती प्राण की आंखें क्या-क्या न कैप्चर करना चाहती होंगी! अपना ख्वाब पूरा करने के लिए प्राण पहले दिल्ली आए और आखिरकार, शिमला। यहीं पर उन्होंने रामलीला में सीता का किरदार निभाया। राम बने थे, बाद में बॉलीवुड के चर्चित कलाकार के रूप में स्थापित हुए – मदन पुरी।

खैर, इसी बीच वे लाहौर चले आए। 1942 की एक दोपहर पान की दुकान के सामने खड़े प्राण धुएं के छल्ले बनाने में मशगूल थे। वही छल्ले, जो बाद में उनकी पहचान बने। कई फ़िल्मों में ऐसे दृश्य हैं, जिनमें हीरोइन के क्लोजअप के साथ धुएं के छल्ले दिखाई देते हैं। धीरे-धीरे धुआं छंटता है और उभरता है प्राण का सख्त, क्रूर और डरावना चेहरा…। लेकिन हीरोइन कहां भांप पाती कि सामने खड़ा शख्स इतना बुरा है। बेशक – ऑन स्क्रीन! प्राण शुरुआती रोमांटिक विलेन थे, जिन्होंने नायिका से एकतरफा प्रेम किया। एक-दो नहीं, अनगिनत फ़िल्मों में, मसलन – अफसाना, चोरी चोरी, मधुमती, मुनीम जी, जब प्यार किसी से होता है, ब्रहमचारी… वगैरह।

… पर पान की उस दुकान के सामने जो घटा, वह तो इससे बहुत पहले की बात है। दरअसल, फोटोग्राफी के अलावा, प्राण को बस एक शौक और था – सिगरेट पीना। सो वे धुएं से खेलने में रमे हुए थे। तभी उनकी निगाह सामने खड़े एक शख्स पर गई। वह उन्हें एकटक घूर रहा था।

प्राण को अजीब-सा लगा। वे बोले – कुछ परेशानी है भाई साहब? वह हंसा, बोला – पहले सिगरेट फेंको!

प्राण ने सिगरेट फेंक दी – अब कहिए!

– कुछ नहीं, हीरो बनोगे?

– क्या!!!

हां, मेरा नाम है वली मोहम्मद वली। मैं फ़िल्म राइटर हूं। तुम कल मेरे दफ्तर आओ। मैं एक पंजाबी फ़िल्म लिख रहा हूं – ‘यमला जट’। मुझे लगता है कि तुम उसके एक किरदार के लिए अच्छे साबित होगे।

प्राण को लगा कि कोई पागल-सा आदमी होगा। यूं ही, मज़ाक कर रहा होगा। अगले दिन फिर उसी पान की दुकान के सामने वली ने यह बात दोहराई। आखिरकार, प्राण उनके दफ्तर पंचोली स्टूडियो गए और निर्माता-निर्देशक से वली ने उनकी मुलाकात कराई। इसके बाद प्राण ने अपने करियर की पहली फ़िल्म की – यमला जट! कुल पचास रुपए की तनख्वाह पर। हां, निर्माता ने यह छूट जरूर दे रखी थी – तुम्हें हर वक्त सेट पर मौजूद रहने की जरूरत नहीं। तुम अपनी फोटोग्राफी का शौक पूरा कर सकते हो!

इसके बाद क्या हुआ, यह कहानी जरा लंबी है, लोगों ने सुनी-पढ़ी भी है, मुख्तसर बस इतनी कि कुछ पंजाबी फ़िल्मों में काम करने के बाद पिता ने प्राण को घर वापस बुला लिया। वे नहीं चाहते थे कि प्राण फ़िल्म अभिनेता बनें। इसके बाद प्राण बिज़नेस संभालने लगे, शादी हुई। कुछ अरसा बाद पिता का निधन हो गया और प्राण फिर से अदाकारी की फील्ड में उतर गए। मुल्क के बंटवारे के बाद लाहौर से हिंदुस्तान आए तो सस्ते होटलों में रहे, गली-गली की खाक छानी और आखिरकार, हिंदी सिनेमा में धमक देने का मौका मिला तो अपनी अदाकारी से सबका मन मोह लिया। बांबे टॉकीज की फ़िल्म `ज़िद्दी’ में अभिनय की चर्चा हुई। `गृहस्थी’, `अपराधी’ और `पुतली’ से अच्छे पैसे मिलने लगे। फ़िल्म `बड़ी बहन’ से अव्वल नंबर के विलेन बन बैठे। कुल-मिलाकर दास्तां यही कि प्राण ने एक बार जो सिनेमा के गलियारे में कदम रखे, फिर पीछे नहीं खींचे। विलेन बनकर पहली बार गेटअप में ढेरों प्रयोग किए और जब कैरेक्टर आर्टिस्ट बने तो छोटे-छोटे किरदारों में जान फूंक दी।
आज भले ही प्राण एक्टिंग नहीं करते, लेकिन उनकी आवाज़ अब भी कानों में गूंजती रहती है – प्यार में तो बूढ़ा भी जवान लगता है … लड़की शीरीं और लड़का फरहाद लगता है (फ़िल्म – कर्ज) । दादा साहेब फाल्के एवार्ड पाने पर प्राण साहब को टीम नवरंग की ओर से हार्दिक बधाई।


बैडमैन को बिग एवार्ड, अच्छी ख़बर है – प्रेम चोपड़ा
हमने उन्हें हमेशा विलेन ही देखा, पर वे बेहद असली हीरो हैं – ऋषि कपूर
कैरेक्टर, कॉन्फिडेंस और करेज का है ये सम्मान – हेमामालिनी
एक जमाने में वे ‘बुराई की उपमा’ बन गए थे। कामयाबी हो तो ऐसी – महेश भट्ट
मैंने बीस साल पहले ही दे दी थी प्राण साहब को बधाई – अनुपम खेर
प्राण की अदाकारी से फ़िल्म के हीरो का कद बढ़ जाता था – सुधीर मिश्र

जन्म – 12 फरवरी, 1920 (बल्लीमारान, दिल्ली)
पत्नी – शुक्ला सिकंद
संतान – अरविंद सिकंद, सुनील सिकंद (पुत्र), पिंकी सिकंद (बेटी)

कुछ खास फ़िल्में
शहीद, विक्टोरिया नं. 203, धर्मा, परिचय, खानदान, मधुमती, ज़िद्दी, राम और श्याम, उपकार, जंजीर, शराबी, पत्थर के सनम, तुम सा नहीं देखा, बड़ी बहन, मुनीम जी, गंवार, गोपी, हमजोली, दस नंबरी, अमर अकबर एंथनी, दोस्ताना, क़र्ज़, अंधा क़ानून, पाप की दुनिया, मृत्युदाता आदि

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