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एक नज़्म उतरी है मेरे आंगन में

7 February 2013 No Comment

– दुष्यंत

एक नज्म उतरी है मेरे आंगन में
कहो तो सहेज लूं , कहो तो रहने दूं

कहां वकत मेरी कि
दरिया किसी सहरा में बहने दूं
दरिया किसी की सुनते कब हैं

दरिया, बादल, परबत और हवाएं
मेरी नज्मों के कारखाने में
सब कारीगर हैं
कह दो तुम तो इन सबको पास बुला लूं मैं

एक नज्म जो उतरी है मेरे आंगन
उसे लफ्जों का पैरहन दे दूं
सजा दूं किसी गुलदान में
रख दो करीने से तुम उसे किसी बुकशेल्फ में !

शायर के बारे में कुछ और है इन पन्नों पर – दुष्यंतलाइव

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